Monday, March 31, 2025

हिमंत की नफरती राजनीति


राजीब कुमार सिंघी

असम में अगले साल अप्रैल में चुनाव होने हैं।इसके पहले मुख्यमंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करने में लगे हैं।अकेले वे नहीं,उनके मंत्री भी इस काम में लगे हैं।संविधान के नाम पर शपथ लेकर वे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ जहर उगल रहे हैं। संविधान का माखौल उड़ाया जा रहा है।हिंदुओं के मन में डर पैदा किया जा रहा है।

पहले मेघालय के एक निजी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डा.महबूबल हक,जो असम के ही हैं, के खिलाफ मुहिम छेड़ी।उन्हें गुवाहाटी में आनेवाली बाढ़ के लिए जिम्मेवार ठहराते हुए बाढ़ जेहाद से जोड़ा।फिर उनका ओबीसी प्रमाण पत्र फर्जी बताया,लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं की।अंततः उन्हें असम में स्थित उनके एक निजी स्कूल में परीक्षार्थियों को परीक्षा में मदद के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।पत्रकारों ने जब मुख्यमंत्री से पूछा तो उन्होंने कहा कि हक को तो लंबे समय तक जेल में रहना पड़ेगा।मुख्यमंत्री कोई जज नहीं कि फैसला सुनाए।पर वे ऐसा ही कर रहे हैं।हक पर जो मामले दर्ज किए गए थे,उन्हें उन मामलों में जमानत मिल चुकी है।

अब एक पत्रकार दिलवार हुसैन मजुमदार को गिरफ्तार किया गया।दिलवार एपेक्स बैंक के घोटाले के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन की कवरेज करने गया था।जब बैंक के प्रबंध निदेशक डी सैकिया से उनका पक्ष जानना चाहा तो सैकिया ने दिलवार को ऊपर बुलाया।लेकिन बाद में पुलिस ने दिलवार को गिरफ्तार कर लिया।आरोप लगाया गया कि उसे एससी-एसटी कानून के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।पर दूसरे ही दिन इस मामले में जमानत मिली तो पुलिस ने बैंक के कागजात चोरी के प्रयास के और एक मामले में दिलवार को गिरफ्तार कर लिया।इस मामले में भी दूसरे दिन दिलवार को जमानत मिल गयी।इससे साफ हो गया कि दिलवार को फर्जी मामले में फंसाया गया है।

दिलवार एक न्यूज पोर्टल द क्रास करंट में काम करता है।इस पोर्टल में मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के खिलाफ समाचार प्रकाशित होते रहते हैं।आशंका है कि इसीलिए यह कार्रवाई की गयी।यह पोर्टल अखिल गोगोई की पार्टी राइजर दल के नेता से जुड़ा है।

इन दो घटनाओं के बाद मुख्यमंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा के विवादास्पद बयान सामने आने लगे।दिल्ली में एक टीवी न्यूज चैनल के कार्यक्रम में डा.शर्मा ने कहा कि दिलवार को मेरे खिलाफ लिखने के लिए गिरफ्तार नहीं किया गया है।वह बैंक में धमकी देकर कर्ज लेना चाहता था।इसलिए उसे गिरफ्तार किया गया है।इससे पहले वे दिलवार की गिफ्तारी पर कह चुके हैं कि दिलवार पत्रकार नहीं है।वह तो वकील,व्यापारी और डंपर मालिक है।हमारी सरकार पोर्टल के पत्रकारों को स्वीकृति प्रदान नहीं करती।मुख्यमंत्री यहीं नहीं थमे।उन्होंने अब कहना शुरु किया कि महबूबल हक और दिलवार जैसों को खत्म करना ही मेरा काम है।मुख्यमंत्री के इस तरह के बयानों से स्पष्ट हो जाता है कि वे कानून के अनुसार काम नहीं कर रहे हैं।

राज्य में राभा हासोंग स्वशासी परिषद के चुनाव 2 अप्रैल को हैं।इसका प्रचार करते हुए मुख्यमंत्री ने लोगों से कहा कि सुअर ज्यादा पालिए ताकि वे आसपास आ ही नहीं सके।इससे स्पष्ट होता है कि वे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कितना विष वमन कर रहे हैं।उनके मंत्री अशोक सिंघल और पीयूष हजारिका भी इस मामले में उनसे दो कदम आगे चल रहे हैं।जब गुजरात में दंगे हुए थे तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से राजधर्म का पालन करने को कहा था।अब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं।उन्हें भी भाजपा नेता तथा मुख्यमंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा को राजधर्म का पालन करने को कहना चाहिए।लेकिन उम्मीद नहीं कि वे कहेंगे।

भाजपा में तो होड़ मची है कि कौन कितना बड़ा हिंदू नेता है।उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पछाड़ने की दौड़ में हिमंत चल रहे हैं।इसके लिए वे कानून को ही अपने पैरों से रौंद रहे हैं।उन्हें लगता है कि लाभार्थियों के बल पर वे 2026 का चुनाव जीत जाएंगे।पर उन्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि जनता बहुत सजग है।वह सत्ता से उखाड़ भी फेंक सकती है।एआईयूडीएफ के अध्यक्ष बदरुद्दीन अजमल का उदाहरण सामने है।मुस्लिम समुदाय के लोगों को जब स्पष्ट पता चल गया कि अजमल और हिमंत में सांठगांठ है तो धुबड़ी संसदीय सीट की जनता ने लोकसभा चुनाव में उन्हें करारी हार दिखा दी,वहीं हिमंत विश्व और उनके मंत्रियों की जी-तोड़ कोशिश के बाद भी गौरव गोगोई जोरहाट से जीत गए।इससे हिमंत विश्व शर्मा को सीख लेनी चाहिए।संविधान के नाम पर शपथ लेकर इस तरह नहीं करना चाहिए।

 

Sunday, September 29, 2019

असम में चाय की प्याली में उठा तूफान



राजीब कुमार सिंघी

असम में चाय की प्याली में तूफान उठा है।दुर्गापूजा आते ही चाय बागानों में श्रमिकों के बोनस का मुद्दा उठने लगता है।चाय बागान प्रबंधन मंदी की मार का रोना रोते हैं तो साल भर से बोनस की राह जोते चाय बागान श्रमिकों का खून खोला हुआ रहता है।ऐसे में चाय बागान में न चाहनेवाली घटनाएं घटती है और बेकसूर लोग मारे जाते हैं।
हाल ही में टियोक चाय बागान के डाक्टर देबेन दत्त की हत्या गुस्साए चाय श्रमिकों ने कर दी।वजह थी कि जब घायल श्रमिक को इलाज के लिए बागान के अस्पताल लाया गया तो डाक्टर नहीं था।श्रमिकों का कहना है कि उन्होंने बागान की एंबुलेंस को भी बुलाया।लेकिन वह नहीं आई।अस्पताल पहुंचे तो डाक्टर नहीं।इसलिए घायल श्रमिक सोमरा मांझी मारा गया।गुस्साए श्रमिकों ने डाक्टर देबेन दत्त की पीट-पीटकर हत्या कर दी।श्रमिकों ने कहा कि डा.दत्त काफी उम्रदराज थे इसलिए हमने कोई युवा डाक्टर नियुकत् करने की मांग प्रबंधन से कई बार की थी।लेकिन प्रबंधन ने हमारी एक नहीं सुनी।
इस घटना से साफ होता है कि श्रमिकों का गुस्सा डाक्टर को लेकर था।वह सोमरा मांझी के मौत के साथ ही फूट पड़ा।चाय बागान के श्रमिक दबे-कुचले लोग हैं।उनकी जिंदगी नरक से भी ज्यादा दुखदायी है।बागानों की लाइन में जाने से यह बात पता चलती है।चाय बागानों के अस्वस्थ्यकर माहौल में काम करते-करते यह समय से पहले रोगग्रस्त हो जाते हैं।न शुद्ध पेयजल मिल पाता है।लाइनों में नाले वगैरह का इंतजाम नहीं होता।गंदगी में जीवन जीते-जीते ये आंत्रशोथ व अन्य गंभीर बीमारी के शिकार हो जाते हैं।बागान में थका देनेवाले परिश्रम के बाद इससे हलका होने के लिए ये देशी शराब का सेवन करते हैं,जो क्वालिटी में सही नहीं होती।ये इनके लिए जानलेवा साबित होती है।पीने के बाद घर का माहौल भी ठीक नहीं रहता।मारपीट।बच्चे ये देखते हुए बड़े होते हैं।आर्थिक तंगी से परेशान वे राज्य के अन्य स्थानों में रोजगार की तलाश में जाते हैं।जहां भी उन्हें अधिकांश समय नारकीय जीवन जीना होता है।
राजनीतिक पार्टियां इनसे वोट लेने के लिए इन्हें विभिन्न वादों से आकर्षित करती है।लोभ देती है।पर वोट मिलने के बाद ये भुला देती है।आज भी इनके जीवनयापन का मानदंड उन्नत न होना इसी बात को दर्शाता है।असम में सत्तारुढ़ भाजपा नेतृत्ववाली सरकार ने वादा किया था कि वह इनकी दैनिक मजदूरी 351 रुपए कराएगी।लेकिन आज भी इन्हे रोज 167 रुपए की मजूदरी मिलती है।यह तो ब्रहमपुत्र घाटी के बागान में है,लेकिन बराकघाटी के बागानों में यह 150 रुपए है।इन्हें हर रोज 24 किलो हरी पत्तियां तोड़नी होती है।इससे कम होने पर मजदूरी में कटौती कर दी जाती है।
शोषण का यह दर्द जब फूटता है तो परिणाम भयावह होते हैं।असम के बागानों में चाय श्रमिकों द्वारा नृशंस हत्या के अनेक मामले हैं।वर्ष 2012 में तिनसुकिया जिले के बरदुमसा चाय बाग़ान के मालिक मृदुल कुमार भट्टाचार्य और उनकी पत्नी को चाय मजदूरों ने उनके ही बंगले में जिंदा जला दिया था।इसके अलावा इस साल मई महीने में डिब्रूगढ़ जिले के डिकम चाय बाग़ान में मजदूरों की भीड़ ने डाक्टर प्रवीण ठाकुर को भी पीटा ।वे बाल-बाल बचे।अंधविश्वास भी है।डायन हत्या जैसी घटनाएं होती है।जब तक इनमें जागरुकता लाकर इनके जीवन को बेहतर नहीं किया जाएगा तब तक इस तरह की घटनाएं देखने को मिलती रहेंगी।
असम में बड़े चाय बागानों की संख्या 765 के आसपास है जबकि लघु चाय उत्पादकों की संख्या एक लाख के आस-पास पहुंच चुकी है।इनमें लगभग हर रोज सात लाख स्थाई श्रमिक काम करते हैं।अस्थाई श्रमिक और बाल मजदूरों की संख्या अलग से है।जब बोनस देने का समय आता है तो चाय बागानों के प्रबंधन नुकसान का रोना शुरु करते हैं।लेकिन चाय की गुणवत्ता बढ़ाने और इसकी बिक्री को बढ़ाने के लिए कोई कोशिश नहीं करते।जब तक इन्हें सारी सहूलियतें सरकार से मिलती रहे तब तक इन्हें दिक्कत नहीं।जैसे ही सरकार ने मजदूरों को दिए जानेवाले रियायत दर के राशन को बंद कर दिया तो इन्हें समस्या आने लगी।मजदूरों के लिए सहूलियतें देने को कहा तो दिक्कत आने लगी।कई बड़ी कंपनियां जो पहले मुनाफा कमाती थी अब सरकार के कदमों से बागान बेचना शुरु कर चुकी है।कई वहां दूसरे उद्योग लगाना शुरु कर चुकी है।इन्हें जहां ज्यादा फायदा नजर आता है वहीं का रुख कर लेते हैं।इससे अब चाय उद्योग के सामने संकट आ गया है।
चाय उद्योग के लोग चाहते हैं कि श्रमिकों को सारी सुविधाएं सरकार दें और वे सिर्फ चाय का उत्पादन करे और उससे मुनाफा कमाएं।यही इस उद्योग के संकट का कारण बन रहा है।चाय उद्योग गंभीरता से चाय को अलग-अलग तरीके से बेचे और उसमें नयापन ला तो निश्चित तौर पर उसके लिए भला है।तब संकट के बादल छटेंगे और वह श्रमिकों को बेहतर दे पाएगा।जब बेहतर दिन थे तब भी श्रमिकों के उत्थान के लिए इन्होंने कुछ नहीं किया।नहीं तो आज की स्थिति पैदा नहीं होती। असम देश के कुल चाय उत्पादन के पचास फीसदी का उत्पादन करता है
असम में ऐसी भी चाय का उत्पादन होता है जिसकी प्रति किग्रा कीमत 75 हजार रुपए तक है।गुवाहाटी चाय नीलाम केंद्र में अक्सर इतने दामों पर चाय नीलाम होने की खबरें मीडिया में आती हैं।इसका अर्थ है कि बेहतर चीज की कीमत हमेशा मिलती ही है। डिकोम चाय बागान की गोल्डन बटरफ्लाई चाय प्रति किग्रा 75 हजार रुपए में बिकी ।यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में चाय की बिक्री का एक रिकार्ड है।गोल्डन टी टिप्स चाय भी 70,501 रुपए प्रति किग्रा में बिकी थी।डिब्रुगढ़ के मनोहरी चाय बागान की मनोहरी गोल्ड टी एक किग्रा चाय पचास हजार रुपए प्रति किलोग्राम में बिकी है। गुवाहाटी नीलाम केंद्र के सचिव दिनेश बियानी ने बताया चाय प्रेमी बेहतर चाय के लिए कुछ भी कीमत अदा कर सकते हैं। इस तरह की चाय की देश ही नहीं विदेशों में भी काफी मांग है।जब चाय की इतनी मांग है तो फिर चाय उद्योग रो क्यों रहा है।निश्चित तौर पर वह कोशिश नहीं कर रहा है।उसका मकसद सिर्फ कमान है।नहीं तो यह हाल क्यों।यह सोचने की बात है।
जो श्रमिक अपने हाड़-मांस से चाय के पौधों को अपने बच्चों की तरह बड़ा कर उनकी पत्तियों को तोड़कर देश-दुनिया को चाय की चुस्कियों से तरोताजा करने में अपना योगदान करते हैं उनका जीवन कब तक हम इस तरह जीन को छोड़ते रहेंगे।यह अब सोचने का वक्त आ गया है,नहीं तो श्रमिकों का गुस्सा कभी ओर विकराल रुप धारणा कर सकता है।

एनआरसीःउन्नीस लाख लोगों को विदेशी कहना सही नहीं

राजीब कुमार सिंघी

असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी(एनआरसी) की अंतिम सूची शनिवार को प्रकाशित की गई।इसमें कुल आवेदनकर्तातओं से लगभग 19 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं हुए हैं।इन 19 लाख को विदेशी कहना सही नहीं होगा।खुद गृह मंत्रालय ने कहा है कि जिनके नाम नहीं होंगे वे विदेशी नहीं होंगे।सही है।विदेशी न्यायाधिकरण ही किसी को विदेशी करार दे सकता है।जिनके नाम नहीं होंगे वे विदेशी न्यायाधिकरण में 120 दिनों में अपील कर सकेंगे।इसके लिए अतिरिक्त विदेशी न्यायाधिकरण बनाए गए हैं।इसके बाद ही बाकी की तस्वीर साफ होगी।
उन्नीस लाख लोगों में से अनेक देश के अन्य राज्यों के लोग हैं।असम के भी लोग हैं।लेकिन कागजातों को दे नहीं पाने के चलते उन्हें अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया है।अनेक के नामों में गड़बड़ है।किसी कागजात में नाम कुछ है तो किसी में कुछ।इसलिए 19 लाख लोग विदेशी नहीं हो सकते।जो विदेशी होगा वह तो पकड़े जाने के डर से इन सब झमले में पड़ेगा ही नहीं।वह तो देश के किसी अन्य हिस्से में चला जाएगा,जहां फिलहाल एनआरसी की प्रक्रिया नहीं है।ऐसे में असम में एनआरसी का अद्यतन करना एक निरर्थक प्रयास है।जब तक पूरे देश में एनआरसी नहीं होगी तब तक यह निरर्थक ही होगी।
असम में विदेशियों को खदेड़ने के लिए छह साल का असम आंदोलन चला।1985 में असम समझौता हुआ।लेकिन 34 साल बाद भी इस समस्या का हल नहीं निकला।एनआरसी सुप्रीम कोर्ट के देखरेख में हुई।फिर भी असम आंदोलन करनेवाला अखिल असम छात्र संघ(आसू),भाजपा,सुप्रीम कोर्ट में एनआरसी के लिए आवेदन करनेवाला असम पब्लिक वर्क्स(एपीडब्ल्यू) एनआरसी की अंतिम सूची से संतुष्ट नहीं हैं।सबको लगता है कि जितने नाम छूटे हैं वह संख्या कम है।जब दूसरे प्रारुप में 40 लाख लोगों के नाम नहीं आए तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इन्हें बांग्लादेशी करार दिया था।लेकिन वास्तव में सभी बांग्लादेशी नहीं थे।इसमें से आधे अंतिम सूची में जगह बनाने में सफल हो गए।लेकिन तब भी राजनीति हो रही थी और अंतिम सूची आने के बाद भी राजनीति ही हो रही है।
एनआरसी की सूची को गलत बतानेवाले पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत हितेश्वर सैकिया,तत्कालील केंद्रीय गृह मंत्री दिवंगत इंद्रजीत गुप्त के दिए गए बयानों का जिक्र कर कहते हैं यह संख्या कम है।असम विधानसभा में दिवंगत सैकिया ने एलान किया था कि राज्य में 30 लाख बांग्लादेशी हैं।यह बयान आज से लगभग तीस साल पहले आया था।पर हंगामा मचने के बाद उन्होंने बयान वापस ले लिया था।वहीं केंद्रीय गृहमंत्री दिवंगत इंद्रजीत गुप्त ने कहा था कि पचास लाख बांग्लादेशी हैं।असम के पूर्व राज्यपाल एस के सिन्हा ने भी अपनी एक रिपोर्ट में राज्य में 60 लाख बांग्लादेशी रहने की बात कही थी।अब विरोध करनेवाले संगठनों का कहना है कि इतने साल बाद ये बांग्लादेशी बढ़ने के बजाए कैसे कम गए।लेकिन कोई भी बांग्लादेशियों का आंकड़ा पुख्ता कैसे दे सकता है।यह पता कैसे चलेगा।जब तक शिनाख्त नहीं होगी तो आंकड़ा कैसे आएगा।चर में रहनेवाले बांग्लाभाषी मुसलमानों को बिना कोई आधार के बांग्लादेशी कह देना राजनीति के सिवाय और कुछ नहीं है।एनआरसी में जिसके कागजात सही नहीं थे चाहे वह भारतीय ही क्यों न हो,नाम नहीं आए।
राष्ट्रीय नागरिक पंजी के राज्य समन्वयक प्रतीक हाजेला ने कहा है कि एनआरसी के अद्यतन में सर्वोत्तम वैज्ञानिक तरीका अपनाया गया है।हाजेला ने यह बात सचेतन नागरिक मंच के आरोपों का जवाब देने के लिए लिखे पत्र में कही है।मंच भाजपा समर्थित संगठन है।इसने ही राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर पुनःसत्यापन की मांग की थी।केंद्र और राज्य सरकार ने भी मंच के ज्ञापन के जरिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पुनःसत्यापन का अनुरोध किया था जिसे अदालत ने ठुकरा दिया था।सुप्रीम कोर्ट में एनआरसी का मामला प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई देख रहे हैं।वे काफी सख्त हैं।निश्चय ही उन्होंने हाजेला द्वारा दिए गए तथ्यों को देखकर ही कोई फैसला किया है।
हाजेला ने आगे कहा कि एनआरसी में नाम शामिल कराने के लिए आवेदनकर्ताओँ ने जो कागजात दिए हैं उनका सत्यापन वैज्ञानिक तरीके से किया गया है। अत्याधुनिक सूचना प्रौद्योगिक का इस्तेमाल न करने से छह करोड़ कागजातों का सत्यापन करना आसान नहीं था।मंच ने एनआरसी में काफी विदेशियों के नाम शामिल होने की बात कही,लेकिन आपत्तियां दर्ज कराने के लिए जो कानूनी प्रावधान थे,उनका इस्तेमाल मंच ने नहीं किया।एनआरसी कार्यालय के पास ऐसा कोई रिकार्ड नहीं है जिससे पता चलता हो कि मंच ने एनआरसी के प्रारुप में गलत नाम शामिल होने को लेकर आपत्ति दर्ज की हो।आरोप लगानेवाले तथ्यों को सही ढंग से नहीं रख रहे हैं।बिना तथ्य ही सीधे आरोप लगाए जा रहे हैं।
मंच अपने ज्ञापन में कोई विशेष आरोप देने में सफल नहीं हुआ।मंच ने सिर्फ मोरिगांव के एक स्कूल शिक्षक खाइरुल इस्लाम का जिक्र किया जो एनआरसी के हाथ से लिखनेवाले प्रारुप में कुछ समय के लिए था।इसके कुछ दिनों बाद हाथ से प्रारुप लिखने की पूरी प्रक्रिया को ही बंद कर दी गई। मंच ने अपने ज्ञापन में कुछ एनआरसी के एप्लीकेशन रिसीप्ट (एआरएन) नंबरों का उल्लेख किया ,पर वास्तव में उस तरह के कोई एआरएन नंबर है ही नहीं।मंच ने नंबर के तौर पर पांच अंक के एआरएन नंबर लिखे हैं जबकि एआरएन नंबर 21 अंकों के होते हैं।मंच ने अपने ज्ञापन में स्वदेशी लोगों के नाम एनआरसी के प्रारुप में न रहने की बात कही है।इस पर भी वह कोई उदाहरण पेश नहीं कर पाया है। राष्ट्रपति को सौंपे गए ज्ञापन में 25 लाख लोगों के हस्ताक्षर रहने की बात कही है।पर वास्तव में ज्ञापन में 1.7 लाख लोगों के ही हस्ताक्षर थे।
मालूम हो कि राज्य एनआरसी समन्वयक के कार्यालय की स्थापना 2013 में की गई थी।पर सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में एनआरसी के अद्यतन का कार्य सही अर्थों में फरवरी 2015 में लीगेसी डाटा के प्रकाशन के साथ ही हुआ।उसी साल मार्च से अगस्त तक नागरिकों से आवेदन मांगे गए।3.29 करोड़ लोगों ने एनआरसी में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन किया।उसी साल सितंबर में फील्ड वैरिफिकेशन शुरु हुआ।इसके बाद फैमिली ट्री वैरिफिकेशन किया गया।फैमिली ट्री वैरिफिकेशन पूरी प्रक्रिया में गेम चेंजर का काम कर गया।इस प्रक्रिया के दौरान ही ज्यादातर अनियमितताएं पकड़ में आई।पहला प्रारुप 31 दिसंबर 2017 की मध्यरात्रि को प्रकाशित किया गया।अंतिम प्रारुप 30 जून 2018 को 40 लाख आवेदनकर्ताओं के नाम के बिना प्रकाशित हुआ।पिछले साल 25 सितबंर को ही दावों और आपत्तियों को स्वीकारने की प्रक्रिया शुरु हुई।मजे की बात है कि एनआरसी के अंतिम प्रारुप में नाम न रहनेवाले 40 लाख लोगों में से चार लाख ने फिर से दावा ही नहीं किया जबकि दो लाख शिकायतें दर्ज हुई।बाद में एनआरसी के प्रारुपों में नाम रहनेवाले 1.02 लाख लोगों के नाम हटाए गए।वैरिफिकेशन के दौरान यह बात सामने आई कि इनके नाम एनआरसी सूची में शामिल होने के योग्य नहीं थे।
अब एनआरसी की अंतिम सूची के साथ ही फिर आलोचनाएं शुरु हो गई है।विदेशी-विदेशी का खेल शुरु हो गया है।राजनीति शुरु हो गई है।जैसे यह अंतहीन प्रक्रिया है।पर पूरे देश में एनआरसी करने से ही सारी समस्याएं खत्म होंगी और सही अर्थों में पता चलेगा कि भारत में कितने लोग भारतीय नागरिक न होकर विदेशी हैं।तब तक इस तरह का खेल चलता रहेगा और कुछ संगठन और पार्टियां अपनी-अपनी रोटी सेंकती रहेंगी।
असम में हर काम का विरोध करने का जैसे एक रिवाज है।बिना कोई ठोस आधार के सिर्फ भावनाओं में बहते रहते हैं और आंदोलन की फैक्ट्रियां चलाते रहते हैं।इससे राज्य को ही नुकसान हो रहा है।चालीस साल से विदेशियों को खदेड़ने के आंदोलन के बाद एनआरसी आई तो भी समस्या खत्म नही हुई।होगी भी नहीं।क्योंकि इन सब को अपनी-अपनी दुकान चलानी है।पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का एक बयान बेहद याद आता है।असम में मतदाता परिचय पत्र देने का आसू विरोध कर रहा था।उसका कहना था कि विदेशियों के हाथों में मतदाता परिचय पत्र होगा और वे भारतीय हो जाएंगे।जब एनआरसी होगी तभी मतदाता परिचय पत्र दिया जाए।यदि मुख्यमंत्री गोगोई आसू की इस मांग को मान लेते तो राज्य के लोगों के पास अब भी मतदाता परिचय पत्र नहीं होता।लेकिन गोगोई ने चतुराई की।लोगों से मतदाता सूची में फोटो लगाने की बात कहकर फोटो लिए और अचानक सबको मतदाता परिचय पत्र दे दिया गया।आसू का विरोध फुस्स हो गया।एनआरसी का विरोध भी कुछ ऐसा होनेवाला है।

Sunday, December 25, 2016

शासनतंत्र को पटरी पर लाने के लिए करना पड़ रहा है संघर्ष

असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल से वरिष्ठ पत्रकार राजीव कुमार की विशेष बातचीत



छह महीने सरकार चलाने के बाद आप संतुष्ट हैं? आप ने जैसा सोचा था, वैसे सरकार चल रही है या कोई समस्या है?
- शासन तंत्र में अराजकता आ गयी थी। नीति-नियमों का उल्लंघन कर कई काम किये गये। दिसपुर, जिला स्तर, प्रखंड स्तर, पंचायत स्तर में घोर अनियमितताएं हुईं। अब इन्हें फिर से पटरी पर लाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आम जनता सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार बढ़ने से कष्ट झेल रही थी। गरीब लोगों की सरकारी कार्यालयों में कोई पूछ नहीं थी। कुछेक बिचौलिए पूरी शासन व्यवस्था को ही निगल चुके थे। इसके चलते शासन व्यवस्था के प्रति लोगों का मोहभंग हो गया था। यह विश्वास वापस लौटा लाने के लिए हम पिछले कुछ दिनों से काफी संघर्ष कर रहे हैं। कष्ट करना पड़ रहा है। आने वाले दिनों में और अधिक कष्ट करना पड़ेगा, क्योंकि केंद्र और राज्य सरकार की जितनी योजनाएं हैं, वे शहर, गांव, चाय बागान, चर इलाकों के लिए हैं। इन योजनाओं से पहाड़ी, मैदानी और सभी जगहों पर रहने वाले लोग लाभान्वित हों, इसके लिए शासन-व्यवस्था से भ्रष्टाचार को दूर करना होगा। सभी स्तर पर, मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर जमीनी स्तर तक भ्रष्टाचार खत्म करना होगा और सभी को कार्यक्षम बनाना होगा। कार्यदक्षता बढ़ानी होगी। अधिकारी, कर्मचारी, मंत्री, विधायक, सांसद, पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधि, नगर समिति, नगरनिगम के चुने हुए प्रतिनिधियों समेत सभी की कार्यदक्षता बढ़ानी होगी, तभी जनता लाभान्वित होगी। इसी उद्देश्य को आगे रख हम पिछले छह महीनों से संघर्ष कर रहे हैं। इसके लिए हमें बार-बार समीक्षा बैठकें करनी पड़ रही हैं। सभी स्तर के अधिकारियों-कर्मचारियों व विभागीय मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श करना पड़ रहा है। हमने राज्य के बौद्धिक तबके से भी सुझाव लिये हैं। अब तक सरकार की ओर से उठाये गये कदमों में जनता शामिल हुई है और जनता के सहयोग से हम कुछ कार्यों में सफलता पाने में कामयाब हुए हैं। अतिक्रमण हटाया जाना इनमें शामिल है। काजीरंगा से लेकर मोरीगांव, दरंग, सिपाझार, श्रीश्री शंकरदेव के जन्मस्थान बटद्रवा में अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया गया। इन अतिक्रमण विरोधी अभियानों में जनता का सहयोग मिलने से इनमें सफलता हाथ लगी। इसके अलावा चुनाव के दौरान हमने जो वायदे किये थे, उनको भी लागू कर रहे हैं। इनमें भारत-बांग्लादेश सीमा को सील करना, एनआरसी का अद्यतन शामिल है। जनता का सहयोग इनमें मिल रहा है। हम इन कामों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था-सर्व आनंद यानि सर्वानंद। आप जब पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे तब असम की जनता मोदीजी के कहे अनुसार आनंदित होगी? क्या आप उस दिशा में बढ़ रहे हैं?
- समाज के सभी स्तरों के लोगोंको विश्वास में लेकर बराक-ब्रह्मपुत्र और पहाड़-समतल के वृहत असमिया समाज के बीच समन्वय की धारा मजबूत करने और एक जनगोष्ठी को दूसरी जनगोष्ठी द्वारा विश्वास में लेकर आगे बढ़ने के माहौल को बनाना है। इसलिए जाति, गोष्ठी, भाषा, धर्म से ऊपर उठ कर सभी को साथ लेकर ऐसे ही असम के निर्माण के लिए हम आगे बढ़ रहे हैं। जिस असम में हम परिवर्तन लाने की बात सोच रहे हैं, यह तभी संभव होगा, जब हमारे बीच समन्वय होगा। समन्वय के साथ ही हम कठोर परिश्रम करेंगे। परिवर्तन का माहौल बनाना होगा। परिवर्तन का अर्थ है मन का परिवर्तन, संकीर्णता के परिवर्तन से। इसलिए लोगों के मन में जितनी मलिनता है, जितने भी संदेह, शंका, भय हैं, इन्हें दूर कर लोग खुले मन से असम में रह सके। असम की मिट्टी में, पूरे प्राकृतिक परिवेश में, भौगोलिक वातावरण में, वन संसाधन और संभावना का विकास कर असम के विकास के लिए अपने को लगा सकने वाला परिवर्तन। इसलिए मैं सोचता हूं कि इस बारे में निश्चित रूप से जनता ने सकारात्मक फैसला लिया है और हम सब सच्चाई और निष्ठा से काम करते रहे तो हमें जनता का समर्थन मिलता रहेगा।
आईएमडीटी एक्ट खारिज होने के बाद आप असम के जातीय नायक बने। भाजपा से मुख्यमंत्री बनने के बाद आपको विपक्ष खलनायक बता रहा है। लेकिन आप इन पर समय जाया करने के बजाय अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। इतना धैर्य कैसे संभव है?
- मैंने कभी अपने को जातीय नायक नहीं समझा है। सोचना भी नहीं चाहिए। मैं जातीय नायक तब बनूंगा, जब मैं सर्वोच्च त्याग करुंगा। जीवन का सर्वोच्च त्याग देश के लिए, समाज के लिए, जाति के लिए करुंगा। सर्वोच्च त्याग तो मैंने नहीं किया है। इसलिए मैं समाज के लिए, सभी श्रेणी के लोगों के लिए, जाति के लिए अंतर्मन से साथ काम करने का प्रयास कर रहा हूं। जातीय नायक वे हैं, जो अपने जीवन में देश के हित, समाज हित, लोगों के हितों के लिए घोर विपत्तियां सहते हुए महान बलिदान देते हैं। वास्तव में वीर शहीद ही जातीय नायक होते हैं। इन जातीय नायकोें का आदर्श हम अपनाएंगे। जीवन के रास्ते में हम भविष्य के समाज को गढ़ने के लिए प्रयास करते रहेंगे। इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। मैंने कभी यह भावना मन में नहीं पाली। मैं यह नहीं हूं, यह मैं जानता हूं, क्योंकि एक जातीय नायक होने के लिए समस्त जनता के हृदय में जगह बनानी होगी। सभी लोगों का भरोसा जीतना होगा। मेरे गुरु ने मुझे यह सीख दी है। मुझे असम की जनता का प्यार मिला है और यही मेरी शक्ति का आधार है। इसलिए मैं जनता के प्रति अपनी श्रद्धाभक्ति रखकर सदैव काम करने के लिए इच्छुक हूं। किसी भी श्रेणी की जनता हमारे नेतृत्व से शंकित न हो या वे असुरक्षा के माहौल में न रहें, इसके लिए ही मैं प्रयास करता रहूंगा। सभी को काम करने के लिए सुरक्षित वातावरण, खुले मन से काम करने का वातावरण बनाना ही हमारा प्रधान लक्ष्य है।
आपके कई मंत्री, विधायक सांप्रदायिक टिप्पणी कर स्थितियां जटिल बनाते हैं, लेकिन आपको नुकसान हो सकता है, यह जानते हुए भी आप हार्डलाइन नहीं अपनाते। आगे भी आप ऐसे रह सकेंगे?
- हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने हमें जो नीति सौंपी है, जिस नीति के आधार पर समाज और देश को गढ़ने को कहा है, उसी को लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं। यह है सबका साथ, सबका विकास। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि समाज के सबसे दरिद्र को तुम गले लगाना, शक्तिशाली करना, आर्थिक रूप से मजबूत करना, इज्जत देना और इन्हें सम्मान के साथ जीने का माहौल बना देना। इसलिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय के आदर्श, महात्मा गांधी के आदर्श और आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमें जो नीति शिक्षा दी है, उसके आधार पर हमें असम की 3 करोड़ 20 लाख लोगों की आस्था लेकर आगे बढ़ना होगा। भारत में रहने वाले लोगों के प्रति श्रद्धाभाव रखकर हमें कार्य करना पड़ेगा। भारतवर्ष को शक्तिशाली करने के लिए असम को शक्तिशाली बनाना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आपके बीच बहुत समानता है। वे भी अकेले रहते हैं और आप भी। देर रात तक कार्य करना उनका भी शगल है। मोदीजी देश के लिए और आप असम के लिए कार्य कर रहे हैं। आपके परिवार के किसी व्यक्ति को भी राजनीति या आपके साथ सक्रिय रूप में देखा नहीं जाता। इसके चलते ही राज्य में आप कार्य कर पा रहे हैं?
- मेरे माता-पिता ने मुझे जो नीति शिक्षा दी है, वे आज इस दुनिया में नहीं हैं, इहलोक से विदा ले चुके हैं, लेकिन जिंदा रहने के दौरान उन्होंने मुझे जो नीति शिक्षा दी, उसके आधार पर मुझे कार्य करने की ऊर्जा मिली है। उन्होेंने मूल्यबोध की बात समझायी थी। लोगों के प्रति श्रद्धाभक्ति रख कार्य करना चाहिए। यही जीवन में मूल्यवान शिक्षा थी। इस शिक्षा से शिक्षित एक नागरिक के रूप में मैं अपना दायित्व निर्वहन करने में लगा हुआ हूं। इसके अलावा मेरे गुरुओं ने जो महान सीख दी है, जो मानवीय शिक्षा प्रदान की है, उसके आधार पर ही आने वाले दिनों में हम असम को मानवीय चिंतन व आदर्शों के आधार पर आगे ले जाएंगे।
आप अकेले रहते हैं। युवा हैं। असम के मुख्यमंत्री हैं। अब इसका दुख होता है? आने वाले समय में क्या हम बदलाव देखेंगे?
- मैं तो अकेला नहीं। इतनी जनता मेरे साथ है। असम की जनता ने मुझे जिम्मेवारी सौंपी है। जनता ने जो जिम्मेवारी सौंपी है, वहीं मेरा मनोबल है। जनता सभी समय मेरे पर नजर रखती है। इसलिए मैं कभी अपने को अकेला महसूस नहीं करता। लोगों की दृष्टि है मुझ पर। मैंने मुख्यमंत्री के रूप में क्या काम किया, कहां किस तरह का आचरण किया, इस पर भी जनता नजर रख रही है। जनता मुझे देख रही हैं, यह बात में सदैव महसूस करता हूं। इसलिए मैं कभी अकेलापन महसूस ही नहीं करता। सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने का मैंने संकल्प लिया है। लोग अपने तरह से सोच सकते हैं। उन्हें मैं रोक तो नहीं सकता।
आप में कभी उच्चाकांक्षा रही थी कि आपको मुख्यमंत्री बनना है या नहीं थी? आप में लॉबी पॉलिटिक्स नजर नहीं आ रही है।
- ये चीजें नियति है। इन चीजों के लिए अति उत्साहित होकर फायदा नहीं। सिर्फ निष्ठा के साथ कार्य करते रहना होगा। सफलता और विफलता समय के हाथ है। समय है भगवान। इसलिए सबकुछ जनता के हाथ में है। जनता जो फैसला करेगी उसी आधार पर हमें आगे बढ़ना है। अति उत्साहित होकर कोई फायदा नहीं होगा।
उत्तर लखीमपुर से प्रदान बरुवा को टिकट मिलना, रंजीत दास का प्रदेशाध्यक्ष बनना साबित करता है कि आप अपने कार्य के प्रति ज्यादा ध्यान देते हैं न कि लॉबी पॉलिटिक्स की ओर।
- नहीं, ये फैसले हमारे सामूहिक फैसले हैं। रंजीत दास के अध्यक्ष नियुक्त होने के बारे में हम सभी की एक राय थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ ही पार्टी के विभिन्न पदों पर रहने वाले नेताओं के साथ हमने कई बार इस पर चर्चा की। हम सभी एक परिवार हैं। बाहर लोगों की धारणा अलग हो सकती है, पर वैसी बात नहीं है। भाजपा में इस तरह की संस्कृति नहीं है। हमारे भाजपा में जो भी फैसले होते हैं, वे सर्वसम्मति से लिये जाते हैं। किसी को अंधेरे में रखा नहीं जाता। मेरे प्रदेशाध्यक्ष बनने का हो या फिर रंजीत दास का। सभी के विचार लिये गये हैं। मैंने भी अपना विचार दिया है। मैंने कहा कि रंजीत दास के अध्यक्ष बनने पर भाजपा की जमीनी स्तर पर स्थिति और अधिक बेहतर होगी।
आप में आध्यात्मिक चेतना का विकास कब से हुआ? आप अपने भाषणों में राजनीतिक हमला अधिक करने के बजाय सकारात्मक और लोगों को प्रोत्साहित करने की बातें करते हैं।
- पूरा मामला ही माता-पिता से जुड़ा है। साधारणतया माता-पिता बचपन में जो शिक्षा देते हैं, उसी के आधार पर व्यक्ति का जीवन निर्मित होता है। आधार माता-पिता से आता है। बाद में गुरु ने आध्यात्मिकता से अवगत कराया। कृष्णगुरु का सान्निध्य मिलने के बाद उन्होंने मुझे बहुत ज्ञान और सुझाव दिया। इसके चलते मुझे आगे बढ़ने में मदद मिल रही है। इनसे मुझे संकीर्णता से हटकर समाज और देश के लिए चिंतन करने का मनोबल मिला।
सरकारी खर्च बढ़ने की आशंका के चलते ही मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर रहे हैं क्या?
- मंत्रिमंडल का विस्तार नये साल में हो जाएगा।
भ्रष्टाचार के खिलाफ आपने जेहाद छेड़ा था। पर अब विपक्ष आरोप लगा रहा है कि आपकी पार्टी के लोगों का नाम आने से ही जांच ठंडे बस्ते में चली गयी है?
- ऐसी बात नहीं है। खुले मन से हमारे जांच करने वाले अधिकारियों को जांच का अधिकार दिया गया। इनमें भी कोई भी राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं है।
भाजपा के पास सरकार चलाने के लिए बहुमत है। इसमें गठबंधन के सहयोगियों से और अधिक दबाव आपको झेलना पड़ता है?
- नहीं, नहीं। कोई दबाव नहीं है। सभी का सहयोग मिल रहा है। हर कोई समर्थन दे रहा है। सब समझते भी हैं।
आरोप है कि सरकार आरएसएस चला रहा है?
- आरएसएस कभी भी हमारे काम-काज में हस्तक्षेप नहीं करता। वह तो हमें आदर्श, मूल्यबोध के आधार पर समाज को शक्तिशाली करने के सुझाव ही देता है।
आपने अगप इसलिए छोड़ी क्योंकि पार्टी आईएमडीटी एक्ट के रद्द होने का विरोध करने वालों के साथ हाथ मिलाना चाहती थी। यदि भाजपा में भी ऐसी स्थिति (हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के मसले पर) आयी तो आप वैसा ही रुख करेंगे?
- हम जो वायदे करके आये थे, उन्हें छिपा कर रखने की बात नहीं है। भाजपा ने चुनाव पूर्व जो चुनावी घोषणा पत्र लिखित रूप में असम की जनता के बीच वितरित किया था, उसमें साफ शब्दों में लिखा था कि हम आने वाले दिनों में क्या-क्या काम करेंगे। ये नयी बात नहीं है। जो सवाल आपने पूछा है, वह नये सिरे से नहीं आया है। चुनाव के पूर्व जनता ने इसे देखा था और उसके आधार पर ही भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया था। पार्टी, संगठन सभी जानते हैं। यहां तक कि विपक्षी भी जानते हैं। हमने जो चुनावी घोषणापत्र प्रकाशित किया था, उसका अध्ययन विपक्ष ने भी किया है। सिर्फ अध्ययन ही नहीं, टीवी चैनलों पर चर्चा हुई है। इसके बाद ही असम की जनता ने हमें जनमत दिया है। इसलिए यह नया सवाल नहीं है। सत्ता में आकर लाया गया विषय नहीं है। सारे मामलों में जनता को भरोसे में लेकर ही पूरे असम की जनता के लिए प्रकाशित किया गया था। अब पूरा मामला संसद में चला गया है। संसद में ही इस पर फैसला होगा।
हार्डलाईन या सॉफ्टलाईन की बात नहीं है। हमने जो वादे किये थे, उन्हें मुझे पूरा करना ही होगा। इसमें बार-बार बदलाव की बात नहीं आ सकती। यह पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान असम की जनता के समक्ष किया गया घोषित वादा है।
आपको सबसे अधिक क्या चीज बुरी और अच्छी लगती है?
- मैं दूसरों पर चर्चा करने को बेहद बुरा मानता हूं। परनिंदा मेरे लिए बहुत बुरी चीज है। किसी दूसरे के बारे में कोई प्रशंसा करता है तो मुझे खुशी होती है। मैं तब अपने को ऊर्जावान मानता हूं। किसी के पीठ पीछे चर्चा करना या बुराई करना मुझे बेहद बुरा लगता है।
आप को भोजन में क्या पसंद है?
- मैं शाकाहारी खाना पसंद करता हूं। उबला हुआ हो और उसमें मिर्च न हो।
सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
- सबसे बड़ी चुनौती मेरे सामने परीक्षा में उत्तीर्ण होने की है। आने वाले पांच सालों में मैं ईमानदारी और निष्ठा के साथ कार्य पूरा कर सकूं। यही मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। मेरी परीक्षा शुरू ही हुई है। असम की जनता मेरे काम-काज पर कड़ी नजर रखे हुए है। जनता की परीक्षा में मैं उत्तीर्ण हो सकूं, तभी मैं अपने को सफल मानूंगा। अपने मन में आनंद की अनुभूति कर सकूंगा।
आपने अपने कार्यालय में महिलाओं को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया है। महिला समाज के प्रति आपके मन में बहुत इज्जत है।
- विश्व में एक आंदोलन हो रहा है। लैंगिक समानता का। आज की तारीख में पुरुष-महिलाएं समानांतर रूप से कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। तभी समाज आगे बढ़ पाएगा। आप यदि एक श्रेणी की अवहेलना करेंगे तो समाज आगे नहीं बढ़ सकता और तब मानवता प्रतिष्ठित नहीं हो सकती।
राष्ट्रीय नागरिक पंजी के अद्यतन को बंद करने का आरोप लग रहा है।
- बंद नहीं हुआ है। काम चल रहा है। यह गलत प्रचार चलाया जा रहा है। इतना बड़ा काम है। स्वाधीनता के बाद भारत में असम में ही यह कार्य पहले हो रहा है। संवैधानिक रूप से वैध भारतीय नागरिकोें के नामों का एक संवैधानिक दस्तावेज तैयार होगा। यह कार्य केरल, कश्मीर कहीं नहीं हुआ है। इसलिए इस तरह का एक राष्ट्रीय कार्य निष्ठा के साथ करने के लिए प्रत्येक दस्तावेज को बार-बार देखना होगा, ताकि गलती न रह जाए, क्योंकि यह ऐतिहासिक दस्तावेज होगा। इसलिए इस तरह के एक बड़े काम को काफी जतन के साथ करना होगा। सनकी होकर या आवेग के साथ करने की यह चीज नहीं है। किसी भी वैध भारतीय नागरिक का नाम छूट न जाए, यह हमें अच्छी तरह से जांच-पड़ताल करनी होगी।
हिंदीभाषी असम के अंदरुनी क्षेत्र में रहते हैं। उनकी सुरक्षा को लेकर सरकार क्या कर रही है?
- सिर्फ हिंदीभाषी नहीं, हमारा उद्देश्य किसी के साथ भेद-भाव न करने का है। सबका साथ सबका विकास नीति के आधार पर हमें सभी समुदायों को आगे ले जाना है। सबकी सुरक्षा करना हमारी जिम्मेवारी है।
आप मुख्यमंत्री होकर भी बाजार में स्वयं खरीददारी करने और खाना बनाने में भी रुचि रखते हैं?
- बाजार करना और खाना बनाना मुझे अच्छा लगता है। मैं जब केंद्रीय मंत्री था तो गुवाहाटी के श्रीनगर बाजार में प्रायः जाता था। मुझे सब्जियों की पहचान हैं। पहले लाही और गोभी की खेती कर साप्ताहिक बाजार में बिक्री करने जाता था। पहले तीन किलोमीटर पत्थर की सड़क पर पैदल चलकर दिनजान के साप्ताहिक बाजार में सब्जी दस पैसे-पंद्रह पैसे में बेचता था। तब से मेरे में बाजार के प्रति स्पष्ट धारणा है। बाजार खुद जाने पर मैं सब्जियों का चयन खुद कर सकता हूं कि कौन-सी फ्रेश है और कौन-सी पुरानी है। कुछ लोग बाजार जाने से इन चीजों पर ध्यान नहीं देते। ग्राहकों में जागरूकता होनी जरुरी है। मैं जैविक खेती को यहां स्थापित करना चाहता हूं। तब लोगों का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा और माहौल प्रदूषण मुक्त होगा।

Wednesday, November 2, 2016

सुविधावादी राजनेता हैं हिमंत


आरएसएस की गुड बुक के लिए बन रहे हैं कट्टर हिंदू

राजीव कुमार

असम की भाजपानीत सरकार में मंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा आरएसएस की गुड बुक में शामिल होकर मुख्यमंत्री तक की कुर्सी हासिल करने की दौड़ में हैं।इसलिए वे अंट-शंट बोले जा रहे हैं।अपनी दूसरी किताब के विमोचन पर उन्होंने कह दिया कि भाजपा धर्म के आधार पर राजनीति करती है।यह बुरी बात नहीं है।देश का बंटवारा भी धर्म के आधार पर हुआ था।
डा.शर्मा यह नहीं थमते।वे कहते हैं कि राज्य के 33 जिलों में से 11 जिले मुस्लिम बहुल हो गए हैं।2021 की जनगणना में और कुछ जिलों में हम अल्पसंख्यक हो जाएंगे।हमें यह देखना है कि एक लाख लोग हमारे शत्रु हैं या 55 लाख लोग शत्रु हैं।एक लाख वे उन लोगों को बता रहे हैं जो बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थी हैं जबकि 55 लाख मुस्लमान बता रहे हैं।एक व्यक्ति संविधान की शपथ लेकर मंत्री बन इस तरह की बात कहें तो उसे मंत्री पद पर रहने का अधिकार नहीं है।
हिमंत सुविधावादी राजनेता रहे हैं।नीति व आदर्श नाम की कोई चीज उनमें दिखाई नहीं देती।वे शुरु में अखिल असम छात्र संघ(आसू)में थे।आसू ने छह साल तक असम आंदोलन किया था।आसू ने राज्य से विदेशी लोगों को खदेड़ने के लिए आंदोलन किया था।1985 में केंद्र के साथ असम समझौता हुआ।इस समझौते में स्पष्ट उल्लेख है कि 25 मार्च 1971 के बाद आए विदेशियों को राज्य से जाना होगा।अचानक हिमंत कांग्रेस में आए।2001 में तरुण गोगोई के नेतृत्ववाली कांग्रेस सरकार सत्ता में आई तो वे मंत्री बने।गोगोई के तीनों कार्यकाल में वे मंत्री रहे।चौदह साल गोगोई के साथ मंत्री रहने के बाद अचानक उनमें मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जागी।वे विक्षुब्ध गतिविधियां करने लगे।कांग्रेस हाईकमान ने झुकने से इनकार कर दिया तो हिमंत ने भाजपा का दामन थाम लिया।भाजपा तब केंद्र में आ चुकी थी।राज्य में उसके पास कद्दावर नेताओं को अभाव था।सो,भाजपा ने हिमंत को सिर आंखों पर बैठाया।
कांग्रेस में रहते हुए वे भाजपा पर जमकर प्रहार करते थे।लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान तो उन्होंने नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए कहा कि गुजरात में पानी की पाइपों से मुसलमानों का खून बहता है।लेकिन अब वे अपने को भाजपा का सबसे हितैषी जाहिर करने में लगे हैं।चतुर हिमंत यह भलीभांति जानते हैं कि आरएसएस को खुश कर दिया तो भाजपा में उन्हें बड़ा पद पाने से कोई रोक नहीं सकता।इसलिए वे अब कट्टर हिंदू बनने का ढोंग कर इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं।इस कार्य में उनके गाड फादर बने हैं राम माधव।राम माधव की पृष्ठभूमि आरएसएस की रही है और वहीं से उनकी एंट्री भाजपा में हुई है।
राम माधव ने हिमंत को जिस अंदाज में आगे बढ़ाया है,उसी अंदाज में भाजपा के पुराने कर्मी आहत हुए है।राज्य में लखीमपुर संसदीय सीट और बैठालांग्सू विधानसभा सीट का चुनाव होना है।यहां भी उम्मीदवारों के चयन में हिमंत की चली है।उत्तर लखीमपुर संसदीय सीट से सर्वानंद सोनोवाल सांसद थे।लेकिन माजुली विधानसभा सीट से जीत हासिल कर मुख्यमंत्री बनने से उन्होंने लखीमपुर सीट छोड़ दी।सोनोवाल को अपने पसंद का उम्मीदवार लखीमपुर संसदीय सीट पर देना था,लेकिन हिमंत ने अपने लाबी के विधायक प्रदान बरुवा को टिकट दिलाने में कामायाबी हासिल की। वही बैठालांग्सू से भाजपा उम्मीदवार बने डा.मानसिंह रंग्पी भी हिमंत गुट के हैं।कांग्रेस में रहते हुए भी उन्होंने अपने लोगों को टिकट देकर जिताया और वे विधायक हरदम उनके साथ रहे।
पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस नेता तरुण गोगोई को भी यह अंत में समझ में आया।मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल भी यही भूल करने जा रहे हैं।भाजपा में भी वे ये खेल,खेल रहे हैं।इसके लिए वे अपने करीबी माने जानेवाले विधानसभा अध्यक्ष तथा सरभोग के भाजपा विधायक रंजीत दास को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने में भी जल्द ही सफल हो जाएंगे।इससे वे अपनी पकड़ मजबूत करेंगे।पर जिस दिन उन्हें लगेगा कि वे मुख्यमंत्री बनने में इस पार्टी में कामयाब नहीं होंगे उसी दिन अपने इन समर्थित विधायकों व सांसदों के साथ वे दूसरी पार्टी का रुख कर लेंगे।यही उनका अब तक का स्वभाव दिखा है।
हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के पक्ष में भाजपा इसलिए है क्योंकि वे इनके वोट बैंक हैं।असम में बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता देकर बसा दिया गया तो भाजपा की राज्य में पकड़ मजबूत होगी।इसलिए वे इसके सबसे बड़े पैरोकार बने हैं।लेकिन एक समय था जब भाजपा व आरएसएस असम आंदोलन के प्रबल समर्थक थे।अब विदेशियों को ये हिंदू-मुस्लिम में विभाजित कर क्यों देख रहे हैं।कारण अपनी रोटी सेंकनी है।असम में वैसे भी जमीन का अभाव है।रोजगार के सीमित साधन हैं।ऐसे में बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता देकर बसाने से समस्या जटिल होगी।हिमंत इससे समझकर भी नासमझी कर रहे हैं।क्योंकि उन्हें तो अपनी दुकान चलानी है।वह कैसे भी चले।

Friday, March 4, 2016

असमः बिहार के नतीजे दोहराएगी भाजपा


राजीव कुमार
असम में दो चरणों में 4 और 11 अप्रेल को विधानसभा चुनाव होंगे।चुनाव तिथियों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं।अब तक गठबंधन न करने का दम भरनेवाली क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद(अगप)ने भाजपा के साथ ना-ना करते गठबंधन कर ही लिया।भाजपा जिस तरह विभिन्न पार्टियों से गठबंधन कर रही है उससे लगता है कि उसकी खुद की हालत पतली है।पहले वह खुद 84 प्लस सीट जीतने का दम भरती थी।
असम आंदोलन से जन्मी तथा दो बार सरकार बना चुकी अगप की हालत भी राज्य में अच्छी नहीं।राज्य की 126 सीटों में से भाजपा ने 24 सीटें अगप को दी है।राज्य में भाजपा के पांच विधायक हैं वहीं अगप के 2011 के विधानसभा चुनाव में 10 विधायक चुनकर आए थे।अलगापुर के अगप विधायक सहीदुल आलम चौधरी की मौत के बाद वहां हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने कब्जा जमाया तो अगप के विधायकों की संख्या घटकर 9 हो गई।बाद में अगप के चतिया विधानसभा के विधायक पद्म हजारिका और ढकुवाखाना के विधायक नव कुमार दलै भाजपा में शामिल हो गए।इस तरह अगप के विधायकों की संख्या घटकर सात हो गई।फिर भी अगप के विधायक भाजपा से ज्यादा हैं।लेकिन गठबंधन में भाजपा ने सीटें सिर्फ 24 दी है।इससे अगप की खराब स्थिति स्पष्ट होती है।
कभी भाजपा लोकसभा चुनाव में बिग ब्रदर की और विधानसभा में अगप के बिग ब्रदर होने की बात कहती थी,लेकिन इस बार केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गठबंधन का ऐलान करते हुए कहा कि अगप कनिष्ठ सहयोगी होगी।केंद्र में भाजपा नीत राजग की सरकार आने के बाद उसकी नीतियों की अगप खिलाफत करती रही है।लेकिन अब उसी के साथ गठबंधन कर चुनाव में उतरेगी।दोनों के गठबंधन को लेकर दोनों पार्टियों के तृणमूल कर्मी गुस्से में हैं।वैसे भी भाजपा ने जब से कांग्रेस के हिमंत विश्व शर्मा को लिया है,उसके दिन उलटे शुरू हो गए हैं।शर्मा की छवि बेदाग नहीं।जब वे कांग्रेस में थे तो यही भाजपा उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाती थी।इसलिए कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का मौका मिल गया है।
लोकसभा चुनाव के दौरान हिमंत ने नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए कहा था कि गुजरात के पानी की पाइपों में खून बहता है।इस पर एक भाजपा नेता ने मामला भी किया।लेकिन हिमंत के भाजपा में शामिल होते ही यह मामला उठा लिया।हिमंत की राजनीति पार्टी के बजाए अपने को शक्तिशाली करने की होती है ताकि वे मुख्यमंत्री बन सकें।कांग्रेस में भी उन्होंने यह कोशिश की,लेकिन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की बेदाग और लोकप्रिय छवि के कारण कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उन्हें हटाना मंजूर नहीं किया।
उधर सारदा घोटाले में फंसते ही हिमंत ने भाजपा का दामन थाम लिया।हिमंत ने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव से संबंध मधुर बनाए और इस तरह अपनी पहुंच अमित शाह तक बना ली। अब भाजपा ने हिमंत को अपने आंखों का तारा बना लिया।अब वे चुनाव परिचालना कमेटी के संयोजक हैं।उन्हीं की कही बातों के अनुसार भाजपा के दिल्ली के शीर्ष नेता चलते हैं,जिन्हें जमीनी सच्चाई पता नहीं।यदि भाजपा कांग्रेस के लोगों को न ले अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल को लेकर अकेले दम पर चुनाव लड़ती तो बेहतर स्थिति में आती।हो सकता था कि वह सरकार नहीं बना पाती लेकिन राज्य में उसकी स्थिति बेहतर होती।क्योंकि सर्वानंद सोनोवाल एक बेदाग चेहरा है।लेकिन हिमंत के इशारों पर चलते हुए भाजपा की जड़ें ही कमजोर होगी।बोड़ो पीपुल्स फ्रंट के साथ समझौता बीटीएडी में भाजपा को खत्म कर देगा।भाजपा ने अगप के साथ गठबंधन कर कांग्रेस के हाथ में चुनाव प्रचार के लिए एक बड़ा हथियार सौंप दिया है।यह है गुप्त हत्या का।
जब राज्य में अगप की सरकार थी और केंद्र में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो राज्य में गुप्त हत्याएं हुई थी।पिछले तीन बार से लगातार कांग्रेस इसे एक बड़ा मुद्दा बनाती आई है।इस बार भी बनाएगी।जनता उस समय को याद कर कांप उठती है।वहीं कांग्रेस की स्थिति इस बार भी बेहतर हो गई है।हिमंत के पार्टी में रहने के दौरान विक्षुब्ध गतिविधियों का दौर था।उनके जाते ही यह थमा।कांग्रेस ने अपनी योजनाओं से लाभार्थियों की संख्या बहुत बनाई है।विकास के भी अनेक कार्य हुए हैं।अशांत असम आज नई ऊंचाइयों को छू रहा है।इसलिए जनता में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के प्रति आस्था और विश्वास का भाव दिख रहा है।लोग में उनकी छवि एक बेदाग व ऊर्जावान मुख्यमंत्री की है।इन सबके चलते वे चौथी बार बहुमत ले आएं तो भी हैरत की कोई बात नहीं होगी।
बिहार में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के हावी रहने और स्थानीय नेतृत्व को तवज्जो न देने के चलते हार हुई।इसके बाद उसने सीख के तौर पर असम में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम का एलान किया,लेकिन सर्वानंद की चलती न के बराबर है।पार्टी के शीर्ष नेता कांग्रेस से आए हिमंत के इशारे पर ज्यादा कदम उठा रहे हैं,जो कि बिहार के नतीजों को ही भाजपा के लिए दोहराएंगे।
(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
मोबाइल-9435049660

Wednesday, June 24, 2015

आंखन देखी: म्यांमार की खुली सीमा,घुसना आसान


राजीव कुमार,म्यांमार के अंदर से






म्यांमार फिलहाल सुर्खियों में है।मणिपुर के चंदेल में आतंकियों ने भारतीय सेना के 18 जवानों को मारा था। भारतीय सेना ने बदले की कार्रवाई में म्यांमार में घुसकर आतंकियों पर हमला किया।भाजपा नीत केंद्र सरकार प्रचार में आगे है।सेना भी सरकार को देखकर वैसे कदम अपना रही है।इस पर कुछ कहने के बजाए हम अरुणाचल प्रदेश से सटे म्यांमार के अंदर तक बेरोकटोक बिना कोई पासपोर्ट-वीजा लिए जाने के अनुभव को पाठकों के साथ साझा करेंगे।इससे हमारी सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुलती है।साथ ही म्यांमार में आसानी से आ-जा सकने की बात भी उजागर होती है।
मैंने स्टीलवेल रोड देखने के लिए म्यांमार के पांगसू पास का दौरा किया।गुवाहाटी से 579 किमी का सफर कर हम असम के मार्घेरिटा,लिडू होते हुए अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले के जयरामपुर पहुंचे।यहां तक सड़क चौड़ी और बेहद खूबसूरत है।जयरामपुर में इनर लाइन परमिट चेक करा लेने के बाद हम नामपोंग होते हुए पांगसू पास के लिए रवाना हुए।सड़क संकरी।हरे भरे पहाड़ों के बीच से गाड़ी नीचे ऊपर उतरते हुए आगे बढ़ती है।बरसात के दिन होने के कारण पहाड़ से उतरी लाल मिट्टी से सड़क पूरी तरह कीचड़ में तब्दील हो गई है।छोटी गाड़ियों से इन इलाकों में जाना आसान नहीं।कहीं जगहों पर गाड़ी कीचड़ में फंसने के कारण धक्के मारने के लिए उतर कर कपड़े खराब करवाने पड़े।जयरामपुर से पांगसू पोस्ट तक असम रायफल्स के दो गेट हैं।इन पर कोई जवान हमें नहीं दिखा।
पांगसू पोस्ट में असम रायफल्स के कैंप के बाहर हमें अपने नामों को वहां रखे एक रजिस्टार में लिखा।वहां बताया गया कि रास्ता बेहद खराब है,छोटी गाडियों में म्यांमार सीमा तक जाना संभव नहीं होगा।हमारी गाड़ी वहीं छोड़कर हम पैदल आठ किमी पहाड़ी रास्ते पर चले।पांगसू पोस्ट से हम वहां सड़क के कार्यों में लगे एक डंपर पर सवार होकर म्यांमार की सीमा में जाकर उतर गए।पर हमारी कोई तलाशी नहीं हुई।म्यांमार सीमा के पास भी कोई सुरक्षा नजर नहीं आई।हमने सीमा को दर्शाते चिह्नों पर खड़े होकर फोटो खिंचवाए।शिलालेख है जहां एक तरफ भारत और दूसरी तरफ म्यांमार लिखा हुआ है।यह समुद्र तट से 3,727 फीट की ऊंचाई पर है।पाटकाई पहाड़ी के शिखर पर स्थित है पांगसू पास।हमें एक भी जवान गश्त लगाता हुआ यहां दिखाई नहीं पड़ा।
हम पैदल चलते हुए म्यांमार के पांगसू पास के बाहर दाखिल हुए।यह ऐतिहासिक स्टीलवेल रोड़ है।वहां बांस लगी एक गेट है।पर कोई तैनात नहीं।दूर-दूर तक कोई हलचल नहीं देखी।सब आराम फरमा रहे हैं।पता चला कि म्यांमार की सीमा के अंदर सेना है।बुलाने पर आए।लेकिन उनके पास न कोई हथियार दिखा और न ही हमें रोकने के कोई विरोध।वे आम जनता की तरह लग रहे थे।कोई ड्रेस नहीं पहन रखी थी।हम लोग विख्यात लेक आफ नो रिटर्न और वहां मौजूद बाजार और बुद्ध मंदिर में घूमते रहे।खूबसूरत लेक आफ नो रिटर्न के बारे में कहा जाता है कि यहां जो भी गया वह वापस लौटकर नहीं आया।दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एलाएड सेना के विमान यहां उतरकर नीचे समा गए थे।इस लेक की लंबाई 1.4 किमी है जबकि चौड़ाई 0.8 किमी है।
अपने को सेना का कमाडेंट बताने वाले मायतून ने हमसे एक-दो बार फोटो न लेने का अनुरोध किया।लेकिन हम कुछ फोटो ले चुके थे।उसने हमसे दुर्व्यवहार नहीं किया।ज्यादा अंदर जाने की बात पर उसने कहा कि मैंने अपने कैप्टेन को बुला भेजा है।वह आएगा तो आप और आगे जाने की बात कर सकते हैं।लेकिन अंग्रेजी व अन्य कोई भी भारतीय भाषा समझ न पाने के कारण उनका कैप्टन बाजार से एक नागामीज बोलनेवाली महिला को लेकर आया।उसने बताया कि हमारे पास अधिकृत कागज नहीं है,इसलिए ज्यादा अंदर नहीं जा सकते।हमें वापस लौट आने का अनुरोध कैप्टेन ने किया।बतातें चले कि अरुणाचल के पांगसू पास में हर साल 20 जनवरी से 22 जनवरी तक विंटर फेस्टिवल आयोजित होता है।इस दौरान म्यांमार वाले पांगसू पास से लोगों का आना-जाना खोल दिया जाता है।
हम म्यांमार के जिस इलाके में थे वह सीमाई गांव का इलाका है।भारतीय गांवों की तरह ही वहां के दृश्य नजर आए।चापाकल पर महिलाएं नहाती दिखी।पर इससे साफ होता है कि म्यांमार में घुसना और वहां के जंगलों में डेरा जमाकर रहना आतंकियों के लिए आसान है।इसलिए पूर्वोत्तर के ज्यादातर आतंकी यहां डेरा जमाए रहते हैं।प्रशिक्षण चलता है।अब शायद स्थितियां बदले।
स्टीलवेल रोड भारत में 61 किमी,म्यांमार में 1033 और चीन में 632 किमी पड़ती है।भारत के 61किमी में 30 किमी असम में और अरुणाचल प्रदेश में 31 किमी है।असम में पड़नेवाली स्टीलवेल सड़क की स्थिति बेहद अच्छी है।पर भारत की सीमा से म्यांमार के पांगसू पास तक सड़क का निर्माण दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ ही नहीं है।इसलिए गांव की टूटी-फूटी कच्ची सड़क जैसे हालात हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एलायड फोर्स के जाने के लिए असम के लिडू से चीन के कुनमिंग तक स्टीलवेल रोड का निर्माण हुआ था।अब इसे लुक ईस्ट पालिसी के तहत फिर खोले जाने की मांग उठ रही है।इससे दक्षिण एशिया के साथ पूर्वोत्तर का व्यापार वाणिज्य का मार्ग खुल जाएगा।पूर्वोत्तर के राज्यों का विकास होगा।पर इसके पहले यहां आतंकियों का सफाया जरुरी है।दुर्गम इलाके के कारण लोगों की आवाजाही कम होने के चलते इन इलाकों में आतंकियों का जमावड़ा है।सर्वविदित है कि अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग में नगा आतंकी संगठन एनएससीएन का दबदबा है।
मुझे डर सता रहा था कि पासपोर्ट -वीजा न होने के कारण कहीं विदेश की धरती पर जाने के कारण गिरफ्तार कर न लिया जाऊं।साथ ही पहाड़ से आतंकी हमला न हो जाए।पर कई घंटे म्यांमार में गुजारकर हम बिना कोई परेशानी के लौट आए।

Wednesday, June 10, 2015

शाबास इंडिया,शाबास मोदीजी

राजीव कुमार

भारतीय सेना ने म्यांमार के घने जंगलों में प्रवेश कर आतंकियों को मार गिराया है।यह मणिपुर में सेना पर हुए हमले के बदले में की गयी कार्रवाई है।आतंकवाद देश को नुकसान कर रहा है।इसमें कोई संदेह नहीं।वर्ष 2003 में केंद्र में जब भाजपा नीत राजग की सरकार थी तब भी ऐसा ही कड़ा रुख देखा गया था।भूटान में आपरेशन आल क्लीयर चला और भूटान से असम के आतंकियों का सफाया किया गया।अब फिर केंद्र में भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार है और कड़ा रुख सामने देखने को आ रहा है।सोशल मीडिया में भी सेना की इस कार्रवाई की जमकर तारीफ हो रही है।
आपरेशन आल क्लीयर के दौरान भारतीय सेना ने भूटानी सेना के साथ मिलकर दक्षिण भूटान में 30 आतंकी शिविरों को ध्वस्त किया था।इनमें उल्फा के 13,एनडीएफबी के 12 और केएलओ के पांच शिविर थे।तब तत्कालीन सेना प्रमुख एनसी विज ने कहा था कि हमने लगभग 650 आतंकियों को निष्प्रभावी कर दिया है यानी कुछ मारे गए और कुछ पकड़े गए।पकड़े गए कई आज मुख्य़धारा में शामिल होकर सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं।इसके बाद बांग्लादेश के साथ संबंध बेहतर हुए तो वहां रहनेवाले अनेक आतंकी नेताओं को भारत के हवाले किया गया।आज दोनों पड़ोसी देशों में पूर्वोत्तर के आतंकी संगठनों का पहले जैसा जमावड़ा नहीं।पहले तो ये आतंकी असम में बड़ी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देकर सीधे पड़ोसी भूटान या बांग्लादेश की सीमा में जा घुसते थे।पर आज वहां शिविरों के न रहने से इस तरह की घटनाएं न के बराबर हो रही है।
मणिपुर में आतंकी संगठन एनएससीएन(के) ने हमला कर 18 सेना जवानों की नृशंस हत्या कर दी।कारगिल के बाद सेना को सबसे बड़ा झटका था।सभी ने इस आतंकी हमले की निंदा की।कठोर कार्रवाई की बात कही गयी।कठोर कार्रवाई भी हुई।सेना ने आतंकियों को म्यांमार में घुसकर मारा।यह देश की विदेश नीति की सफलता मानी जाएगी।पूर्वोत्तर के अधिकांश आतंकी संगठन भूटान और बांग्लादेश में सफाए के बाद म्यांमार को अपनी शरणस्थली बनाए हुए थे।पर भारत ने अब पड़ोसी देशों के साथ जो संबंध बनाने शुरु किए हैं उससे भूटान में पहले ही,बाद में बांग्लादेश और अब म्यांमार में आतंकियों का सफाया शुरु हो गया।निसंदेह यह राजग सरकार की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।पूर्वोत्तर में जो आतंकी गतिविधियां चल रही है उससे विकास के कार्यों को करने में दिक्कत आ रही है।विकास का पैसा आतंकियों के पास चला जाता है।थोड़फोड़ की गतिविधियों को अंजाम देकर ये जानमाल को नुकसान पहुंचाते हैं।यदि आतंकी गतिविधियों को पूरी तरह विराम लग गया तो पूर्वोत्तर देश का एक अहम पर्यटन क्षेत्र होगा।
भारतीय सेना की बदले की कार्रवाई से आतंकियों और आतंक को बढ़ावा देनेवाले देशों को कड़ा संदेश गया है।यदि भारत सरकार इस तरह कड़ा रुख अख्तियार करती रही तो आतंकियों और इन्हें बढ़ावा दे रहे देशों को सोचने को मजबूर होना होगा।म्यांमार में आतंकियों का सफाया होने के बाद पूर्वोत्तर में आतंक खत्म होने के कगार पर होगा।क्योंकि अब भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से सटे देशों के साथ संबंध अच्छे हुए हैं।वे इन आतंकियों को शरण देने से कतराएंगे।यदि किसी ने चोरी-छिपे प्रवेश पा भी लिया है तो वहां भारत की सेना के हमले का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।
भारत सरकार सीमाओं को पूरी तरह सुरक्षित करने की कोशिश में लगी है।आज से कुछ साल पहले मैंने अरुणाचल प्रदेश के फांग्सूपास से म्यांमार में प्रवेश किया तो कोई रोकटोक नहीं देखी।घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हुए हम स्टीलवेल सड़क से म्यांमार में प्रविष्ट हुए।काफी अंदर चले गए।इससे वहां की सुरक्षा व्यवस्था का खोखला स्वरुप सामने आता है।लेकिन अब केंद्र की मोदी सरकार ने भारत से लगनेवाली म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा को चाक-चौबंद करने का फैसला किया है।इस पर सुझाव देने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया है।खुली सीमा के कारण आतंकी वहां से आसानी के साथ आते-जाते हैं।साथ ही ड्रग्स व हथियारों की तस्करी होती है।म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा एक्ट ईस्ट पालिसी के लिए भी सुरक्षित होनी जरुरी है।टास्क फोर्स अगले एक महीने में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप देगी।
केंद्र की मोदी सरकार के इस तरह के कदमों से निश्चय ही पूर्वोत्तर का भला होगा।उन्होंने लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान कहा था कि पूर्वोत्तर के आठ राज्य अष्ठलक्ष्मी हैं।सही अर्थों में वे अपने नेतृत्ववाली सरकार के जरिए कार्य कर यह साबित कर दें तो इतिहास के पन्नों में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।पूर्वोत्तर के पास अपार संसाधन हैं,लेकिन आतंकवाद के चलते वह देश के अन्य हिस्सों की तुलना में आगे नहीं बढ़ पाया।पर देर नहीं हुई है।अब भी इसे किया जा सकता है।

Thursday, June 4, 2015

हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता: देश नहीं,वोट बैंक प्राथमिकता


राजीव कुमार

भाजपा पहले से ही बांग्लादेश से आए हिंदुओं के शरण के पक्ष में रही है।लेकिन अब इस समुदाय के वोट से भाजपा को कई सीटें हथियाते देख कांग्रेस भी इन्हें शरण दिए जाने का पक्ष लेने लगी है।इससे साफ होता है कि इन सबके लिए देश प्राथमिकता नहीं,अपनी राजनीति की दुकान चलाना प्राथमिकता है।
देश में ऐसे ही जनसंख्या विस्फोट हो चुका है।लोगों को काम पाने और दो जून की रोटी का जुगाड़ करने मारा-मारी करनी पड़ रही है।जमीन का संकट उत्पन्न हो गया है।इन सब की फ्रिक हमारे राजनेताओं को नहीं है।देश में और लोगों को लाकर ये समस्या बढ़ाना चाहते हैं ताकि अपनी रोटी मजे से सेक सकें।
भाजपा का तर्क है कि बांग्लादेश में अत्याचार का सामना कर भारत आए हिंदू लोगों को शरण के साथ नागरिकता प्रदान की जानी चाहिए।इस पूरे मसले को मानवीय दृष्टिकोण से देखने की बात भाजपा कहती है।तब फिर संदिग्ध बांग्लादेशियों के खिलाफ विदेशी न्यायाधिकरण में मामला चलाने और उनकी शिनाख्त के लिए इतना तामझाम कर खर्च करने की जरुरत ही नहीं है।न्यायाधिकरण में मामला लड़ने के लिए पैसे खर्च कर बांग्लादेशी करार दिए गए अनेक व्यक्ति आज भी डिटेंशन कैंपों में रहने को मजबूर हैं।फिर उन्हें यह पीड़ा क्यों दी गई।
असम में बांग्लादेश से आए अनेक हिंदू और मुस्लिम परिवार रहते हैं।विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा विदेशी करार दिए गए फरार लोगों की जो सूची असम पुलिस की सीमा शाखा ने हाल ही में प्रकाशित की है उसमें बंगाली हिंदू और मुसलमानों लोगों की भरमार है।असम की बराक घाटी और कई विधानसभा सीटों के नतीजों में इनकी अहम भूमिका होती है।पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने बांग्लादेश में सताए गए और असम आए लोगों को भारत में शरण देने का मुद्दा उठाया था।इसके चलते कांग्रेस को बराक घाटी की 14 में से 13 सीटें मिली थी।गोगोई सताए गए सिर्फ हिंदू लोगों की बात नहीं कर रहे थे।लेकिन अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अंजन दत्त ने बांग्लादेश में सताए जाने के चलते आए हिंदू लोगों को शरण दिए जाने की बात कह दी है।यानी कांग्रेस व भाजपा एक ही नाव पर सवार हो गए हैं।
असम में विदेशी खदेड़ने के लिए छह साल तक आंदोलन हुआ था।सरकार के साथ असम समझौता हुआ।इसमें स्पष्ट लिखा है कि 25 मार्च 1971 के बाद जो भी आया है,उसे जाना होगा।सभी को यह मान्य है।अब इसके आधार पर ही राष्ट्रीय नागरिक पंजी(एनआरसी) के अद्यतन का कार्य किया जाएगा।यदि अभी तक के सताए बांग्लादेशियों को लेना है तो फिर असम समझौते को कुचला जाएगा।एनआरसी का तामझाम करने की जरुरत ही नहीं है।देश के राजनेताओं का दोगलापन साफ झलकता है।
सवाल उठता है कि यदि बांग्लादेश से आए हिंदू को लेने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहते हैं तो म्यांमार से आए रोहंगिया और बांग्लादेश के चकमा लोगों के प्रति आपका भेदभाव क्यों?क्या हिंदू बंगाली आपके वोट बैंक हैं इसलिए ? भाजपा के नेतृत्ववाली केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरे विश्व में डंका बजने की बात प्रचारित हो रही है।बांग्लादेश पड़ोसी देश है।भारत के साथ फिलहाल अच्छे संबंध हैं।प्रधानमंत्री वहां जा रहे हैं।तब बांग्लादेश में हिंदुओँ को सताने का मसला क्यों नहीं उठाया जाता।अंतरराष्ट्रीय किसी मंच पर बांग्लादेश में हिंदुओं के सताने का मसला फिलहाल उठते नहीं दिखा है।ऐसे में बांग्लादेश के लोगों को देश में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।यह सरासर गलत है ।यदि ऐसा किया जाता है तो सीमा सील करने के लिए अरबों रुपए खर्च करने की जरुरत ही नहीं है।न ही विदेशी न्यायाधिकरणों की जरुरत है और न ही किसी को डिटेशन कैंप में रखने की और न ही अखबारों में विज्ञापन देकर फरार हुए बांग्लादेशियों के नामों को प्रकाशित करने की।न ही मतदाता सूची में किसी के नाम के आगे डी यानी डाउटफुल लगाने की।


Thursday, May 28, 2015

भाजपा के यू-टर्न ले डूबेंगे असम में



राजीव कुमार
असम में अगले साल अप्रेल-मई में विधानसभा चुनाव होंगे।पिछले साल केंद्र की सत्ता में भारी बहुमत से आने के बाद भाजपा असम में भी अपनी सरकार बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को असम की 14 में से सात सीटें हासिल हुई थी।उसे लगता है कि वह असम के मुद्दों को भुनाकर सरकार बना लेगी।लेकिन पिछले एक साल में केंद्र की सत्ता में रहकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने असम में किए गए अपने वायदों पर ही इतने यू-टर्न मारे हैं कि हर कोई हैरत में पड़ गया है।इन यू-टर्नों को देखकर मोदी व उनकी सरकार के प्रति जनता में पहले जैसा जोश नहीं है।इसका फायदा फिर असम में चल रही तरुण गोगोई के नेतृत्ववाली सरकार को मिलने की संभावना है।
मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का एलान किया था।पर भाजपा की लोकप्रियता को गिरते देख उनमें फिर जोश आ गया है।वे कहने में भी संकोच नहीं करते कि वे अब फाइटर मूड में आ गए हैं।लगातार तीन बार सत्ता में आने के बाद वे राज्य के पहले ऐसे मुख्यमंत्री बन गए थे जो सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं।वे 2016 में भी कांग्रेस का नेतृत्व कर सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं।वहीं भाजपा का ग्राफ नीचे खिसक रहा है।भाजपा के पास बेहतर उम्मीदवारों की कमी है।लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने जो वायदे असम की जनता से किए थे उनसे वह पूरी तरह विपरीत स्थिति में चल रही है।उसके इस कदम से मतदाताओं को लगने लगा है कि यह कहती कुछ और है करती कुछ और है।
भाजपा ने बांग्लादेश के साथ भूमि हस्तातंरण मसले पर सबसे बड़ा यू-टर्न लिया।लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी ने गुवाहाटी की जनसभा में कहा था कि कांग्रेस के नेतृत्ववाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(संप्रग) सरकार ने आपसे पूछकर यह समझौता किया था क्या?हम असम की एक इंच जमीन देने नहीं देंगे।लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी गुवाहाटी आए तो उनके सुर बदल गए।उन्होंने कहा कि असम के फायदे के लिए जो होगा वहीं करेंगे।प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि इससे सीमा विवाद हल हो जाता है तो सीमा पूरी तरह सील करने में मदद मिलेगी।घुसपैठ बंद होगी।यही बात थी तो संप्रग ने जब समझौता किया था तो उसके विरोध में भाजपा क्यों उतरी।सिर्फ वोट की राजनीति के लिए यह किया जाता है क्या?
भाजपा का दूसरा बड़ा यू-टर्न सुवनसिरी पनबिजली परियोजना को लेकर था।लोकसभा चुनाव के दौरान इस परियोजना के खिलाफ आंदोलन कर रहे संगठनों व जनता को आश्वस्त करते हुए भाजपा ने कहा कि हम बड़े बांध के खिलाफ हैं।लेकिन सत्ता में आते ही फिर सुर बदला।कहा,विकास के लिए बिजली जरुरी है।इसे हम हर हाल में करेंगे।यही नहीं असम के विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने के साथ ही 90:10 के अनुपात से जो राशि मिलती थी उसका पैटर्न भी बदलकर 50:50 कर दिया।विभिन्न केंद्रीय योजनाओं की राशि में कमी की।इन सब का फायदा मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सरकार ले जाएगी।
भाजपा के पास विधानसभा के चुनाव में उतारने के लिए उम्मीदवार नहीं है।इसलिए वह अन्य पार्टियों के फ्लाप हो चुके नेताओं को अपनी पार्टी में ले रही है।कांग्रेस के अनेक विधायक टिकट से वंचित होने पर भाजपा के दरवाजे दस्तक देंगे।पार्टी यदि इन सबके बलबूते पर सरकार में आने की सोच रही है तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है।फिलहाल भाजपा अगले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्रीय मंत्रियों को असम आने का निर्देश दे चुकी है।खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रियों को यह निर्देश दिया है।हर समय एक न एक केंद्रीय मंत्री असम में मौजूद रहता है।केंद्रीय मंत्री अपने मंत्रालय के यहां चल रहे कार्यों की समीक्षा करने के साथ ही जाते-जाते गोगोई सरकार पर आरोप लगा जाते हैं कि केंद्रीय राशि का सदुपयोग नहीं हुआ है।यानी चुनाव के पहले आरोप-प्रत्यारोपों की राजनीति हावी है।
भाजपा के आरोपों का जवाब गोगोई देने के साथ ही नई योजनाओं का एलान कर रहे हैं।पुरानी पड़ी बंद योजनाओं को फिर से चालू किया जा रहा है।मतदाताओं को लुभाने की कोशिश चल रही है।गोगोई भी अब भाजपा के आक्रामक प्रचार का उसी के अंदाज में जवाब देना शुरु कर दिया है। इसलिए भाजपा के लिए आनेवाला विधानसभा चुनाव आसान नहीं होगा।भाजपा का प्रदेश नेतृत्व भी सक्षम नजर नहीं आता।अकेले तो वह किसी भी कीमत पर सरकार नहीं बना पाएगी।(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
मोबाइल-9435049660

Monday, September 3, 2012

असम हिंसाः कम्यूनल हैं हम

राजीव कुमार


हम अधिकांश भारतीय सांप्रदायिक यानी कम्यूनल हैं।मेरे इस कथन पर बहुत लोगों को आपत्ति हो सकती है।लेकिन यह बात सौ प्रतिशत सच है।सच कड़वा होता है।यदि हम अधिकांश सांप्रदायिक नहीं होते तो देश में मजहब के नाम पर हिंसा नहीं होती।असम के बोड़ो इलाके में हिंसा के बाद उत्पन्न स्थिति को देखने पर मैं यह कह रहा हूं।
बोड़ो इलाके में हिंसा हुई।अधिकांश नेताओं ने सीधे कह दिया कि इसके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठियों का हाथ है।ऐसा कहने के लिए कोई जांच-पड़ताल भी नहीं की।यदि है तो इन बांग्लादेशियों को हम देश का शत्रु मानते हैं और इन्हें तुरंत गिरफ्तार करवाया जाए।भाजपा नेता तो कह रहे हैं कि हिंसा के बाद बनाए गए राहत शिविरों में बांग्लादेशी रह रहे हैं।हद हो गई।हम अपने को धर्मनिरपेक्ष देश मानते हैं,लेकिन भारतीयों को भी बांग्लादेशी कहने से हमें कोई संकोच नहीं।बांग्ला भाषा बोलने, दाढ़ी रखने व लूंगी पहनने से कोई बांग्लादेशी नहीं हो जाता।यह हम कट्टर भारतीयों को जान लेने की जरुरत है।
असम के उन इलाकों में जाने की जरुरत है, जहां ये रहते हैं।मेरा सौभाग्य है कि मैं उस इलाके में जन्मा,पला और बड़ा हुआ हूं।निचले असम के चर इलाकों में यह रहते हैं।जहां विकास का प्रकाश अब तक नहीं पहुंचा है।यह बेहद मेहनती होते हैं।अपने इलाके में काम के अवसर न रहने के कारण ये अन्य जगहों पर काम के लिए यायावरी जीवन जीते हैं।यह इतने पढ़े लिखे नहीं होते कि कागजातों का क्या महत्व है,यह इन्हें समझ में आए।इसलिए इन्हें सीधे बांग्लादेशी करार दिया जाता है।वजह है यह बांग्लादेश से सटे भारतीय इलाकों में रहते हैं और बांग्लादेश के लोगों की तरह ही दिखते हैं।क्या यही इनका दोष है ?देश की आजादी के पहले बांग्लादेश के लोग भारतीय ही थे।यह भी जान लेने की जरुरत है।
यदि इन भारतीयों को हम बांग्लादेशी कहेंगे तो क्या इनके मन में ठेस नहीं पहुंचेगी ?यह अलगाव पैदा नहीं करेगी ? इनके मन में असुरक्षा का भाव पैदा होगा।क्या मुझे या आपको कोई बांग्लादेशी या पाकिस्तानी कहे तो सहन कर पाएंगे ?नहीं न।तो फिर हमें यह कहने का अधिकार किसने दिया ?हां,बांग्लादेशी सीमा खुली रहने का फायदा उठा आ रहे हैं।इन्हें पकड़ने की जरुरत है।सीमा सील किए जाने की जरुरत है।पर बिना सोचे-समझे किसी को उनकी बोली और पहनावे को देखकर बांग्लादेशी कह देना मानहानि करना है।इससे हमें बचना चाहिए।ऐसा कर हम देश को मजबूत करने के बजाए कमजोर कर रहे हैं।
बोड़ो हिंसा के बाद देश के अन्य इलाकों में पढ़ाई और रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे पूर्वोत्तर के लोग वहां से पलायन कर लौट आए।इनमें से कुछेक को वहां धमकी दी गई।इसके बाद फैली अफवाह के चलते लोगों का उन इलाकों से पलायन हुआ।असम के लोगों को देश के अन्य हिस्सों में धमकाना भी हमारे कम्यनूल होने का सबूत है।यदि हम भारतीय हैं तो हम एक हैं।लेकिन मजहब व इलाके के संकीर्ण विचारों को लेकर हमारी सोच संकुचित हो चुकी है।इससे जुड़ाव नहीं,बिखराव पैदा होगा।हमें इससे बचने की जरुरत है।
लेकिन धर्म के नाम पर राजनीति करनेवाले ऐसा करने से बाज नहीं आते।उन्हें तो सिर्फ अपनी रोटियां सेंकने से मतलब है।असम की हिंसा के बाद बाहर नफरत फैलाने का आरोप लगा बजरंग दल ने आल इंडिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष तथा धुबड़ी के सांसद बदरुद्दीन अजमल को गिरफ्तार करने की मांग में 27 अगस्त को असम बंद का आह्वान किया।इस बंद की ज्यादा आलोचना मैंने नहीं देखी।हिंदू संगठन के दिए गए बंद पर ज्यादातर लोग चुपच प घरों में दुबके रहे।जब 28 अगस्त को अखिल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ(आम्सू) ने असम बंद का आह्वान किया तो हिंसक घटनाएं हुई।पत्रकारों पर हमला हुआ।
हिंसा की निंदा की जानी चाहिए,लेकिन जिस तरह इस संगठन के साथ व्यवहार किया जा रहा है,वह बराबर का दर्जा नहीं कहा जा सकता।बंद,बंद हो।हिंसा समर्थनयोग्य नहीं है।बंद के दौरान संगठन के कुछेक सदस्य हिंसा कर सकते हैं।दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।पर इसके लिए पूरे संगठन की आवाज को बंद करने की कोशिश समर्थन योग्य नहीं हो सकती।हिंदू संगठन के बंद के दौरान ऐसा होता तो शायद यह कोशिश नहीं होती।हम दोयम दर्जा अपना रहे हैं।यह ठीक नहीं।जब तक हम इस तरह का व्यवहार करेंगे मुसलमानों को भारतीय बना नहीं पाएंगे।दिखने मैं वे भारतीय होंगे पर उनका मन हमारे साथ नहीं होगा।यह देश को कमजोर करता है।हम कम्यूनलों को यह समझने की जरुरत है।

Wednesday, August 29, 2012

गोगोई की द ग्रेट नौटंकी



राजीव कुमार

टीवी पर मनोरंजन के लिए लोग आजकल हास्य कार्यक्रम अन्य की तुलना में खूब देखते हैं।क्योंकि इससे उन्हें मजा आता है,उनका मनोरंजन होता है।तनाव कम होता है।पर असम के टीवी चैनलों में अब तक हिंदी की तुलना में कम हास्य धारावाहिक दिखाए जाते हैं।लेकिन यहां एक टीवी चैनल में हफ्ते में एक बार चुपोति (हास्ययुक्त निंदा) नामक व्यंग्यात्मक कार्यक्रम दिखाया जाता है।बहुत लोकप्रिय है।इसमें असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को हू-ब-हू कापी किया जाता है, वह लोगों को हंसने के लिए मजबूर कर देता है।गोगोई की बातें ही ऐसी होती है।वह अपनी इस तरह की बातों से ही 11 साल राज्य में शासन कर चुके हैं,लेकिन अब रास्ता आसान नहीं दिखता।
नौटंकी एक प्रकार का लोक नाट्य है जिसमें संवाद तथा संगीत की प्रधानता होती है।अच्छी लगती है।गोगोई इतने दिनों तक अपने संवादों और चापलूसों के संगीत से लोगों को मोह रहे थे,लेकिन अब उनके जाल में लोग फंसना नहीं चाहते।अब लोगों को समझ में आने लगा है।विपक्षी पार्टी असम गण परिषद पर टिप्पणी करते हुए गोगोई पहले अकसर कहते थे खट्टे आम अगप ने दो बार बेच दिए।अब लोग उनकी बातों(अगप) पर भरोसा नहीं करनेवाले हैं।गोगोईजी , आप की नौटंकी से लोग अब ऊब चुके हैं।क्योंकि आप और आपकी सरकार सिर्फ बातें करती है,काम नहीं।मैं तथ्य रखूंगा।
पहला,सुप्रीम कोर्ट और केरल उच्च न्यायालय ने बंद को अवैध घोषित कर रखा है।गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी इसे अवैध करार दिया है,लेकिन इतने सालों तक सरकार को यह अमल करने की इच्छा नहीं हुई।खुद मुख्यमंत्री गोगोई ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि बंद के दौरान जो लोग दुकान खोलते हैं,गाड़ी चलाते हैं,इन्हें किसी तरह की क्षति का सामना करना पड़ता है तो हम इसकी भरपाई करेंगे।इसके लिए फंड रखा जाएगा।लेकिन कुछ नहीं हुआ।अब बोड़ो बहुल इलाके की हिंसा के विरोध में बंद हो रहे हैं तो सरकार को अदालती आदेश की याद आई।इसका अर्थ है कि अब तक आप चाहते तो बंद को बंद करने के कदम उठा सकते थे,लेकिन किया नहीं।क्यों ? असम में अब इस आदेश को सिर्फ एक महीने तक लागू करना चाह रहे हैं,आगे के लिए क्यों नहीं ?यानी सरकार समस्याओं को समस्या बनाकर रखना चाहती है।
दूसरा,बोड़ो इलाके की हिंसा के बीच असम के स्वास्थ्य व शिक्षा मंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा ने अपने पद से इस्तीफा देने का पत्र मुख्यमंत्री गोगोई को थमा दिया।दोनों के बीच काफी समय से मनमुटाव था और सत्ता केंद्रिक लड़ाई चल रही थी।पर अचानक दिल्ली से लौटकर नौंवे दिन डा.शर्मा ने गोगोई से बात की और काम पर लौट आए।गोगोई ने डा.शर्मा को फिर काम करने दिया।इससे साफ हो गया कि गोगोई निर्णय लेने में कमजोर हैं।वे कठपुतली की तरह कार्य कर रहे हैं।लेकिन कहते हैं कि मैं दिल्ली के आदेश से चलनेवालों में नहीं हूं।
तीसरा,बोड़ो इलाके की हिंसा के बाद विभिन्न पक्षों ने मांग की कि इलाके में जो अवैध हथियार हैं,उन्हें जब्त किया जाए।लेकिन गोगोई इसमें भी ढुलमुल रवैया अपनाते रहे।28 अगस्त को उन्होंने कहा कि 27 अगस्त को सेना को हथियार जब्त करने का अधिकार दिया गया है।पर इतनी देर क्यों? पिछले एक महीने से क्या किया गया ? जब किसी इलाके में चुनाव होते हैं तो चुनाव आयोग के निर्देश पर यही पुलिस फटाफट हथियार जब्त करती है।फिर गोगोई की सरकार में यह क्यों नहीं हो पाया?किस के प्रति गोगोई नरम है और क्यों? जो उन्हें हथियार जब्त करने में दिक्कत होती है।
यह सब सवाल हम गोगोई से पूछ नहीं सकते।क्या हम उनसे डर गए हैं? नहीं।तो फिर क्यों? वे तानाशाह बन गए हैं।इन कड़वे सवालों को सुनकर उन्हें गुस्सा आ जाता है।पत्रकार हूं,इसलिए उनके संवाददाता सम्मेलनों को कवर करने जाता हूं।मेरे सवालों से वे इतने घबरा गए हैं कि अब तो उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कह भी दिया कि मैं आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा।पहले मेरे कई सवालों पर गुस्से में आकर उन्होंने ऐसे जवाब दिए हैं कि स्थानीय अखबारों की सुर्खियां बनी।उदाहरण के तौर पर कुछ पेश करना चाहूंगा।
असम में बाढ़ आई हुई थी,गोगोई अमेरिका गए हुए थे।बाढ़ के हालात जानने के लिए प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने मंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा को कई बार फोन किया।जब गोगोई से मैंने पूछा कि प्रधानमंत्री ने आपसे पूछने के बजाए हिमंत को फोन कर जानकारी ली तो गोगोई ने गुस्से में कहा-प्रधानमंत्री हिमंत को सुपर मुख्यमंत्री बना दे।इसी तरह एक बार मैंने राज्य में अगप शासनकाल में हुई गुप्त हत्याओं पर पूछा।कांग्रेस इस मसले को लेकर खूब सक्रिय रहती है।सत्ता में आने पर गुप्त हत्या के दोषियों को सजा दिलाई जाएगी,यह कांग्रेस का नारा था।तीसरी बार लगातार आई है,पर वायदा अब तक पूरा नहीं हुआ है।एक मुख्यमंत्री इतना असहाय कैसे हो सकता है।इस पर गोगोई ने कहा था-मुख्यमंत्री क्या, देश का गृहमंत्री भी असहाय हो सकता है।इस तरह अनेक वाकये हुए हैं।
एक समय था जब गोगोई खुद कहते थे पूछिए,क्या पूछना है ? वे पारदर्शिता की बात करते थे।लेकिन अब सच का सामना करने से वे घबराते हैं।वे सिर्फ सरकार की प्रशंसा सुनने के आदी हो गए हैं।अभी विभिन्न राज्यों में पेट्रोल व गैस के दाम बढे।कई राज्यों ने अपने यहां रियायत का एलान किया।पर गोगोई खामोश रहे।इससे बड़ी कोई नौटंकी आपने कभी देखी है,जो सहजता के साथ राज्य में बिना कोई खर्च के लोग देख रहे हैं।वाह,गोगोईजी।आपका कोई जवाब नहीं।

Sunday, August 26, 2012

असम हिंसाःवजह लोभ व भ्रष्टाचार

राजीव कुमार

लोभ व भ्रष्टाचार जब तक रहेंगे देश में विशेषकर असम में शांति नहीं होगी।लोभ है तो भ्रष्टाचार होगा।भ्रष्टाचार होगा तो संपूर्ण विकास का फायदा लोगों तक नहीं पहुंचेगा।इसलिए देश में लोगों के मन से लोभ पूरी तरह खत्म करना होगा।यह खत्म होने के बाद भ्रष्टाचार नहीं होगा।भ्रष्टाचार नहीं होगा तो गलत कार्य नहीं होंगे।सबको बराबर अपना हक मिलेगा।
असम में चल रही हिंसा की गहराई से पड़ताल करने के बाद मुझे यही लगता है।राजनेता इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं।कोई इनके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठ को वजह मानता है तो कोई इलाके में मौजूद अवैध हथियारों को इनकी वजह बता रहा है।लेकिन इन सबके पीछे लोभ व भ्रष्टाचार ही प्रमुख है।
आइये सीधे मुद्दों की तरफ आते हैं।पहला,भारत-बांग्लादेश सीमा से घुसपैठ होती है।चंद पैसों के एवज में देश में विदेशी घुस आते हैं।घुसने के बाद यहां फैले भ्रष्टाचार की वजह से ये लोग राशन कार्ड हासिल करते हैं,मतदाता सूची में नाम दर्ज कराते हैं और भारतीय दिखने के लिए जरुरी सारे कागजात हासिल कर लेते हैं।एक भारतीय ही चंद रुपयों के लिए इन्हें यह मुहैया कराता है।उसे देश की चिंता नहीं है।उसे तो सिर्फ अपनी चिंता है।उसे लोभ है।इसलिए वह भ्रष्टाचार के जरिए गलत को भी सही करता है।
दूसरा,केंद्र असम को विकास के लिए राशि मुहैया कराता है।लेकिन इसमें भ्रष्टाचार होता है।राजनेता वोट खरीदने के लिए अपना खर्च निकालने और अधिकारी धनवान बनने विकास की रकम का अधिकांश गटक जाते हैं।विकास सही नहीं होता।कुछ के पाकेटों तक सीमित रहता है।इससे समाज में भेद नजर आते हैं।कोई गरीब है तो गरीब ही रह जाता है और कोई आंखों के सामने लखपति से अरबपति बनता है।जब वंचित लोग इसे देखते हैं तो उन्हें गुस्सा आता है।उन्हें रोजगार नहीं मिलता।तब वे बंदूक उठाते हैं और उग्रवाद के रास्ते पर जाते हैं।हिंसा करते हैं।सरकार से बातचीत होती है और समझौता।हिंसा और लूट के बावजूद समझौते में इनके सारे खून माफ हो जाते हैं।फिर ये राजनेता बन जाते हैं।इनका राजनेतावाला धंधा शुरु हो जाता है।इस तरह क्रमवर सिलसिला चलता रहता है।यानी सब अपनी-अपनी दुकान चलाते हैं।तब फिर इस देश का भला कैसे होगा ?
असम के बोड़ोलैंड की हिसा पर अब आते हैं।छह साल के असम आंदोलन के बाद 1985 में असम समझौते हुआ।असम आंदोलन में शिरकत करनेवाले बोड़ो नेताओं को लगा कि असम आंदोलन के बाद असम समझौता कर असमिया युवक सत्ता पा सकते हैं तो हम क्यों नहीं ?क्योंकि बोड़ो नेता अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे।इन्होंने तब अलग बोड़ो राज्य की मांग में आंदोलन शुरु कर दिया।हिंसा हुई और बोड़ो स्वशासी परिषद के लिए समझौता हुआ।आंदोलन करनेवाले नेता ही परिषद की सत्ता पर काबिज हुए।लेकिन धांधली के आरोप में परिषद को भंग किया गया तो इन लोगों ने फिर अलग संगठन बनाकर हिंसक आंदोलन किया।फिर केंद्र से समझौता हुआ और केंद्र ने परिषद की झोली में कुछ और डाल दिया।सत्ता आई।भ्रष्टाचार हुआ।एक धड़ा अपने को ठगा महसूस कर हिंसक कार्य जारी रखे हुए है।वह अलग संप्रभु राष्ट्र की मांग करता है ताकि समझौता होने पर इस बार राज्य मिल ही जाए।सभी बोड़ो नेता अलग राज्य की मांग का समर्थन करते हैं।
पर इस अलग बोड़ो राज्य में बाधा यह है कि उस इलाके में बोड़ो आबादी 50 प्रतिशत से कम है।इसलिए इनका मकसद उस इलाके में रह रहे गैर बोड़ो समुदाय को हटाना।इसके लिए अलग-अलग दंगे किए गए।कभी आदिवासियों को निशाना बनाया गया तो कभी मुसलमानों को।इसलिए अलग राज्य न दिए जाने तक यह निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया हो गई है।हिंसा पूरी तरह नहीं थमेगी।कारण विभिन्न गुटों में बंटे राजनेता अपनी-अपनी दुकान चलाने इन्हें उकसाकर अपना उल्लू सीधा करते रहेंगे।
यदि सरकार गंभीर होती और उसे पूरी तरह यह खात्मा करना होता तो पहला काम इलाके में जितने भी अवैध हथियार हैं उन्हें जब्त करना था।विभिन्न पक्ष इसकी मांग कर रहे हैं।लेकिन ऐसा अब तक नहीं किया गया है।क्यों ? यदि ऐसा किया गया तो समस्या खत्म होगी।समस्या खत्म होने पर इनकी दुकान नहीं चलेगी।सो,खून इनके लिए साधारण निर्दोष लोगों का बहता रहेगा।इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता।