Friday, March 4, 2016
असमः बिहार के नतीजे दोहराएगी भाजपा
राजीव कुमार
असम में दो चरणों में 4 और 11 अप्रेल को विधानसभा चुनाव होंगे।चुनाव तिथियों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं।अब तक गठबंधन न करने का दम भरनेवाली क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद(अगप)ने भाजपा के साथ ना-ना करते गठबंधन कर ही लिया।भाजपा जिस तरह विभिन्न पार्टियों से गठबंधन कर रही है उससे लगता है कि उसकी खुद की हालत पतली है।पहले वह खुद 84 प्लस सीट जीतने का दम भरती थी।
असम आंदोलन से जन्मी तथा दो बार सरकार बना चुकी अगप की हालत भी राज्य में अच्छी नहीं।राज्य की 126 सीटों में से भाजपा ने 24 सीटें अगप को दी है।राज्य में भाजपा के पांच विधायक हैं वहीं अगप के 2011 के विधानसभा चुनाव में 10 विधायक चुनकर आए थे।अलगापुर के अगप विधायक सहीदुल आलम चौधरी की मौत के बाद वहां हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने कब्जा जमाया तो अगप के विधायकों की संख्या घटकर 9 हो गई।बाद में अगप के चतिया विधानसभा के विधायक पद्म हजारिका और ढकुवाखाना के विधायक नव कुमार दलै भाजपा में शामिल हो गए।इस तरह अगप के विधायकों की संख्या घटकर सात हो गई।फिर भी अगप के विधायक भाजपा से ज्यादा हैं।लेकिन गठबंधन में भाजपा ने सीटें सिर्फ 24 दी है।इससे अगप की खराब स्थिति स्पष्ट होती है।
कभी भाजपा लोकसभा चुनाव में बिग ब्रदर की और विधानसभा में अगप के बिग ब्रदर होने की बात कहती थी,लेकिन इस बार केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गठबंधन का ऐलान करते हुए कहा कि अगप कनिष्ठ सहयोगी होगी।केंद्र में भाजपा नीत राजग की सरकार आने के बाद उसकी नीतियों की अगप खिलाफत करती रही है।लेकिन अब उसी के साथ गठबंधन कर चुनाव में उतरेगी।दोनों के गठबंधन को लेकर दोनों पार्टियों के तृणमूल कर्मी गुस्से में हैं।वैसे भी भाजपा ने जब से कांग्रेस के हिमंत विश्व शर्मा को लिया है,उसके दिन उलटे शुरू हो गए हैं।शर्मा की छवि बेदाग नहीं।जब वे कांग्रेस में थे तो यही भाजपा उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाती थी।इसलिए कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का मौका मिल गया है।
लोकसभा चुनाव के दौरान हिमंत ने नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए कहा था कि गुजरात के पानी की पाइपों में खून बहता है।इस पर एक भाजपा नेता ने मामला भी किया।लेकिन हिमंत के भाजपा में शामिल होते ही यह मामला उठा लिया।हिमंत की राजनीति पार्टी के बजाए अपने को शक्तिशाली करने की होती है ताकि वे मुख्यमंत्री बन सकें।कांग्रेस में भी उन्होंने यह कोशिश की,लेकिन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की बेदाग और लोकप्रिय छवि के कारण कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उन्हें हटाना मंजूर नहीं किया।
उधर सारदा घोटाले में फंसते ही हिमंत ने भाजपा का दामन थाम लिया।हिमंत ने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव से संबंध मधुर बनाए और इस तरह अपनी पहुंच अमित शाह तक बना ली। अब भाजपा ने हिमंत को अपने आंखों का तारा बना लिया।अब वे चुनाव परिचालना कमेटी के संयोजक हैं।उन्हीं की कही बातों के अनुसार भाजपा के दिल्ली के शीर्ष नेता चलते हैं,जिन्हें जमीनी सच्चाई पता नहीं।यदि भाजपा कांग्रेस के लोगों को न ले अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल को लेकर अकेले दम पर चुनाव लड़ती तो बेहतर स्थिति में आती।हो सकता था कि वह सरकार नहीं बना पाती लेकिन राज्य में उसकी स्थिति बेहतर होती।क्योंकि सर्वानंद सोनोवाल एक बेदाग चेहरा है।लेकिन हिमंत के इशारों पर चलते हुए भाजपा की जड़ें ही कमजोर होगी।बोड़ो पीपुल्स फ्रंट के साथ समझौता बीटीएडी में भाजपा को खत्म कर देगा।भाजपा ने अगप के साथ गठबंधन कर कांग्रेस के हाथ में चुनाव प्रचार के लिए एक बड़ा हथियार सौंप दिया है।यह है गुप्त हत्या का।
जब राज्य में अगप की सरकार थी और केंद्र में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो राज्य में गुप्त हत्याएं हुई थी।पिछले तीन बार से लगातार कांग्रेस इसे एक बड़ा मुद्दा बनाती आई है।इस बार भी बनाएगी।जनता उस समय को याद कर कांप उठती है।वहीं कांग्रेस की स्थिति इस बार भी बेहतर हो गई है।हिमंत के पार्टी में रहने के दौरान विक्षुब्ध गतिविधियों का दौर था।उनके जाते ही यह थमा।कांग्रेस ने अपनी योजनाओं से लाभार्थियों की संख्या बहुत बनाई है।विकास के भी अनेक कार्य हुए हैं।अशांत असम आज नई ऊंचाइयों को छू रहा है।इसलिए जनता में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के प्रति आस्था और विश्वास का भाव दिख रहा है।लोग में उनकी छवि एक बेदाग व ऊर्जावान मुख्यमंत्री की है।इन सबके चलते वे चौथी बार बहुमत ले आएं तो भी हैरत की कोई बात नहीं होगी।
बिहार में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के हावी रहने और स्थानीय नेतृत्व को तवज्जो न देने के चलते हार हुई।इसके बाद उसने सीख के तौर पर असम में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम का एलान किया,लेकिन सर्वानंद की चलती न के बराबर है।पार्टी के शीर्ष नेता कांग्रेस से आए हिमंत के इशारे पर ज्यादा कदम उठा रहे हैं,जो कि बिहार के नतीजों को ही भाजपा के लिए दोहराएंगे।
(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
मोबाइल-9435049660
Wednesday, June 24, 2015
आंखन देखी: म्यांमार की खुली सीमा,घुसना आसान
राजीव कुमार,म्यांमार के अंदर से





म्यांमार फिलहाल सुर्खियों में है।मणिपुर के चंदेल में आतंकियों ने भारतीय सेना के 18 जवानों को मारा था। भारतीय सेना ने बदले की कार्रवाई में म्यांमार में घुसकर आतंकियों पर हमला किया।भाजपा नीत केंद्र सरकार प्रचार में आगे है।सेना भी सरकार को देखकर वैसे कदम अपना रही है।इस पर कुछ कहने के बजाए हम अरुणाचल प्रदेश से सटे म्यांमार के अंदर तक बेरोकटोक बिना कोई पासपोर्ट-वीजा लिए जाने के अनुभव को पाठकों के साथ साझा करेंगे।इससे हमारी सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुलती है।साथ ही म्यांमार में आसानी से आ-जा सकने की बात भी उजागर होती है।
मैंने स्टीलवेल रोड देखने के लिए म्यांमार के पांगसू पास का दौरा किया।गुवाहाटी से 579 किमी का सफर कर हम असम के मार्घेरिटा,लिडू होते हुए अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले के जयरामपुर पहुंचे।यहां तक सड़क चौड़ी और बेहद खूबसूरत है।जयरामपुर में इनर लाइन परमिट चेक करा लेने के बाद हम नामपोंग होते हुए पांगसू पास के लिए रवाना हुए।सड़क संकरी।हरे भरे पहाड़ों के बीच से गाड़ी नीचे ऊपर उतरते हुए आगे बढ़ती है।बरसात के दिन होने के कारण पहाड़ से उतरी लाल मिट्टी से सड़क पूरी तरह कीचड़ में तब्दील हो गई है।छोटी गाड़ियों से इन इलाकों में जाना आसान नहीं।कहीं जगहों पर गाड़ी कीचड़ में फंसने के कारण धक्के मारने के लिए उतर कर कपड़े खराब करवाने पड़े।जयरामपुर से पांगसू पोस्ट तक असम रायफल्स के दो गेट हैं।इन पर कोई जवान हमें नहीं दिखा।
पांगसू पोस्ट में असम रायफल्स के कैंप के बाहर हमें अपने नामों को वहां रखे एक रजिस्टार में लिखा।वहां बताया गया कि रास्ता बेहद खराब है,छोटी गाडियों में म्यांमार सीमा तक जाना संभव नहीं होगा।हमारी गाड़ी वहीं छोड़कर हम पैदल आठ किमी पहाड़ी रास्ते पर चले।पांगसू पोस्ट से हम वहां सड़क के कार्यों में लगे एक डंपर पर सवार होकर म्यांमार की सीमा में जाकर उतर गए।पर हमारी कोई तलाशी नहीं हुई।म्यांमार सीमा के पास भी कोई सुरक्षा नजर नहीं आई।हमने सीमा को दर्शाते चिह्नों पर खड़े होकर फोटो खिंचवाए।शिलालेख है जहां एक तरफ भारत और दूसरी तरफ म्यांमार लिखा हुआ है।यह समुद्र तट से 3,727 फीट की ऊंचाई पर है।पाटकाई पहाड़ी के शिखर पर स्थित है पांगसू पास।हमें एक भी जवान गश्त लगाता हुआ यहां दिखाई नहीं पड़ा।
हम पैदल चलते हुए म्यांमार के पांगसू पास के बाहर दाखिल हुए।यह ऐतिहासिक स्टीलवेल रोड़ है।वहां बांस लगी एक गेट है।पर कोई तैनात नहीं।दूर-दूर तक कोई हलचल नहीं देखी।सब आराम फरमा रहे हैं।पता चला कि म्यांमार की सीमा के अंदर सेना है।बुलाने पर आए।लेकिन उनके पास न कोई हथियार दिखा और न ही हमें रोकने के कोई विरोध।वे आम जनता की तरह लग रहे थे।कोई ड्रेस नहीं पहन रखी थी।हम लोग विख्यात लेक आफ नो रिटर्न और वहां मौजूद बाजार और बुद्ध मंदिर में घूमते रहे।खूबसूरत लेक आफ नो रिटर्न के बारे में कहा जाता है कि यहां जो भी गया वह वापस लौटकर नहीं आया।दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एलाएड सेना के विमान यहां उतरकर नीचे समा गए थे।इस लेक की लंबाई 1.4 किमी है जबकि चौड़ाई 0.8 किमी है।
अपने को सेना का कमाडेंट बताने वाले मायतून ने हमसे एक-दो बार फोटो न लेने का अनुरोध किया।लेकिन हम कुछ फोटो ले चुके थे।उसने हमसे दुर्व्यवहार नहीं किया।ज्यादा अंदर जाने की बात पर उसने कहा कि मैंने अपने कैप्टेन को बुला भेजा है।वह आएगा तो आप और आगे जाने की बात कर सकते हैं।लेकिन अंग्रेजी व अन्य कोई भी भारतीय भाषा समझ न पाने के कारण उनका कैप्टन बाजार से एक नागामीज बोलनेवाली महिला को लेकर आया।उसने बताया कि हमारे पास अधिकृत कागज नहीं है,इसलिए ज्यादा अंदर नहीं जा सकते।हमें वापस लौट आने का अनुरोध कैप्टेन ने किया।बतातें चले कि अरुणाचल के पांगसू पास में हर साल 20 जनवरी से 22 जनवरी तक विंटर फेस्टिवल आयोजित होता है।इस दौरान म्यांमार वाले पांगसू पास से लोगों का आना-जाना खोल दिया जाता है।
हम म्यांमार के जिस इलाके में थे वह सीमाई गांव का इलाका है।भारतीय गांवों की तरह ही वहां के दृश्य नजर आए।चापाकल पर महिलाएं नहाती दिखी।पर इससे साफ होता है कि म्यांमार में घुसना और वहां के जंगलों में डेरा जमाकर रहना आतंकियों के लिए आसान है।इसलिए पूर्वोत्तर के ज्यादातर आतंकी यहां डेरा जमाए रहते हैं।प्रशिक्षण चलता है।अब शायद स्थितियां बदले।
स्टीलवेल रोड भारत में 61 किमी,म्यांमार में 1033 और चीन में 632 किमी पड़ती है।भारत के 61किमी में 30 किमी असम में और अरुणाचल प्रदेश में 31 किमी है।असम में पड़नेवाली स्टीलवेल सड़क की स्थिति बेहद अच्छी है।पर भारत की सीमा से म्यांमार के पांगसू पास तक सड़क का निर्माण दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ ही नहीं है।इसलिए गांव की टूटी-फूटी कच्ची सड़क जैसे हालात हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एलायड फोर्स के जाने के लिए असम के लिडू से चीन के कुनमिंग तक स्टीलवेल रोड का निर्माण हुआ था।अब इसे लुक ईस्ट पालिसी के तहत फिर खोले जाने की मांग उठ रही है।इससे दक्षिण एशिया के साथ पूर्वोत्तर का व्यापार वाणिज्य का मार्ग खुल जाएगा।पूर्वोत्तर के राज्यों का विकास होगा।पर इसके पहले यहां आतंकियों का सफाया जरुरी है।दुर्गम इलाके के कारण लोगों की आवाजाही कम होने के चलते इन इलाकों में आतंकियों का जमावड़ा है।सर्वविदित है कि अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग में नगा आतंकी संगठन एनएससीएन का दबदबा है।
मुझे डर सता रहा था कि पासपोर्ट -वीजा न होने के कारण कहीं विदेश की धरती पर जाने के कारण गिरफ्तार कर न लिया जाऊं।साथ ही पहाड़ से आतंकी हमला न हो जाए।पर कई घंटे म्यांमार में गुजारकर हम बिना कोई परेशानी के लौट आए।
Wednesday, June 10, 2015
शाबास इंडिया,शाबास मोदीजी
राजीव कुमार
भारतीय सेना ने म्यांमार के घने जंगलों में प्रवेश कर आतंकियों को मार गिराया है।यह मणिपुर में सेना पर हुए हमले के बदले में की गयी कार्रवाई है।आतंकवाद देश को नुकसान कर रहा है।इसमें कोई संदेह नहीं।वर्ष 2003 में केंद्र में जब भाजपा नीत राजग की सरकार थी तब भी ऐसा ही कड़ा रुख देखा गया था।भूटान में आपरेशन आल क्लीयर चला और भूटान से असम के आतंकियों का सफाया किया गया।अब फिर केंद्र में भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार है और कड़ा रुख सामने देखने को आ रहा है।सोशल मीडिया में भी सेना की इस कार्रवाई की जमकर तारीफ हो रही है।
आपरेशन आल क्लीयर के दौरान भारतीय सेना ने भूटानी सेना के साथ मिलकर दक्षिण भूटान में 30 आतंकी शिविरों को ध्वस्त किया था।इनमें उल्फा के 13,एनडीएफबी के 12 और केएलओ के पांच शिविर थे।तब तत्कालीन सेना प्रमुख एनसी विज ने कहा था कि हमने लगभग 650 आतंकियों को निष्प्रभावी कर दिया है यानी कुछ मारे गए और कुछ पकड़े गए।पकड़े गए कई आज मुख्य़धारा में शामिल होकर सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं।इसके बाद बांग्लादेश के साथ संबंध बेहतर हुए तो वहां रहनेवाले अनेक आतंकी नेताओं को भारत के हवाले किया गया।आज दोनों पड़ोसी देशों में पूर्वोत्तर के आतंकी संगठनों का पहले जैसा जमावड़ा नहीं।पहले तो ये आतंकी असम में बड़ी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देकर सीधे पड़ोसी भूटान या बांग्लादेश की सीमा में जा घुसते थे।पर आज वहां शिविरों के न रहने से इस तरह की घटनाएं न के बराबर हो रही है।
मणिपुर में आतंकी संगठन एनएससीएन(के) ने हमला कर 18 सेना जवानों की नृशंस हत्या कर दी।कारगिल के बाद सेना को सबसे बड़ा झटका था।सभी ने इस आतंकी हमले की निंदा की।कठोर कार्रवाई की बात कही गयी।कठोर कार्रवाई भी हुई।सेना ने आतंकियों को म्यांमार में घुसकर मारा।यह देश की विदेश नीति की सफलता मानी जाएगी।पूर्वोत्तर के अधिकांश आतंकी संगठन भूटान और बांग्लादेश में सफाए के बाद म्यांमार को अपनी शरणस्थली बनाए हुए थे।पर भारत ने अब पड़ोसी देशों के साथ जो संबंध बनाने शुरु किए हैं उससे भूटान में पहले ही,बाद में बांग्लादेश और अब म्यांमार में आतंकियों का सफाया शुरु हो गया।निसंदेह यह राजग सरकार की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।पूर्वोत्तर में जो आतंकी गतिविधियां चल रही है उससे विकास के कार्यों को करने में दिक्कत आ रही है।विकास का पैसा आतंकियों के पास चला जाता है।थोड़फोड़ की गतिविधियों को अंजाम देकर ये जानमाल को नुकसान पहुंचाते हैं।यदि आतंकी गतिविधियों को पूरी तरह विराम लग गया तो पूर्वोत्तर देश का एक अहम पर्यटन क्षेत्र होगा।
भारतीय सेना की बदले की कार्रवाई से आतंकियों और आतंक को बढ़ावा देनेवाले देशों को कड़ा संदेश गया है।यदि भारत सरकार इस तरह कड़ा रुख अख्तियार करती रही तो आतंकियों और इन्हें बढ़ावा दे रहे देशों को सोचने को मजबूर होना होगा।म्यांमार में आतंकियों का सफाया होने के बाद पूर्वोत्तर में आतंक खत्म होने के कगार पर होगा।क्योंकि अब भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से सटे देशों के साथ संबंध अच्छे हुए हैं।वे इन आतंकियों को शरण देने से कतराएंगे।यदि किसी ने चोरी-छिपे प्रवेश पा भी लिया है तो वहां भारत की सेना के हमले का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।
भारत सरकार सीमाओं को पूरी तरह सुरक्षित करने की कोशिश में लगी है।आज से कुछ साल पहले मैंने अरुणाचल प्रदेश के फांग्सूपास से म्यांमार में प्रवेश किया तो कोई रोकटोक नहीं देखी।घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हुए हम स्टीलवेल सड़क से म्यांमार में प्रविष्ट हुए।काफी अंदर चले गए।इससे वहां की सुरक्षा व्यवस्था का खोखला स्वरुप सामने आता है।लेकिन अब केंद्र की मोदी सरकार ने भारत से लगनेवाली म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा को चाक-चौबंद करने का फैसला किया है।इस पर सुझाव देने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया है।खुली सीमा के कारण आतंकी वहां से आसानी के साथ आते-जाते हैं।साथ ही ड्रग्स व हथियारों की तस्करी होती है।म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा एक्ट ईस्ट पालिसी के लिए भी सुरक्षित होनी जरुरी है।टास्क फोर्स अगले एक महीने में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप देगी।
केंद्र की मोदी सरकार के इस तरह के कदमों से निश्चय ही पूर्वोत्तर का भला होगा।उन्होंने लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान कहा था कि पूर्वोत्तर के आठ राज्य अष्ठलक्ष्मी हैं।सही अर्थों में वे अपने नेतृत्ववाली सरकार के जरिए कार्य कर यह साबित कर दें तो इतिहास के पन्नों में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।पूर्वोत्तर के पास अपार संसाधन हैं,लेकिन आतंकवाद के चलते वह देश के अन्य हिस्सों की तुलना में आगे नहीं बढ़ पाया।पर देर नहीं हुई है।अब भी इसे किया जा सकता है।
भारतीय सेना ने म्यांमार के घने जंगलों में प्रवेश कर आतंकियों को मार गिराया है।यह मणिपुर में सेना पर हुए हमले के बदले में की गयी कार्रवाई है।आतंकवाद देश को नुकसान कर रहा है।इसमें कोई संदेह नहीं।वर्ष 2003 में केंद्र में जब भाजपा नीत राजग की सरकार थी तब भी ऐसा ही कड़ा रुख देखा गया था।भूटान में आपरेशन आल क्लीयर चला और भूटान से असम के आतंकियों का सफाया किया गया।अब फिर केंद्र में भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार है और कड़ा रुख सामने देखने को आ रहा है।सोशल मीडिया में भी सेना की इस कार्रवाई की जमकर तारीफ हो रही है।
आपरेशन आल क्लीयर के दौरान भारतीय सेना ने भूटानी सेना के साथ मिलकर दक्षिण भूटान में 30 आतंकी शिविरों को ध्वस्त किया था।इनमें उल्फा के 13,एनडीएफबी के 12 और केएलओ के पांच शिविर थे।तब तत्कालीन सेना प्रमुख एनसी विज ने कहा था कि हमने लगभग 650 आतंकियों को निष्प्रभावी कर दिया है यानी कुछ मारे गए और कुछ पकड़े गए।पकड़े गए कई आज मुख्य़धारा में शामिल होकर सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं।इसके बाद बांग्लादेश के साथ संबंध बेहतर हुए तो वहां रहनेवाले अनेक आतंकी नेताओं को भारत के हवाले किया गया।आज दोनों पड़ोसी देशों में पूर्वोत्तर के आतंकी संगठनों का पहले जैसा जमावड़ा नहीं।पहले तो ये आतंकी असम में बड़ी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देकर सीधे पड़ोसी भूटान या बांग्लादेश की सीमा में जा घुसते थे।पर आज वहां शिविरों के न रहने से इस तरह की घटनाएं न के बराबर हो रही है।
मणिपुर में आतंकी संगठन एनएससीएन(के) ने हमला कर 18 सेना जवानों की नृशंस हत्या कर दी।कारगिल के बाद सेना को सबसे बड़ा झटका था।सभी ने इस आतंकी हमले की निंदा की।कठोर कार्रवाई की बात कही गयी।कठोर कार्रवाई भी हुई।सेना ने आतंकियों को म्यांमार में घुसकर मारा।यह देश की विदेश नीति की सफलता मानी जाएगी।पूर्वोत्तर के अधिकांश आतंकी संगठन भूटान और बांग्लादेश में सफाए के बाद म्यांमार को अपनी शरणस्थली बनाए हुए थे।पर भारत ने अब पड़ोसी देशों के साथ जो संबंध बनाने शुरु किए हैं उससे भूटान में पहले ही,बाद में बांग्लादेश और अब म्यांमार में आतंकियों का सफाया शुरु हो गया।निसंदेह यह राजग सरकार की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।पूर्वोत्तर में जो आतंकी गतिविधियां चल रही है उससे विकास के कार्यों को करने में दिक्कत आ रही है।विकास का पैसा आतंकियों के पास चला जाता है।थोड़फोड़ की गतिविधियों को अंजाम देकर ये जानमाल को नुकसान पहुंचाते हैं।यदि आतंकी गतिविधियों को पूरी तरह विराम लग गया तो पूर्वोत्तर देश का एक अहम पर्यटन क्षेत्र होगा।
भारतीय सेना की बदले की कार्रवाई से आतंकियों और आतंक को बढ़ावा देनेवाले देशों को कड़ा संदेश गया है।यदि भारत सरकार इस तरह कड़ा रुख अख्तियार करती रही तो आतंकियों और इन्हें बढ़ावा दे रहे देशों को सोचने को मजबूर होना होगा।म्यांमार में आतंकियों का सफाया होने के बाद पूर्वोत्तर में आतंक खत्म होने के कगार पर होगा।क्योंकि अब भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से सटे देशों के साथ संबंध अच्छे हुए हैं।वे इन आतंकियों को शरण देने से कतराएंगे।यदि किसी ने चोरी-छिपे प्रवेश पा भी लिया है तो वहां भारत की सेना के हमले का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।
भारत सरकार सीमाओं को पूरी तरह सुरक्षित करने की कोशिश में लगी है।आज से कुछ साल पहले मैंने अरुणाचल प्रदेश के फांग्सूपास से म्यांमार में प्रवेश किया तो कोई रोकटोक नहीं देखी।घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हुए हम स्टीलवेल सड़क से म्यांमार में प्रविष्ट हुए।काफी अंदर चले गए।इससे वहां की सुरक्षा व्यवस्था का खोखला स्वरुप सामने आता है।लेकिन अब केंद्र की मोदी सरकार ने भारत से लगनेवाली म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा को चाक-चौबंद करने का फैसला किया है।इस पर सुझाव देने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया है।खुली सीमा के कारण आतंकी वहां से आसानी के साथ आते-जाते हैं।साथ ही ड्रग्स व हथियारों की तस्करी होती है।म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा एक्ट ईस्ट पालिसी के लिए भी सुरक्षित होनी जरुरी है।टास्क फोर्स अगले एक महीने में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप देगी।
केंद्र की मोदी सरकार के इस तरह के कदमों से निश्चय ही पूर्वोत्तर का भला होगा।उन्होंने लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान कहा था कि पूर्वोत्तर के आठ राज्य अष्ठलक्ष्मी हैं।सही अर्थों में वे अपने नेतृत्ववाली सरकार के जरिए कार्य कर यह साबित कर दें तो इतिहास के पन्नों में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।पूर्वोत्तर के पास अपार संसाधन हैं,लेकिन आतंकवाद के चलते वह देश के अन्य हिस्सों की तुलना में आगे नहीं बढ़ पाया।पर देर नहीं हुई है।अब भी इसे किया जा सकता है।
Thursday, June 4, 2015
हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता: देश नहीं,वोट बैंक प्राथमिकता
राजीव कुमार
भाजपा पहले से ही बांग्लादेश से आए हिंदुओं के शरण के पक्ष में रही है।लेकिन अब इस समुदाय के वोट से भाजपा को कई सीटें हथियाते देख कांग्रेस भी इन्हें शरण दिए जाने का पक्ष लेने लगी है।इससे साफ होता है कि इन सबके लिए देश प्राथमिकता नहीं,अपनी राजनीति की दुकान चलाना प्राथमिकता है।
देश में ऐसे ही जनसंख्या विस्फोट हो चुका है।लोगों को काम पाने और दो जून की रोटी का जुगाड़ करने मारा-मारी करनी पड़ रही है।जमीन का संकट उत्पन्न हो गया है।इन सब की फ्रिक हमारे राजनेताओं को नहीं है।देश में और लोगों को लाकर ये समस्या बढ़ाना चाहते हैं ताकि अपनी रोटी मजे से सेक सकें।
भाजपा का तर्क है कि बांग्लादेश में अत्याचार का सामना कर भारत आए हिंदू लोगों को शरण के साथ नागरिकता प्रदान की जानी चाहिए।इस पूरे मसले को मानवीय दृष्टिकोण से देखने की बात भाजपा कहती है।तब फिर संदिग्ध बांग्लादेशियों के खिलाफ विदेशी न्यायाधिकरण में मामला चलाने और उनकी शिनाख्त के लिए इतना तामझाम कर खर्च करने की जरुरत ही नहीं है।न्यायाधिकरण में मामला लड़ने के लिए पैसे खर्च कर बांग्लादेशी करार दिए गए अनेक व्यक्ति आज भी डिटेंशन कैंपों में रहने को मजबूर हैं।फिर उन्हें यह पीड़ा क्यों दी गई।
असम में बांग्लादेश से आए अनेक हिंदू और मुस्लिम परिवार रहते हैं।विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा विदेशी करार दिए गए फरार लोगों की जो सूची असम पुलिस की सीमा शाखा ने हाल ही में प्रकाशित की है उसमें बंगाली हिंदू और मुसलमानों लोगों की भरमार है।असम की बराक घाटी और कई विधानसभा सीटों के नतीजों में इनकी अहम भूमिका होती है।पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने बांग्लादेश में सताए गए और असम आए लोगों को भारत में शरण देने का मुद्दा उठाया था।इसके चलते कांग्रेस को बराक घाटी की 14 में से 13 सीटें मिली थी।गोगोई सताए गए सिर्फ हिंदू लोगों की बात नहीं कर रहे थे।लेकिन अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अंजन दत्त ने बांग्लादेश में सताए जाने के चलते आए हिंदू लोगों को शरण दिए जाने की बात कह दी है।यानी कांग्रेस व भाजपा एक ही नाव पर सवार हो गए हैं।
असम में विदेशी खदेड़ने के लिए छह साल तक आंदोलन हुआ था।सरकार के साथ असम समझौता हुआ।इसमें स्पष्ट लिखा है कि 25 मार्च 1971 के बाद जो भी आया है,उसे जाना होगा।सभी को यह मान्य है।अब इसके आधार पर ही राष्ट्रीय नागरिक पंजी(एनआरसी) के अद्यतन का कार्य किया जाएगा।यदि अभी तक के सताए बांग्लादेशियों को लेना है तो फिर असम समझौते को कुचला जाएगा।एनआरसी का तामझाम करने की जरुरत ही नहीं है।देश के राजनेताओं का दोगलापन साफ झलकता है।
सवाल उठता है कि यदि बांग्लादेश से आए हिंदू को लेने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहते हैं तो म्यांमार से आए रोहंगिया और बांग्लादेश के चकमा लोगों के प्रति आपका भेदभाव क्यों?क्या हिंदू बंगाली आपके वोट बैंक हैं इसलिए ? भाजपा के नेतृत्ववाली केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरे विश्व में डंका बजने की बात प्रचारित हो रही है।बांग्लादेश पड़ोसी देश है।भारत के साथ फिलहाल अच्छे संबंध हैं।प्रधानमंत्री वहां जा रहे हैं।तब बांग्लादेश में हिंदुओँ को सताने का मसला क्यों नहीं उठाया जाता।अंतरराष्ट्रीय किसी मंच पर बांग्लादेश में हिंदुओं के सताने का मसला फिलहाल उठते नहीं दिखा है।ऐसे में बांग्लादेश के लोगों को देश में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।यह सरासर गलत है ।यदि ऐसा किया जाता है तो सीमा सील करने के लिए अरबों रुपए खर्च करने की जरुरत ही नहीं है।न ही विदेशी न्यायाधिकरणों की जरुरत है और न ही किसी को डिटेशन कैंप में रखने की और न ही अखबारों में विज्ञापन देकर फरार हुए बांग्लादेशियों के नामों को प्रकाशित करने की।न ही मतदाता सूची में किसी के नाम के आगे डी यानी डाउटफुल लगाने की।
Thursday, May 28, 2015
भाजपा के यू-टर्न ले डूबेंगे असम में
राजीव कुमार
असम में अगले साल अप्रेल-मई में विधानसभा चुनाव होंगे।पिछले साल केंद्र की सत्ता में भारी बहुमत से आने के बाद भाजपा असम में भी अपनी सरकार बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को असम की 14 में से सात सीटें हासिल हुई थी।उसे लगता है कि वह असम के मुद्दों को भुनाकर सरकार बना लेगी।लेकिन पिछले एक साल में केंद्र की सत्ता में रहकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने असम में किए गए अपने वायदों पर ही इतने यू-टर्न मारे हैं कि हर कोई हैरत में पड़ गया है।इन यू-टर्नों को देखकर मोदी व उनकी सरकार के प्रति जनता में पहले जैसा जोश नहीं है।इसका फायदा फिर असम में चल रही तरुण गोगोई के नेतृत्ववाली सरकार को मिलने की संभावना है।
मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का एलान किया था।पर भाजपा की लोकप्रियता को गिरते देख उनमें फिर जोश आ गया है।वे कहने में भी संकोच नहीं करते कि वे अब फाइटर मूड में आ गए हैं।लगातार तीन बार सत्ता में आने के बाद वे राज्य के पहले ऐसे मुख्यमंत्री बन गए थे जो सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं।वे 2016 में भी कांग्रेस का नेतृत्व कर सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं।वहीं भाजपा का ग्राफ नीचे खिसक रहा है।भाजपा के पास बेहतर उम्मीदवारों की कमी है।लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने जो वायदे असम की जनता से किए थे उनसे वह पूरी तरह विपरीत स्थिति में चल रही है।उसके इस कदम से मतदाताओं को लगने लगा है कि यह कहती कुछ और है करती कुछ और है।
भाजपा ने बांग्लादेश के साथ भूमि हस्तातंरण मसले पर सबसे बड़ा यू-टर्न लिया।लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी ने गुवाहाटी की जनसभा में कहा था कि कांग्रेस के नेतृत्ववाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(संप्रग) सरकार ने आपसे पूछकर यह समझौता किया था क्या?हम असम की एक इंच जमीन देने नहीं देंगे।लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी गुवाहाटी आए तो उनके सुर बदल गए।उन्होंने कहा कि असम के फायदे के लिए जो होगा वहीं करेंगे।प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि इससे सीमा विवाद हल हो जाता है तो सीमा पूरी तरह सील करने में मदद मिलेगी।घुसपैठ बंद होगी।यही बात थी तो संप्रग ने जब समझौता किया था तो उसके विरोध में भाजपा क्यों उतरी।सिर्फ वोट की राजनीति के लिए यह किया जाता है क्या?
भाजपा का दूसरा बड़ा यू-टर्न सुवनसिरी पनबिजली परियोजना को लेकर था।लोकसभा चुनाव के दौरान इस परियोजना के खिलाफ आंदोलन कर रहे संगठनों व जनता को आश्वस्त करते हुए भाजपा ने कहा कि हम बड़े बांध के खिलाफ हैं।लेकिन सत्ता में आते ही फिर सुर बदला।कहा,विकास के लिए बिजली जरुरी है।इसे हम हर हाल में करेंगे।यही नहीं असम के विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने के साथ ही 90:10 के अनुपात से जो राशि मिलती थी उसका पैटर्न भी बदलकर 50:50 कर दिया।विभिन्न केंद्रीय योजनाओं की राशि में कमी की।इन सब का फायदा मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सरकार ले जाएगी।
भाजपा के पास विधानसभा के चुनाव में उतारने के लिए उम्मीदवार नहीं है।इसलिए वह अन्य पार्टियों के फ्लाप हो चुके नेताओं को अपनी पार्टी में ले रही है।कांग्रेस के अनेक विधायक टिकट से वंचित होने पर भाजपा के दरवाजे दस्तक देंगे।पार्टी यदि इन सबके बलबूते पर सरकार में आने की सोच रही है तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है।फिलहाल भाजपा अगले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्रीय मंत्रियों को असम आने का निर्देश दे चुकी है।खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रियों को यह निर्देश दिया है।हर समय एक न एक केंद्रीय मंत्री असम में मौजूद रहता है।केंद्रीय मंत्री अपने मंत्रालय के यहां चल रहे कार्यों की समीक्षा करने के साथ ही जाते-जाते गोगोई सरकार पर आरोप लगा जाते हैं कि केंद्रीय राशि का सदुपयोग नहीं हुआ है।यानी चुनाव के पहले आरोप-प्रत्यारोपों की राजनीति हावी है।
भाजपा के आरोपों का जवाब गोगोई देने के साथ ही नई योजनाओं का एलान कर रहे हैं।पुरानी पड़ी बंद योजनाओं को फिर से चालू किया जा रहा है।मतदाताओं को लुभाने की कोशिश चल रही है।गोगोई भी अब भाजपा के आक्रामक प्रचार का उसी के अंदाज में जवाब देना शुरु कर दिया है। इसलिए भाजपा के लिए आनेवाला विधानसभा चुनाव आसान नहीं होगा।भाजपा का प्रदेश नेतृत्व भी सक्षम नजर नहीं आता।अकेले तो वह किसी भी कीमत पर सरकार नहीं बना पाएगी।(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
मोबाइल-9435049660
Monday, September 3, 2012
असम हिंसाः कम्यूनल हैं हम
राजीव कुमार
हम अधिकांश भारतीय सांप्रदायिक यानी कम्यूनल हैं।मेरे इस कथन पर बहुत लोगों को आपत्ति हो सकती है।लेकिन यह बात सौ प्रतिशत सच है।सच कड़वा होता है।यदि हम अधिकांश सांप्रदायिक नहीं होते तो देश में मजहब के नाम पर हिंसा नहीं होती।असम के बोड़ो इलाके में हिंसा के बाद उत्पन्न स्थिति को देखने पर मैं यह कह रहा हूं।
बोड़ो इलाके में हिंसा हुई।अधिकांश नेताओं ने सीधे कह दिया कि इसके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठियों का हाथ है।ऐसा कहने के लिए कोई जांच-पड़ताल भी नहीं की।यदि है तो इन बांग्लादेशियों को हम देश का शत्रु मानते हैं और इन्हें तुरंत गिरफ्तार करवाया जाए।भाजपा नेता तो कह रहे हैं कि हिंसा के बाद बनाए गए राहत शिविरों में बांग्लादेशी रह रहे हैं।हद हो गई।हम अपने को धर्मनिरपेक्ष देश मानते हैं,लेकिन भारतीयों को भी बांग्लादेशी कहने से हमें कोई संकोच नहीं।बांग्ला भाषा बोलने, दाढ़ी रखने व लूंगी पहनने से कोई बांग्लादेशी नहीं हो जाता।यह हम कट्टर भारतीयों को जान लेने की जरुरत है।
असम के उन इलाकों में जाने की जरुरत है, जहां ये रहते हैं।मेरा सौभाग्य है कि मैं उस इलाके में जन्मा,पला और बड़ा हुआ हूं।निचले असम के चर इलाकों में यह रहते हैं।जहां विकास का प्रकाश अब तक नहीं पहुंचा है।यह बेहद मेहनती होते हैं।अपने इलाके में काम के अवसर न रहने के कारण ये अन्य जगहों पर काम के लिए यायावरी जीवन जीते हैं।यह इतने पढ़े लिखे नहीं होते कि कागजातों का क्या महत्व है,यह इन्हें समझ में आए।इसलिए इन्हें सीधे बांग्लादेशी करार दिया जाता है।वजह है यह बांग्लादेश से सटे भारतीय इलाकों में रहते हैं और बांग्लादेश के लोगों की तरह ही दिखते हैं।क्या यही इनका दोष है ?देश की आजादी के पहले बांग्लादेश के लोग भारतीय ही थे।यह भी जान लेने की जरुरत है।
यदि इन भारतीयों को हम बांग्लादेशी कहेंगे तो क्या इनके मन में ठेस नहीं पहुंचेगी ?यह अलगाव पैदा नहीं करेगी ? इनके मन में असुरक्षा का भाव पैदा होगा।क्या मुझे या आपको कोई बांग्लादेशी या पाकिस्तानी कहे तो सहन कर पाएंगे ?नहीं न।तो फिर हमें यह कहने का अधिकार किसने दिया ?हां,बांग्लादेशी सीमा खुली रहने का फायदा उठा आ रहे हैं।इन्हें पकड़ने की जरुरत है।सीमा सील किए जाने की जरुरत है।पर बिना सोचे-समझे किसी को उनकी बोली और पहनावे को देखकर बांग्लादेशी कह देना मानहानि करना है।इससे हमें बचना चाहिए।ऐसा कर हम देश को मजबूत करने के बजाए कमजोर कर रहे हैं।
बोड़ो हिंसा के बाद देश के अन्य इलाकों में पढ़ाई और रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे पूर्वोत्तर के लोग वहां से पलायन कर लौट आए।इनमें से कुछेक को वहां धमकी दी गई।इसके बाद फैली अफवाह के चलते लोगों का उन इलाकों से पलायन हुआ।असम के लोगों को देश के अन्य हिस्सों में धमकाना भी हमारे कम्यनूल होने का सबूत है।यदि हम भारतीय हैं तो हम एक हैं।लेकिन मजहब व इलाके के संकीर्ण विचारों को लेकर हमारी सोच संकुचित हो चुकी है।इससे जुड़ाव नहीं,बिखराव पैदा होगा।हमें इससे बचने की जरुरत है।
लेकिन धर्म के नाम पर राजनीति करनेवाले ऐसा करने से बाज नहीं आते।उन्हें तो सिर्फ अपनी रोटियां सेंकने से मतलब है।असम की हिंसा के बाद बाहर नफरत फैलाने का आरोप लगा बजरंग दल ने आल इंडिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष तथा धुबड़ी के सांसद बदरुद्दीन अजमल को गिरफ्तार करने की मांग में 27 अगस्त को असम बंद का आह्वान किया।इस बंद की ज्यादा आलोचना मैंने नहीं देखी।हिंदू संगठन के दिए गए बंद पर ज्यादातर लोग चुपच प घरों में दुबके रहे।जब 28 अगस्त को अखिल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ(आम्सू) ने असम बंद का आह्वान किया तो हिंसक घटनाएं हुई।पत्रकारों पर हमला हुआ।
हिंसा की निंदा की जानी चाहिए,लेकिन जिस तरह इस संगठन के साथ व्यवहार किया जा रहा है,वह बराबर का दर्जा नहीं कहा जा सकता।बंद,बंद हो।हिंसा समर्थनयोग्य नहीं है।बंद के दौरान संगठन के कुछेक सदस्य हिंसा कर सकते हैं।दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।पर इसके लिए पूरे संगठन की आवाज को बंद करने की कोशिश समर्थन योग्य नहीं हो सकती।हिंदू संगठन के बंद के दौरान ऐसा होता तो शायद यह कोशिश नहीं होती।हम दोयम दर्जा अपना रहे हैं।यह ठीक नहीं।जब तक हम इस तरह का व्यवहार करेंगे मुसलमानों को भारतीय बना नहीं पाएंगे।दिखने मैं वे भारतीय होंगे पर उनका मन हमारे साथ नहीं होगा।यह देश को कमजोर करता है।हम कम्यूनलों को यह समझने की जरुरत है।
हम अधिकांश भारतीय सांप्रदायिक यानी कम्यूनल हैं।मेरे इस कथन पर बहुत लोगों को आपत्ति हो सकती है।लेकिन यह बात सौ प्रतिशत सच है।सच कड़वा होता है।यदि हम अधिकांश सांप्रदायिक नहीं होते तो देश में मजहब के नाम पर हिंसा नहीं होती।असम के बोड़ो इलाके में हिंसा के बाद उत्पन्न स्थिति को देखने पर मैं यह कह रहा हूं।
बोड़ो इलाके में हिंसा हुई।अधिकांश नेताओं ने सीधे कह दिया कि इसके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठियों का हाथ है।ऐसा कहने के लिए कोई जांच-पड़ताल भी नहीं की।यदि है तो इन बांग्लादेशियों को हम देश का शत्रु मानते हैं और इन्हें तुरंत गिरफ्तार करवाया जाए।भाजपा नेता तो कह रहे हैं कि हिंसा के बाद बनाए गए राहत शिविरों में बांग्लादेशी रह रहे हैं।हद हो गई।हम अपने को धर्मनिरपेक्ष देश मानते हैं,लेकिन भारतीयों को भी बांग्लादेशी कहने से हमें कोई संकोच नहीं।बांग्ला भाषा बोलने, दाढ़ी रखने व लूंगी पहनने से कोई बांग्लादेशी नहीं हो जाता।यह हम कट्टर भारतीयों को जान लेने की जरुरत है।
असम के उन इलाकों में जाने की जरुरत है, जहां ये रहते हैं।मेरा सौभाग्य है कि मैं उस इलाके में जन्मा,पला और बड़ा हुआ हूं।निचले असम के चर इलाकों में यह रहते हैं।जहां विकास का प्रकाश अब तक नहीं पहुंचा है।यह बेहद मेहनती होते हैं।अपने इलाके में काम के अवसर न रहने के कारण ये अन्य जगहों पर काम के लिए यायावरी जीवन जीते हैं।यह इतने पढ़े लिखे नहीं होते कि कागजातों का क्या महत्व है,यह इन्हें समझ में आए।इसलिए इन्हें सीधे बांग्लादेशी करार दिया जाता है।वजह है यह बांग्लादेश से सटे भारतीय इलाकों में रहते हैं और बांग्लादेश के लोगों की तरह ही दिखते हैं।क्या यही इनका दोष है ?देश की आजादी के पहले बांग्लादेश के लोग भारतीय ही थे।यह भी जान लेने की जरुरत है।
यदि इन भारतीयों को हम बांग्लादेशी कहेंगे तो क्या इनके मन में ठेस नहीं पहुंचेगी ?यह अलगाव पैदा नहीं करेगी ? इनके मन में असुरक्षा का भाव पैदा होगा।क्या मुझे या आपको कोई बांग्लादेशी या पाकिस्तानी कहे तो सहन कर पाएंगे ?नहीं न।तो फिर हमें यह कहने का अधिकार किसने दिया ?हां,बांग्लादेशी सीमा खुली रहने का फायदा उठा आ रहे हैं।इन्हें पकड़ने की जरुरत है।सीमा सील किए जाने की जरुरत है।पर बिना सोचे-समझे किसी को उनकी बोली और पहनावे को देखकर बांग्लादेशी कह देना मानहानि करना है।इससे हमें बचना चाहिए।ऐसा कर हम देश को मजबूत करने के बजाए कमजोर कर रहे हैं।
बोड़ो हिंसा के बाद देश के अन्य इलाकों में पढ़ाई और रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे पूर्वोत्तर के लोग वहां से पलायन कर लौट आए।इनमें से कुछेक को वहां धमकी दी गई।इसके बाद फैली अफवाह के चलते लोगों का उन इलाकों से पलायन हुआ।असम के लोगों को देश के अन्य हिस्सों में धमकाना भी हमारे कम्यनूल होने का सबूत है।यदि हम भारतीय हैं तो हम एक हैं।लेकिन मजहब व इलाके के संकीर्ण विचारों को लेकर हमारी सोच संकुचित हो चुकी है।इससे जुड़ाव नहीं,बिखराव पैदा होगा।हमें इससे बचने की जरुरत है।
लेकिन धर्म के नाम पर राजनीति करनेवाले ऐसा करने से बाज नहीं आते।उन्हें तो सिर्फ अपनी रोटियां सेंकने से मतलब है।असम की हिंसा के बाद बाहर नफरत फैलाने का आरोप लगा बजरंग दल ने आल इंडिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष तथा धुबड़ी के सांसद बदरुद्दीन अजमल को गिरफ्तार करने की मांग में 27 अगस्त को असम बंद का आह्वान किया।इस बंद की ज्यादा आलोचना मैंने नहीं देखी।हिंदू संगठन के दिए गए बंद पर ज्यादातर लोग चुपच प घरों में दुबके रहे।जब 28 अगस्त को अखिल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ(आम्सू) ने असम बंद का आह्वान किया तो हिंसक घटनाएं हुई।पत्रकारों पर हमला हुआ।
हिंसा की निंदा की जानी चाहिए,लेकिन जिस तरह इस संगठन के साथ व्यवहार किया जा रहा है,वह बराबर का दर्जा नहीं कहा जा सकता।बंद,बंद हो।हिंसा समर्थनयोग्य नहीं है।बंद के दौरान संगठन के कुछेक सदस्य हिंसा कर सकते हैं।दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।पर इसके लिए पूरे संगठन की आवाज को बंद करने की कोशिश समर्थन योग्य नहीं हो सकती।हिंदू संगठन के बंद के दौरान ऐसा होता तो शायद यह कोशिश नहीं होती।हम दोयम दर्जा अपना रहे हैं।यह ठीक नहीं।जब तक हम इस तरह का व्यवहार करेंगे मुसलमानों को भारतीय बना नहीं पाएंगे।दिखने मैं वे भारतीय होंगे पर उनका मन हमारे साथ नहीं होगा।यह देश को कमजोर करता है।हम कम्यूनलों को यह समझने की जरुरत है।
Wednesday, August 29, 2012
गोगोई की द ग्रेट नौटंकी
राजीव कुमार
टीवी पर मनोरंजन के लिए लोग आजकल हास्य कार्यक्रम अन्य की तुलना में खूब देखते हैं।क्योंकि इससे उन्हें मजा आता है,उनका मनोरंजन होता है।तनाव कम होता है।पर असम के टीवी चैनलों में अब तक हिंदी की तुलना में कम हास्य धारावाहिक दिखाए जाते हैं।लेकिन यहां एक टीवी चैनल में हफ्ते में एक बार चुपोति (हास्ययुक्त निंदा) नामक व्यंग्यात्मक कार्यक्रम दिखाया जाता है।बहुत लोकप्रिय है।इसमें असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को हू-ब-हू कापी किया जाता है, वह लोगों को हंसने के लिए मजबूर कर देता है।गोगोई की बातें ही ऐसी होती है।वह अपनी इस तरह की बातों से ही 11 साल राज्य में शासन कर चुके हैं,लेकिन अब रास्ता आसान नहीं दिखता।
नौटंकी एक प्रकार का लोक नाट्य है जिसमें संवाद तथा संगीत की प्रधानता होती है।अच्छी लगती है।गोगोई इतने दिनों तक अपने संवादों और चापलूसों के संगीत से लोगों को मोह रहे थे,लेकिन अब उनके जाल में लोग फंसना नहीं चाहते।अब लोगों को समझ में आने लगा है।विपक्षी पार्टी असम गण परिषद पर टिप्पणी करते हुए गोगोई पहले अकसर कहते थे खट्टे आम अगप ने दो बार बेच दिए।अब लोग उनकी बातों(अगप) पर भरोसा नहीं करनेवाले हैं।गोगोईजी , आप की नौटंकी से लोग अब ऊब चुके हैं।क्योंकि आप और आपकी सरकार सिर्फ बातें करती है,काम नहीं।मैं तथ्य रखूंगा।
पहला,सुप्रीम कोर्ट और केरल उच्च न्यायालय ने बंद को अवैध घोषित कर रखा है।गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी इसे अवैध करार दिया है,लेकिन इतने सालों तक सरकार को यह अमल करने की इच्छा नहीं हुई।खुद मुख्यमंत्री गोगोई ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि बंद के दौरान जो लोग दुकान खोलते हैं,गाड़ी चलाते हैं,इन्हें किसी तरह की क्षति का सामना करना पड़ता है तो हम इसकी भरपाई करेंगे।इसके लिए फंड रखा जाएगा।लेकिन कुछ नहीं हुआ।अब बोड़ो बहुल इलाके की हिंसा के विरोध में बंद हो रहे हैं तो सरकार को अदालती आदेश की याद आई।इसका अर्थ है कि अब तक आप चाहते तो बंद को बंद करने के कदम उठा सकते थे,लेकिन किया नहीं।क्यों ? असम में अब इस आदेश को सिर्फ एक महीने तक लागू करना चाह रहे हैं,आगे के लिए क्यों नहीं ?यानी सरकार समस्याओं को समस्या बनाकर रखना चाहती है।
दूसरा,बोड़ो इलाके की हिंसा के बीच असम के स्वास्थ्य व शिक्षा मंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा ने अपने पद से इस्तीफा देने का पत्र मुख्यमंत्री गोगोई को थमा दिया।दोनों के बीच काफी समय से मनमुटाव था और सत्ता केंद्रिक लड़ाई चल रही थी।पर अचानक दिल्ली से लौटकर नौंवे दिन डा.शर्मा ने गोगोई से बात की और काम पर लौट आए।गोगोई ने डा.शर्मा को फिर काम करने दिया।इससे साफ हो गया कि गोगोई निर्णय लेने में कमजोर हैं।वे कठपुतली की तरह कार्य कर रहे हैं।लेकिन कहते हैं कि मैं दिल्ली के आदेश से चलनेवालों में नहीं हूं।
तीसरा,बोड़ो इलाके की हिंसा के बाद विभिन्न पक्षों ने मांग की कि इलाके में जो अवैध हथियार हैं,उन्हें जब्त किया जाए।लेकिन गोगोई इसमें भी ढुलमुल रवैया अपनाते रहे।28 अगस्त को उन्होंने कहा कि 27 अगस्त को सेना को हथियार जब्त करने का अधिकार दिया गया है।पर इतनी देर क्यों? पिछले एक महीने से क्या किया गया ? जब किसी इलाके में चुनाव होते हैं तो चुनाव आयोग के निर्देश पर यही पुलिस फटाफट हथियार जब्त करती है।फिर गोगोई की सरकार में यह क्यों नहीं हो पाया?किस के प्रति गोगोई नरम है और क्यों? जो उन्हें हथियार जब्त करने में दिक्कत होती है।
यह सब सवाल हम गोगोई से पूछ नहीं सकते।क्या हम उनसे डर गए हैं? नहीं।तो फिर क्यों? वे तानाशाह बन गए हैं।इन कड़वे सवालों को सुनकर उन्हें गुस्सा आ जाता है।पत्रकार हूं,इसलिए उनके संवाददाता सम्मेलनों को कवर करने जाता हूं।मेरे सवालों से वे इतने घबरा गए हैं कि अब तो उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कह भी दिया कि मैं आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा।पहले मेरे कई सवालों पर गुस्से में आकर उन्होंने ऐसे जवाब दिए हैं कि स्थानीय अखबारों की सुर्खियां बनी।उदाहरण के तौर पर कुछ पेश करना चाहूंगा।
असम में बाढ़ आई हुई थी,गोगोई अमेरिका गए हुए थे।बाढ़ के हालात जानने के लिए प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने मंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा को कई बार फोन किया।जब गोगोई से मैंने पूछा कि प्रधानमंत्री ने आपसे पूछने के बजाए हिमंत को फोन कर जानकारी ली तो गोगोई ने गुस्से में कहा-प्रधानमंत्री हिमंत को सुपर मुख्यमंत्री बना दे।इसी तरह एक बार मैंने राज्य में अगप शासनकाल में हुई गुप्त हत्याओं पर पूछा।कांग्रेस इस मसले को लेकर खूब सक्रिय रहती है।सत्ता में आने पर गुप्त हत्या के दोषियों को सजा दिलाई जाएगी,यह कांग्रेस का नारा था।तीसरी बार लगातार आई है,पर वायदा अब तक पूरा नहीं हुआ है।एक मुख्यमंत्री इतना असहाय कैसे हो सकता है।इस पर गोगोई ने कहा था-मुख्यमंत्री क्या, देश का गृहमंत्री भी असहाय हो सकता है।इस तरह अनेक वाकये हुए हैं।
एक समय था जब गोगोई खुद कहते थे पूछिए,क्या पूछना है ? वे पारदर्शिता की बात करते थे।लेकिन अब सच का सामना करने से वे घबराते हैं।वे सिर्फ सरकार की प्रशंसा सुनने के आदी हो गए हैं।अभी विभिन्न राज्यों में पेट्रोल व गैस के दाम बढे।कई राज्यों ने अपने यहां रियायत का एलान किया।पर गोगोई खामोश रहे।इससे बड़ी कोई नौटंकी आपने कभी देखी है,जो सहजता के साथ राज्य में बिना कोई खर्च के लोग देख रहे हैं।वाह,गोगोईजी।आपका कोई जवाब नहीं।
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