Wednesday, June 10, 2015

शाबास इंडिया,शाबास मोदीजी

राजीव कुमार

भारतीय सेना ने म्यांमार के घने जंगलों में प्रवेश कर आतंकियों को मार गिराया है।यह मणिपुर में सेना पर हुए हमले के बदले में की गयी कार्रवाई है।आतंकवाद देश को नुकसान कर रहा है।इसमें कोई संदेह नहीं।वर्ष 2003 में केंद्र में जब भाजपा नीत राजग की सरकार थी तब भी ऐसा ही कड़ा रुख देखा गया था।भूटान में आपरेशन आल क्लीयर चला और भूटान से असम के आतंकियों का सफाया किया गया।अब फिर केंद्र में भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार है और कड़ा रुख सामने देखने को आ रहा है।सोशल मीडिया में भी सेना की इस कार्रवाई की जमकर तारीफ हो रही है।
आपरेशन आल क्लीयर के दौरान भारतीय सेना ने भूटानी सेना के साथ मिलकर दक्षिण भूटान में 30 आतंकी शिविरों को ध्वस्त किया था।इनमें उल्फा के 13,एनडीएफबी के 12 और केएलओ के पांच शिविर थे।तब तत्कालीन सेना प्रमुख एनसी विज ने कहा था कि हमने लगभग 650 आतंकियों को निष्प्रभावी कर दिया है यानी कुछ मारे गए और कुछ पकड़े गए।पकड़े गए कई आज मुख्य़धारा में शामिल होकर सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं।इसके बाद बांग्लादेश के साथ संबंध बेहतर हुए तो वहां रहनेवाले अनेक आतंकी नेताओं को भारत के हवाले किया गया।आज दोनों पड़ोसी देशों में पूर्वोत्तर के आतंकी संगठनों का पहले जैसा जमावड़ा नहीं।पहले तो ये आतंकी असम में बड़ी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देकर सीधे पड़ोसी भूटान या बांग्लादेश की सीमा में जा घुसते थे।पर आज वहां शिविरों के न रहने से इस तरह की घटनाएं न के बराबर हो रही है।
मणिपुर में आतंकी संगठन एनएससीएन(के) ने हमला कर 18 सेना जवानों की नृशंस हत्या कर दी।कारगिल के बाद सेना को सबसे बड़ा झटका था।सभी ने इस आतंकी हमले की निंदा की।कठोर कार्रवाई की बात कही गयी।कठोर कार्रवाई भी हुई।सेना ने आतंकियों को म्यांमार में घुसकर मारा।यह देश की विदेश नीति की सफलता मानी जाएगी।पूर्वोत्तर के अधिकांश आतंकी संगठन भूटान और बांग्लादेश में सफाए के बाद म्यांमार को अपनी शरणस्थली बनाए हुए थे।पर भारत ने अब पड़ोसी देशों के साथ जो संबंध बनाने शुरु किए हैं उससे भूटान में पहले ही,बाद में बांग्लादेश और अब म्यांमार में आतंकियों का सफाया शुरु हो गया।निसंदेह यह राजग सरकार की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।पूर्वोत्तर में जो आतंकी गतिविधियां चल रही है उससे विकास के कार्यों को करने में दिक्कत आ रही है।विकास का पैसा आतंकियों के पास चला जाता है।थोड़फोड़ की गतिविधियों को अंजाम देकर ये जानमाल को नुकसान पहुंचाते हैं।यदि आतंकी गतिविधियों को पूरी तरह विराम लग गया तो पूर्वोत्तर देश का एक अहम पर्यटन क्षेत्र होगा।
भारतीय सेना की बदले की कार्रवाई से आतंकियों और आतंक को बढ़ावा देनेवाले देशों को कड़ा संदेश गया है।यदि भारत सरकार इस तरह कड़ा रुख अख्तियार करती रही तो आतंकियों और इन्हें बढ़ावा दे रहे देशों को सोचने को मजबूर होना होगा।म्यांमार में आतंकियों का सफाया होने के बाद पूर्वोत्तर में आतंक खत्म होने के कगार पर होगा।क्योंकि अब भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से सटे देशों के साथ संबंध अच्छे हुए हैं।वे इन आतंकियों को शरण देने से कतराएंगे।यदि किसी ने चोरी-छिपे प्रवेश पा भी लिया है तो वहां भारत की सेना के हमले का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।
भारत सरकार सीमाओं को पूरी तरह सुरक्षित करने की कोशिश में लगी है।आज से कुछ साल पहले मैंने अरुणाचल प्रदेश के फांग्सूपास से म्यांमार में प्रवेश किया तो कोई रोकटोक नहीं देखी।घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हुए हम स्टीलवेल सड़क से म्यांमार में प्रविष्ट हुए।काफी अंदर चले गए।इससे वहां की सुरक्षा व्यवस्था का खोखला स्वरुप सामने आता है।लेकिन अब केंद्र की मोदी सरकार ने भारत से लगनेवाली म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा को चाक-चौबंद करने का फैसला किया है।इस पर सुझाव देने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया है।खुली सीमा के कारण आतंकी वहां से आसानी के साथ आते-जाते हैं।साथ ही ड्रग्स व हथियारों की तस्करी होती है।म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा एक्ट ईस्ट पालिसी के लिए भी सुरक्षित होनी जरुरी है।टास्क फोर्स अगले एक महीने में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप देगी।
केंद्र की मोदी सरकार के इस तरह के कदमों से निश्चय ही पूर्वोत्तर का भला होगा।उन्होंने लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान कहा था कि पूर्वोत्तर के आठ राज्य अष्ठलक्ष्मी हैं।सही अर्थों में वे अपने नेतृत्ववाली सरकार के जरिए कार्य कर यह साबित कर दें तो इतिहास के पन्नों में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।पूर्वोत्तर के पास अपार संसाधन हैं,लेकिन आतंकवाद के चलते वह देश के अन्य हिस्सों की तुलना में आगे नहीं बढ़ पाया।पर देर नहीं हुई है।अब भी इसे किया जा सकता है।

Thursday, June 4, 2015

हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता: देश नहीं,वोट बैंक प्राथमिकता


राजीव कुमार

भाजपा पहले से ही बांग्लादेश से आए हिंदुओं के शरण के पक्ष में रही है।लेकिन अब इस समुदाय के वोट से भाजपा को कई सीटें हथियाते देख कांग्रेस भी इन्हें शरण दिए जाने का पक्ष लेने लगी है।इससे साफ होता है कि इन सबके लिए देश प्राथमिकता नहीं,अपनी राजनीति की दुकान चलाना प्राथमिकता है।
देश में ऐसे ही जनसंख्या विस्फोट हो चुका है।लोगों को काम पाने और दो जून की रोटी का जुगाड़ करने मारा-मारी करनी पड़ रही है।जमीन का संकट उत्पन्न हो गया है।इन सब की फ्रिक हमारे राजनेताओं को नहीं है।देश में और लोगों को लाकर ये समस्या बढ़ाना चाहते हैं ताकि अपनी रोटी मजे से सेक सकें।
भाजपा का तर्क है कि बांग्लादेश में अत्याचार का सामना कर भारत आए हिंदू लोगों को शरण के साथ नागरिकता प्रदान की जानी चाहिए।इस पूरे मसले को मानवीय दृष्टिकोण से देखने की बात भाजपा कहती है।तब फिर संदिग्ध बांग्लादेशियों के खिलाफ विदेशी न्यायाधिकरण में मामला चलाने और उनकी शिनाख्त के लिए इतना तामझाम कर खर्च करने की जरुरत ही नहीं है।न्यायाधिकरण में मामला लड़ने के लिए पैसे खर्च कर बांग्लादेशी करार दिए गए अनेक व्यक्ति आज भी डिटेंशन कैंपों में रहने को मजबूर हैं।फिर उन्हें यह पीड़ा क्यों दी गई।
असम में बांग्लादेश से आए अनेक हिंदू और मुस्लिम परिवार रहते हैं।विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा विदेशी करार दिए गए फरार लोगों की जो सूची असम पुलिस की सीमा शाखा ने हाल ही में प्रकाशित की है उसमें बंगाली हिंदू और मुसलमानों लोगों की भरमार है।असम की बराक घाटी और कई विधानसभा सीटों के नतीजों में इनकी अहम भूमिका होती है।पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने बांग्लादेश में सताए गए और असम आए लोगों को भारत में शरण देने का मुद्दा उठाया था।इसके चलते कांग्रेस को बराक घाटी की 14 में से 13 सीटें मिली थी।गोगोई सताए गए सिर्फ हिंदू लोगों की बात नहीं कर रहे थे।लेकिन अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अंजन दत्त ने बांग्लादेश में सताए जाने के चलते आए हिंदू लोगों को शरण दिए जाने की बात कह दी है।यानी कांग्रेस व भाजपा एक ही नाव पर सवार हो गए हैं।
असम में विदेशी खदेड़ने के लिए छह साल तक आंदोलन हुआ था।सरकार के साथ असम समझौता हुआ।इसमें स्पष्ट लिखा है कि 25 मार्च 1971 के बाद जो भी आया है,उसे जाना होगा।सभी को यह मान्य है।अब इसके आधार पर ही राष्ट्रीय नागरिक पंजी(एनआरसी) के अद्यतन का कार्य किया जाएगा।यदि अभी तक के सताए बांग्लादेशियों को लेना है तो फिर असम समझौते को कुचला जाएगा।एनआरसी का तामझाम करने की जरुरत ही नहीं है।देश के राजनेताओं का दोगलापन साफ झलकता है।
सवाल उठता है कि यदि बांग्लादेश से आए हिंदू को लेने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहते हैं तो म्यांमार से आए रोहंगिया और बांग्लादेश के चकमा लोगों के प्रति आपका भेदभाव क्यों?क्या हिंदू बंगाली आपके वोट बैंक हैं इसलिए ? भाजपा के नेतृत्ववाली केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरे विश्व में डंका बजने की बात प्रचारित हो रही है।बांग्लादेश पड़ोसी देश है।भारत के साथ फिलहाल अच्छे संबंध हैं।प्रधानमंत्री वहां जा रहे हैं।तब बांग्लादेश में हिंदुओँ को सताने का मसला क्यों नहीं उठाया जाता।अंतरराष्ट्रीय किसी मंच पर बांग्लादेश में हिंदुओं के सताने का मसला फिलहाल उठते नहीं दिखा है।ऐसे में बांग्लादेश के लोगों को देश में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।यह सरासर गलत है ।यदि ऐसा किया जाता है तो सीमा सील करने के लिए अरबों रुपए खर्च करने की जरुरत ही नहीं है।न ही विदेशी न्यायाधिकरणों की जरुरत है और न ही किसी को डिटेशन कैंप में रखने की और न ही अखबारों में विज्ञापन देकर फरार हुए बांग्लादेशियों के नामों को प्रकाशित करने की।न ही मतदाता सूची में किसी के नाम के आगे डी यानी डाउटफुल लगाने की।


Thursday, May 28, 2015

भाजपा के यू-टर्न ले डूबेंगे असम में



राजीव कुमार
असम में अगले साल अप्रेल-मई में विधानसभा चुनाव होंगे।पिछले साल केंद्र की सत्ता में भारी बहुमत से आने के बाद भाजपा असम में भी अपनी सरकार बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को असम की 14 में से सात सीटें हासिल हुई थी।उसे लगता है कि वह असम के मुद्दों को भुनाकर सरकार बना लेगी।लेकिन पिछले एक साल में केंद्र की सत्ता में रहकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने असम में किए गए अपने वायदों पर ही इतने यू-टर्न मारे हैं कि हर कोई हैरत में पड़ गया है।इन यू-टर्नों को देखकर मोदी व उनकी सरकार के प्रति जनता में पहले जैसा जोश नहीं है।इसका फायदा फिर असम में चल रही तरुण गोगोई के नेतृत्ववाली सरकार को मिलने की संभावना है।
मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का एलान किया था।पर भाजपा की लोकप्रियता को गिरते देख उनमें फिर जोश आ गया है।वे कहने में भी संकोच नहीं करते कि वे अब फाइटर मूड में आ गए हैं।लगातार तीन बार सत्ता में आने के बाद वे राज्य के पहले ऐसे मुख्यमंत्री बन गए थे जो सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं।वे 2016 में भी कांग्रेस का नेतृत्व कर सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं।वहीं भाजपा का ग्राफ नीचे खिसक रहा है।भाजपा के पास बेहतर उम्मीदवारों की कमी है।लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा ने जो वायदे असम की जनता से किए थे उनसे वह पूरी तरह विपरीत स्थिति में चल रही है।उसके इस कदम से मतदाताओं को लगने लगा है कि यह कहती कुछ और है करती कुछ और है।
भाजपा ने बांग्लादेश के साथ भूमि हस्तातंरण मसले पर सबसे बड़ा यू-टर्न लिया।लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी ने गुवाहाटी की जनसभा में कहा था कि कांग्रेस के नेतृत्ववाली केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(संप्रग) सरकार ने आपसे पूछकर यह समझौता किया था क्या?हम असम की एक इंच जमीन देने नहीं देंगे।लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी गुवाहाटी आए तो उनके सुर बदल गए।उन्होंने कहा कि असम के फायदे के लिए जो होगा वहीं करेंगे।प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि इससे सीमा विवाद हल हो जाता है तो सीमा पूरी तरह सील करने में मदद मिलेगी।घुसपैठ बंद होगी।यही बात थी तो संप्रग ने जब समझौता किया था तो उसके विरोध में भाजपा क्यों उतरी।सिर्फ वोट की राजनीति के लिए यह किया जाता है क्या?
भाजपा का दूसरा बड़ा यू-टर्न सुवनसिरी पनबिजली परियोजना को लेकर था।लोकसभा चुनाव के दौरान इस परियोजना के खिलाफ आंदोलन कर रहे संगठनों व जनता को आश्वस्त करते हुए भाजपा ने कहा कि हम बड़े बांध के खिलाफ हैं।लेकिन सत्ता में आते ही फिर सुर बदला।कहा,विकास के लिए बिजली जरुरी है।इसे हम हर हाल में करेंगे।यही नहीं असम के विशेष राज्य का दर्जा समाप्त करने के साथ ही 90:10 के अनुपात से जो राशि मिलती थी उसका पैटर्न भी बदलकर 50:50 कर दिया।विभिन्न केंद्रीय योजनाओं की राशि में कमी की।इन सब का फायदा मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सरकार ले जाएगी।
भाजपा के पास विधानसभा के चुनाव में उतारने के लिए उम्मीदवार नहीं है।इसलिए वह अन्य पार्टियों के फ्लाप हो चुके नेताओं को अपनी पार्टी में ले रही है।कांग्रेस के अनेक विधायक टिकट से वंचित होने पर भाजपा के दरवाजे दस्तक देंगे।पार्टी यदि इन सबके बलबूते पर सरकार में आने की सोच रही है तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है।फिलहाल भाजपा अगले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्रीय मंत्रियों को असम आने का निर्देश दे चुकी है।खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रियों को यह निर्देश दिया है।हर समय एक न एक केंद्रीय मंत्री असम में मौजूद रहता है।केंद्रीय मंत्री अपने मंत्रालय के यहां चल रहे कार्यों की समीक्षा करने के साथ ही जाते-जाते गोगोई सरकार पर आरोप लगा जाते हैं कि केंद्रीय राशि का सदुपयोग नहीं हुआ है।यानी चुनाव के पहले आरोप-प्रत्यारोपों की राजनीति हावी है।
भाजपा के आरोपों का जवाब गोगोई देने के साथ ही नई योजनाओं का एलान कर रहे हैं।पुरानी पड़ी बंद योजनाओं को फिर से चालू किया जा रहा है।मतदाताओं को लुभाने की कोशिश चल रही है।गोगोई भी अब भाजपा के आक्रामक प्रचार का उसी के अंदाज में जवाब देना शुरु कर दिया है। इसलिए भाजपा के लिए आनेवाला विधानसभा चुनाव आसान नहीं होगा।भाजपा का प्रदेश नेतृत्व भी सक्षम नजर नहीं आता।अकेले तो वह किसी भी कीमत पर सरकार नहीं बना पाएगी।(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
मोबाइल-9435049660

Monday, September 3, 2012

असम हिंसाः कम्यूनल हैं हम

राजीव कुमार


हम अधिकांश भारतीय सांप्रदायिक यानी कम्यूनल हैं।मेरे इस कथन पर बहुत लोगों को आपत्ति हो सकती है।लेकिन यह बात सौ प्रतिशत सच है।सच कड़वा होता है।यदि हम अधिकांश सांप्रदायिक नहीं होते तो देश में मजहब के नाम पर हिंसा नहीं होती।असम के बोड़ो इलाके में हिंसा के बाद उत्पन्न स्थिति को देखने पर मैं यह कह रहा हूं।
बोड़ो इलाके में हिंसा हुई।अधिकांश नेताओं ने सीधे कह दिया कि इसके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठियों का हाथ है।ऐसा कहने के लिए कोई जांच-पड़ताल भी नहीं की।यदि है तो इन बांग्लादेशियों को हम देश का शत्रु मानते हैं और इन्हें तुरंत गिरफ्तार करवाया जाए।भाजपा नेता तो कह रहे हैं कि हिंसा के बाद बनाए गए राहत शिविरों में बांग्लादेशी रह रहे हैं।हद हो गई।हम अपने को धर्मनिरपेक्ष देश मानते हैं,लेकिन भारतीयों को भी बांग्लादेशी कहने से हमें कोई संकोच नहीं।बांग्ला भाषा बोलने, दाढ़ी रखने व लूंगी पहनने से कोई बांग्लादेशी नहीं हो जाता।यह हम कट्टर भारतीयों को जान लेने की जरुरत है।
असम के उन इलाकों में जाने की जरुरत है, जहां ये रहते हैं।मेरा सौभाग्य है कि मैं उस इलाके में जन्मा,पला और बड़ा हुआ हूं।निचले असम के चर इलाकों में यह रहते हैं।जहां विकास का प्रकाश अब तक नहीं पहुंचा है।यह बेहद मेहनती होते हैं।अपने इलाके में काम के अवसर न रहने के कारण ये अन्य जगहों पर काम के लिए यायावरी जीवन जीते हैं।यह इतने पढ़े लिखे नहीं होते कि कागजातों का क्या महत्व है,यह इन्हें समझ में आए।इसलिए इन्हें सीधे बांग्लादेशी करार दिया जाता है।वजह है यह बांग्लादेश से सटे भारतीय इलाकों में रहते हैं और बांग्लादेश के लोगों की तरह ही दिखते हैं।क्या यही इनका दोष है ?देश की आजादी के पहले बांग्लादेश के लोग भारतीय ही थे।यह भी जान लेने की जरुरत है।
यदि इन भारतीयों को हम बांग्लादेशी कहेंगे तो क्या इनके मन में ठेस नहीं पहुंचेगी ?यह अलगाव पैदा नहीं करेगी ? इनके मन में असुरक्षा का भाव पैदा होगा।क्या मुझे या आपको कोई बांग्लादेशी या पाकिस्तानी कहे तो सहन कर पाएंगे ?नहीं न।तो फिर हमें यह कहने का अधिकार किसने दिया ?हां,बांग्लादेशी सीमा खुली रहने का फायदा उठा आ रहे हैं।इन्हें पकड़ने की जरुरत है।सीमा सील किए जाने की जरुरत है।पर बिना सोचे-समझे किसी को उनकी बोली और पहनावे को देखकर बांग्लादेशी कह देना मानहानि करना है।इससे हमें बचना चाहिए।ऐसा कर हम देश को मजबूत करने के बजाए कमजोर कर रहे हैं।
बोड़ो हिंसा के बाद देश के अन्य इलाकों में पढ़ाई और रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे पूर्वोत्तर के लोग वहां से पलायन कर लौट आए।इनमें से कुछेक को वहां धमकी दी गई।इसके बाद फैली अफवाह के चलते लोगों का उन इलाकों से पलायन हुआ।असम के लोगों को देश के अन्य हिस्सों में धमकाना भी हमारे कम्यनूल होने का सबूत है।यदि हम भारतीय हैं तो हम एक हैं।लेकिन मजहब व इलाके के संकीर्ण विचारों को लेकर हमारी सोच संकुचित हो चुकी है।इससे जुड़ाव नहीं,बिखराव पैदा होगा।हमें इससे बचने की जरुरत है।
लेकिन धर्म के नाम पर राजनीति करनेवाले ऐसा करने से बाज नहीं आते।उन्हें तो सिर्फ अपनी रोटियां सेंकने से मतलब है।असम की हिंसा के बाद बाहर नफरत फैलाने का आरोप लगा बजरंग दल ने आल इंडिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के अध्यक्ष तथा धुबड़ी के सांसद बदरुद्दीन अजमल को गिरफ्तार करने की मांग में 27 अगस्त को असम बंद का आह्वान किया।इस बंद की ज्यादा आलोचना मैंने नहीं देखी।हिंदू संगठन के दिए गए बंद पर ज्यादातर लोग चुपच प घरों में दुबके रहे।जब 28 अगस्त को अखिल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ(आम्सू) ने असम बंद का आह्वान किया तो हिंसक घटनाएं हुई।पत्रकारों पर हमला हुआ।
हिंसा की निंदा की जानी चाहिए,लेकिन जिस तरह इस संगठन के साथ व्यवहार किया जा रहा है,वह बराबर का दर्जा नहीं कहा जा सकता।बंद,बंद हो।हिंसा समर्थनयोग्य नहीं है।बंद के दौरान संगठन के कुछेक सदस्य हिंसा कर सकते हैं।दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।पर इसके लिए पूरे संगठन की आवाज को बंद करने की कोशिश समर्थन योग्य नहीं हो सकती।हिंदू संगठन के बंद के दौरान ऐसा होता तो शायद यह कोशिश नहीं होती।हम दोयम दर्जा अपना रहे हैं।यह ठीक नहीं।जब तक हम इस तरह का व्यवहार करेंगे मुसलमानों को भारतीय बना नहीं पाएंगे।दिखने मैं वे भारतीय होंगे पर उनका मन हमारे साथ नहीं होगा।यह देश को कमजोर करता है।हम कम्यूनलों को यह समझने की जरुरत है।

Wednesday, August 29, 2012

गोगोई की द ग्रेट नौटंकी



राजीव कुमार

टीवी पर मनोरंजन के लिए लोग आजकल हास्य कार्यक्रम अन्य की तुलना में खूब देखते हैं।क्योंकि इससे उन्हें मजा आता है,उनका मनोरंजन होता है।तनाव कम होता है।पर असम के टीवी चैनलों में अब तक हिंदी की तुलना में कम हास्य धारावाहिक दिखाए जाते हैं।लेकिन यहां एक टीवी चैनल में हफ्ते में एक बार चुपोति (हास्ययुक्त निंदा) नामक व्यंग्यात्मक कार्यक्रम दिखाया जाता है।बहुत लोकप्रिय है।इसमें असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को हू-ब-हू कापी किया जाता है, वह लोगों को हंसने के लिए मजबूर कर देता है।गोगोई की बातें ही ऐसी होती है।वह अपनी इस तरह की बातों से ही 11 साल राज्य में शासन कर चुके हैं,लेकिन अब रास्ता आसान नहीं दिखता।
नौटंकी एक प्रकार का लोक नाट्य है जिसमें संवाद तथा संगीत की प्रधानता होती है।अच्छी लगती है।गोगोई इतने दिनों तक अपने संवादों और चापलूसों के संगीत से लोगों को मोह रहे थे,लेकिन अब उनके जाल में लोग फंसना नहीं चाहते।अब लोगों को समझ में आने लगा है।विपक्षी पार्टी असम गण परिषद पर टिप्पणी करते हुए गोगोई पहले अकसर कहते थे खट्टे आम अगप ने दो बार बेच दिए।अब लोग उनकी बातों(अगप) पर भरोसा नहीं करनेवाले हैं।गोगोईजी , आप की नौटंकी से लोग अब ऊब चुके हैं।क्योंकि आप और आपकी सरकार सिर्फ बातें करती है,काम नहीं।मैं तथ्य रखूंगा।
पहला,सुप्रीम कोर्ट और केरल उच्च न्यायालय ने बंद को अवैध घोषित कर रखा है।गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने भी इसे अवैध करार दिया है,लेकिन इतने सालों तक सरकार को यह अमल करने की इच्छा नहीं हुई।खुद मुख्यमंत्री गोगोई ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि बंद के दौरान जो लोग दुकान खोलते हैं,गाड़ी चलाते हैं,इन्हें किसी तरह की क्षति का सामना करना पड़ता है तो हम इसकी भरपाई करेंगे।इसके लिए फंड रखा जाएगा।लेकिन कुछ नहीं हुआ।अब बोड़ो बहुल इलाके की हिंसा के विरोध में बंद हो रहे हैं तो सरकार को अदालती आदेश की याद आई।इसका अर्थ है कि अब तक आप चाहते तो बंद को बंद करने के कदम उठा सकते थे,लेकिन किया नहीं।क्यों ? असम में अब इस आदेश को सिर्फ एक महीने तक लागू करना चाह रहे हैं,आगे के लिए क्यों नहीं ?यानी सरकार समस्याओं को समस्या बनाकर रखना चाहती है।
दूसरा,बोड़ो इलाके की हिंसा के बीच असम के स्वास्थ्य व शिक्षा मंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा ने अपने पद से इस्तीफा देने का पत्र मुख्यमंत्री गोगोई को थमा दिया।दोनों के बीच काफी समय से मनमुटाव था और सत्ता केंद्रिक लड़ाई चल रही थी।पर अचानक दिल्ली से लौटकर नौंवे दिन डा.शर्मा ने गोगोई से बात की और काम पर लौट आए।गोगोई ने डा.शर्मा को फिर काम करने दिया।इससे साफ हो गया कि गोगोई निर्णय लेने में कमजोर हैं।वे कठपुतली की तरह कार्य कर रहे हैं।लेकिन कहते हैं कि मैं दिल्ली के आदेश से चलनेवालों में नहीं हूं।
तीसरा,बोड़ो इलाके की हिंसा के बाद विभिन्न पक्षों ने मांग की कि इलाके में जो अवैध हथियार हैं,उन्हें जब्त किया जाए।लेकिन गोगोई इसमें भी ढुलमुल रवैया अपनाते रहे।28 अगस्त को उन्होंने कहा कि 27 अगस्त को सेना को हथियार जब्त करने का अधिकार दिया गया है।पर इतनी देर क्यों? पिछले एक महीने से क्या किया गया ? जब किसी इलाके में चुनाव होते हैं तो चुनाव आयोग के निर्देश पर यही पुलिस फटाफट हथियार जब्त करती है।फिर गोगोई की सरकार में यह क्यों नहीं हो पाया?किस के प्रति गोगोई नरम है और क्यों? जो उन्हें हथियार जब्त करने में दिक्कत होती है।
यह सब सवाल हम गोगोई से पूछ नहीं सकते।क्या हम उनसे डर गए हैं? नहीं।तो फिर क्यों? वे तानाशाह बन गए हैं।इन कड़वे सवालों को सुनकर उन्हें गुस्सा आ जाता है।पत्रकार हूं,इसलिए उनके संवाददाता सम्मेलनों को कवर करने जाता हूं।मेरे सवालों से वे इतने घबरा गए हैं कि अब तो उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कह भी दिया कि मैं आपके किसी सवाल का जवाब नहीं दूंगा।पहले मेरे कई सवालों पर गुस्से में आकर उन्होंने ऐसे जवाब दिए हैं कि स्थानीय अखबारों की सुर्खियां बनी।उदाहरण के तौर पर कुछ पेश करना चाहूंगा।
असम में बाढ़ आई हुई थी,गोगोई अमेरिका गए हुए थे।बाढ़ के हालात जानने के लिए प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने मंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा को कई बार फोन किया।जब गोगोई से मैंने पूछा कि प्रधानमंत्री ने आपसे पूछने के बजाए हिमंत को फोन कर जानकारी ली तो गोगोई ने गुस्से में कहा-प्रधानमंत्री हिमंत को सुपर मुख्यमंत्री बना दे।इसी तरह एक बार मैंने राज्य में अगप शासनकाल में हुई गुप्त हत्याओं पर पूछा।कांग्रेस इस मसले को लेकर खूब सक्रिय रहती है।सत्ता में आने पर गुप्त हत्या के दोषियों को सजा दिलाई जाएगी,यह कांग्रेस का नारा था।तीसरी बार लगातार आई है,पर वायदा अब तक पूरा नहीं हुआ है।एक मुख्यमंत्री इतना असहाय कैसे हो सकता है।इस पर गोगोई ने कहा था-मुख्यमंत्री क्या, देश का गृहमंत्री भी असहाय हो सकता है।इस तरह अनेक वाकये हुए हैं।
एक समय था जब गोगोई खुद कहते थे पूछिए,क्या पूछना है ? वे पारदर्शिता की बात करते थे।लेकिन अब सच का सामना करने से वे घबराते हैं।वे सिर्फ सरकार की प्रशंसा सुनने के आदी हो गए हैं।अभी विभिन्न राज्यों में पेट्रोल व गैस के दाम बढे।कई राज्यों ने अपने यहां रियायत का एलान किया।पर गोगोई खामोश रहे।इससे बड़ी कोई नौटंकी आपने कभी देखी है,जो सहजता के साथ राज्य में बिना कोई खर्च के लोग देख रहे हैं।वाह,गोगोईजी।आपका कोई जवाब नहीं।

Sunday, August 26, 2012

असम हिंसाःवजह लोभ व भ्रष्टाचार

राजीव कुमार

लोभ व भ्रष्टाचार जब तक रहेंगे देश में विशेषकर असम में शांति नहीं होगी।लोभ है तो भ्रष्टाचार होगा।भ्रष्टाचार होगा तो संपूर्ण विकास का फायदा लोगों तक नहीं पहुंचेगा।इसलिए देश में लोगों के मन से लोभ पूरी तरह खत्म करना होगा।यह खत्म होने के बाद भ्रष्टाचार नहीं होगा।भ्रष्टाचार नहीं होगा तो गलत कार्य नहीं होंगे।सबको बराबर अपना हक मिलेगा।
असम में चल रही हिंसा की गहराई से पड़ताल करने के बाद मुझे यही लगता है।राजनेता इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं।कोई इनके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठ को वजह मानता है तो कोई इलाके में मौजूद अवैध हथियारों को इनकी वजह बता रहा है।लेकिन इन सबके पीछे लोभ व भ्रष्टाचार ही प्रमुख है।
आइये सीधे मुद्दों की तरफ आते हैं।पहला,भारत-बांग्लादेश सीमा से घुसपैठ होती है।चंद पैसों के एवज में देश में विदेशी घुस आते हैं।घुसने के बाद यहां फैले भ्रष्टाचार की वजह से ये लोग राशन कार्ड हासिल करते हैं,मतदाता सूची में नाम दर्ज कराते हैं और भारतीय दिखने के लिए जरुरी सारे कागजात हासिल कर लेते हैं।एक भारतीय ही चंद रुपयों के लिए इन्हें यह मुहैया कराता है।उसे देश की चिंता नहीं है।उसे तो सिर्फ अपनी चिंता है।उसे लोभ है।इसलिए वह भ्रष्टाचार के जरिए गलत को भी सही करता है।
दूसरा,केंद्र असम को विकास के लिए राशि मुहैया कराता है।लेकिन इसमें भ्रष्टाचार होता है।राजनेता वोट खरीदने के लिए अपना खर्च निकालने और अधिकारी धनवान बनने विकास की रकम का अधिकांश गटक जाते हैं।विकास सही नहीं होता।कुछ के पाकेटों तक सीमित रहता है।इससे समाज में भेद नजर आते हैं।कोई गरीब है तो गरीब ही रह जाता है और कोई आंखों के सामने लखपति से अरबपति बनता है।जब वंचित लोग इसे देखते हैं तो उन्हें गुस्सा आता है।उन्हें रोजगार नहीं मिलता।तब वे बंदूक उठाते हैं और उग्रवाद के रास्ते पर जाते हैं।हिंसा करते हैं।सरकार से बातचीत होती है और समझौता।हिंसा और लूट के बावजूद समझौते में इनके सारे खून माफ हो जाते हैं।फिर ये राजनेता बन जाते हैं।इनका राजनेतावाला धंधा शुरु हो जाता है।इस तरह क्रमवर सिलसिला चलता रहता है।यानी सब अपनी-अपनी दुकान चलाते हैं।तब फिर इस देश का भला कैसे होगा ?
असम के बोड़ोलैंड की हिसा पर अब आते हैं।छह साल के असम आंदोलन के बाद 1985 में असम समझौते हुआ।असम आंदोलन में शिरकत करनेवाले बोड़ो नेताओं को लगा कि असम आंदोलन के बाद असम समझौता कर असमिया युवक सत्ता पा सकते हैं तो हम क्यों नहीं ?क्योंकि बोड़ो नेता अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे।इन्होंने तब अलग बोड़ो राज्य की मांग में आंदोलन शुरु कर दिया।हिंसा हुई और बोड़ो स्वशासी परिषद के लिए समझौता हुआ।आंदोलन करनेवाले नेता ही परिषद की सत्ता पर काबिज हुए।लेकिन धांधली के आरोप में परिषद को भंग किया गया तो इन लोगों ने फिर अलग संगठन बनाकर हिंसक आंदोलन किया।फिर केंद्र से समझौता हुआ और केंद्र ने परिषद की झोली में कुछ और डाल दिया।सत्ता आई।भ्रष्टाचार हुआ।एक धड़ा अपने को ठगा महसूस कर हिंसक कार्य जारी रखे हुए है।वह अलग संप्रभु राष्ट्र की मांग करता है ताकि समझौता होने पर इस बार राज्य मिल ही जाए।सभी बोड़ो नेता अलग राज्य की मांग का समर्थन करते हैं।
पर इस अलग बोड़ो राज्य में बाधा यह है कि उस इलाके में बोड़ो आबादी 50 प्रतिशत से कम है।इसलिए इनका मकसद उस इलाके में रह रहे गैर बोड़ो समुदाय को हटाना।इसके लिए अलग-अलग दंगे किए गए।कभी आदिवासियों को निशाना बनाया गया तो कभी मुसलमानों को।इसलिए अलग राज्य न दिए जाने तक यह निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया हो गई है।हिंसा पूरी तरह नहीं थमेगी।कारण विभिन्न गुटों में बंटे राजनेता अपनी-अपनी दुकान चलाने इन्हें उकसाकर अपना उल्लू सीधा करते रहेंगे।
यदि सरकार गंभीर होती और उसे पूरी तरह यह खात्मा करना होता तो पहला काम इलाके में जितने भी अवैध हथियार हैं उन्हें जब्त करना था।विभिन्न पक्ष इसकी मांग कर रहे हैं।लेकिन ऐसा अब तक नहीं किया गया है।क्यों ? यदि ऐसा किया गया तो समस्या खत्म होगी।समस्या खत्म होने पर इनकी दुकान नहीं चलेगी।सो,खून इनके लिए साधारण निर्दोष लोगों का बहता रहेगा।इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता।

Monday, June 20, 2011

असम में अब उग्रवाद से नहीं,अंधविश्वास से हो रही है हत्याएं

राजीव कुमार
असम में अब उग्रवाद से कहीं ज्यादा हत्याएं अंधविश्वास से हो रही है।राज्य की कांग्रेस सरकार स्वास्थ्य सेवा में आमूल-चूल परिवर्तन का दावा करती है,पर हकीकत इससे कोसों दूर है।अंदरुनी गांवों में आज भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया नहीं है।इसके कारण लोग कविराज की झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं।कविराज जब रोगी को स्वस्थ नहीं कर सकता तो किसी को डायन बताकर उसके चलते ऐसा हो रहा है,यह कह देता है।रोगी के परिजन को यह कह दिया जाता है कि इस डायन के रहते रोगी ठीक नहीं हो सकता यानी उसको इस दुनिया से ही रवाना कर देना है।इन सबके चलते ही बोड़ो बहुल इलाकों में डायन बताकर महिलाओं की निरंतर हत्याएं हो रही है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस बात को गंभीरता से लिया है।आयोग ने कोकराझाड़ जिले में अप्रेल महीने में छह महिलाओं की हत्या से संबधित रिपोर्ट जिले के पुलिस अधीक्षक को चार हफ्ते में देने को कहा है।पर इससे समस्या का खात्मा नहीं होगा।2001 में कोकराझाड़ जिले के थाइगारगुड़ी में डायन बताकर एक दंपत्ति की हत्या हुई तो असम पुलिस ने इस कुप्रथा के खात्मे के लिए प्रोजेक्ट प्रहरी नामक एक योजना शुरु की।योजना का मकसद था गांवों में स्वास्थ्य सेवा मुहैया करा अंधविश्वास को दूर करने के लिए जागरुकता फैलाना।पर दस साल बाद भी कोई सफलता हाथ नहीं लगी।आज भी डायन हत्याएं जारी है।

उदालगुड़ी जिले के माजबाट से बीस किमी दूर अरुणाचल सीमा से सटा है टिक्रीटिला बादानगुड़ी गांव।गांव के लोग शिक्षा व स्वस्थ सेवा से वंचित हैं।गांव के धरनीधर बसुमतारी की पत्नी मंजु बसुमतारी ने छठी बार संतान को जन्म दिया और इसके तीन हफ्ते बाद अस्वस्थ हो गई।धरनी ने इलाज के लिए कविराज का सहारा लिया।पर इससे फायदा नहीं हुआ और बसुमतारी की सात बीघा जमीन साढ़े पंद्रह हजार रुपए में बंधक चली गई।जब कविराज धरनी की पत्नी को ठीक नहीं कर पाया तो उसने पल्ला झाड़ने के लिए कह दिया कि पड़ोस की तीन महिलाएं डायन है।इन लोगों के झाड़-फूंक के कारण मंजु ठीक नहीं हो रही है।इसके चलते धरनी ने गांव के कुछ लोगों के साथ मिलकर जोगेन बोड़ो और उसकी पत्नी को मौत के घाट उतार दिया।पर गैर सरकारी संगठन वूमेन जस्टिस फोरम के सहयोग से बाद में धरनी की पत्नी को अस्पताल में भर्ती कराया गया तो पता चला कि महिला के शरीर में खून नहीं है।साथ ही वह ह्रदय रोग से पीड़ित है।मंजु की शादी 14 साल में हो गई और पिछले दस सालों में उसने छह संतानों को जन्मा है।अब मेडिकल इलाज से मंजु स्वस्थ है।

अब धरनी को पूरी तरह विश्वास हो गया कि डायन नाम की कोई चीज नहीं है।तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक बेकार की बातें हैं।अब वह इस कुप्रथा के खिलाफ सजगता फैलाएगा।धरनी के गांव में कोई अस्पताल नहीं है।इलाज के लिए 15-20 किमी का सफर तय करना पड़ता है।इसके चलते गांव के लोग सहज ही झाड़-फूंकवाले के चक्कर में पड़ जाते हैं।शिक्षा के नाम पर एक प्राथमिक विद्यालय है।पर इसमें भी नियमित कक्षाएं नहीं होती।

वूमेन जस्टिस फोरम की अध्यक्ष अंजलि दैमारी का कहना है कि जो अंधविश्वास के चलते लोगों की हत्याएं करते हैं उनके खिलाफ पुलिस प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।साथ ही असम पुलिस के प्रोजेक्ट प्रहरी को अधिक कारगर ढंग से लागू करनी चहिए।असम पुलिस के महानिदेशक शंकर बरुवा का कहना है कि हम इस कुप्रथा से निपटने के लिए राज्य महिला आयोग और गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर कार्य करने को इच्छुक हैं।पुलिस का राज्यभर में विस्तृत नेटवर्क है और यह इस कुप्रथा की रोकथाम में कारगर हो सकता है।बरुवा ने जिला पुलिस को निर्देश दिया है कि वे इस ओर कार्य करनेवाले संगठनों को मदद करे।अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक तथा प्रोजेक्ट प्रहरी के जनक कुल सैकिया ने कहा कि इस पर विचार विमर्श के बाद कठोर कानून लाने की जरुरत है।ला रिसर्च इंस्टीट्यूट की निदेशक जेउति बरुवा का कहना है कि कानून लाकर सती और बाल विवाह पर अंकुश लगाया जा सकता है तो राज्य में जारी डायन हत्याओं पर कानून लाकर अंकुश लगाया जा सकता है।

एक समय था जब राज्य में उग्रवाद के चलते हर रोज किसी की हत्या होती थी,पर अब स्थितियां बदल गई है।अंधविश्वास की जकड़न राज्य में अब भी इतनी गहरी है कि लोग मेडिकल इलाज कराने के बदले झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं और किसी को डायन बताकर हत्या कर देते हैं।राष्ट्रीय स्वास्थ्य ग्रामीण मिशन के तहत करोड़ो खर्च कर राज्य की स्वास्थ्य सेवा बेहतर करने की कोशिश हो रही है।पर गांवों में जिस तरह लोग अब भी झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं और जिस तरह अंधविश्वास की जकड़न में है उससे नहीं लगता कि मिशन का फायदा हुआ है।विज्ञान के युग में और आजादी के 63 साल बाद भी स्थिति में बदलाव न होना शर्मनाक है।(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

लेखक का पता-
राजीव कुमार
एम-23 प्रागज्योति हाउसिंग कांपलेक्स सोसाइटी,
एस बी रोड,खानका मस्जिद के पास,
घोरामोरा,गुवाहाटी-28
मोबाइल-9435049660