Friday, December 12, 2008

चुनाव:मिजोरम से है सीखने की जरुरत

मिजोरम देश का एक छोटा राज्य है।लेकिन विधानसभा चुनाव यहां जिस शांति और कम खर्च में होते हैं, उससे देश के अन्य राज्य को शिक्षा लेने की जरुरत है।न बाहुबली नेता और न पैसा का खेल।लोग सही अर्थों में अपने मताधिकार का निडर होकर प्रयोग करते हैं और इससे जो निकलकर आता है वह राज्य की बेहतरी के लिए होता है।यही वजह है कि मतदान का प्रतिशत अस्सी से अधिक रहा और यहां त्रिशंकु सरकार नहीं बनी।पिछले दस सालों से मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट(एमएनएफ) की सरकार थी।लोगों ने इसे कार्य करने का पर्याप्त मौका दिया।लेकिन यह लोगों की नजर में खरी नहीं उतरी तो इस बार इसका लगभग सफाया कर दिया गया।चालीस में से सिर्फ तीन सीटें ही इसे नसीब हुई।खुद पूर्व मुख्यमंत्री जोरामाथांगा दो सीटों से चुनाव लडक़र हार गए।इससे लोगों के गुस्से का आंकलन किया जा सकता है।मिजोरम में कांग्रेस ने दो तिहाई बहुमत पाया है।यह उसकी भी जीत नहीं है।कारण सामाजिक संगठन मिजोरम पीपुल्स फोरम(एमपीएफ)ने राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए जो दिशा-निर्देश जारी कि ए उससे लोगों को उम्मीदवारों का चयन करने में सहूलियत हुई।यह उसकी जीत है।कांग्रेस ने लोगों के आशा के अनुरुप कार्य नहीं किया तो लोग आगे उसका हाल भी एमएनएफ की तरह करेंगे।मिजोरम में गिरजाघरों को सबसे अधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।इसके कारण ही एमपीएफ यह मैजिक करने में कामयाब हुआ।एमपीएफ गिरजाघरों और प्रभावशाली एनजीओं का सामूहिक संगठन है।एमपीएफ की महासचिव लालबियाकमाविया नेंगटे ने कहा कि हमारे काम का अंत नहीं हुआ है।पहली बार हम पूरी तरह से वाचडाग की भूमिका में थे,इसमें कुछ त्रुुटियां हुई हंै।हम मिल-बैठकर इन्हें दूर करेंगे ताकि आनेवाले चुनाव में और अच्छा काम कर सकें।एमपीएफ के दिशा-निर्देशों का ही नतीजा है कि मिजोरम के चुनाव में रुपयों और बाहुबल का खेल नहीं हुआ। फिजूलखर्ची वाले भोज,म्यूजिकल बैंड और जनसभाओं के जरिए पिछले विधानसभा चुनाव तक उम्मीदवार वोट मांगा करते थे।लेकिन इस बार यह सब देखने को नहीं मिला।एमपीएफ के दिशा -निर्देशों ने सुनिश्चत किया कि इस चुनाव में मतदाता कोई झांसे में आकर अपने मतदान का गलत इस्तेमाल न कर दे। एमपीएफ के अध्यक्ष रेवेरेंड वनलालोवा ने कहा कि फोरम का उद्देश्य था कि चुनाव राज्य के शांतिपूर्ण माहौल को खराब न करे और मतदान साफ-सुथरे ढंग से संपन्न हो।आगे गिरजाघर और यंग मिजो एसोसिएशन(वाईएमए)उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग से दिशा-निर्देश जारी करते थे।इसके चलते कुछ चूक रह जाती थी।पर इस बार पूरा दृश्य भिन्न था।इस बार इन्हें सम्मिलित किया गया है।राजनीतिक पार्टियों के साथ बातचीत कर गिरजाघर और गैर सरकारी संगठनों ने इस बार दिशा-निर्देशों को अंतिम रुप दिया।उम्मीदवारों को मतदाता तक पहुंचने देने के लिए एमपीएफ ने हर विधानसभा क्षेत्र के हर वार्ड में एक मंच उपलब्ध कराया ।प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में पांच से छह वार्ड है और हरेक में दो से तीन हजार तक मतदाता होते हैं।इस मंच पर निर्धारित समय पर उम्मीदवार को अपनी बात कहने का मौका दिया गया ।साथ ही वह अपने और अपनी पार्टी पर लगे आरोपों का जवाब भी दे सकता था।मतदाता को भी उम्मीदवार से सवाल पूछने का समय दिया गया।पिछले चुनावों में इस तरह के मंच कुछ ही विधानसभा क्षेत्र में बनाए गए थे।लेकिन इस बार चीजों को और अधिक संगठित रुप में किया गया।एमपीएफ ही ने ही यह फैसला किया कि कौन-सी पार्टी कितनी रैलियां आयोजित करेगी और रैलियां होगी कहां।कांग्रेस ने प्रधानमंत्री की तीन रैलियां आयोजित करने की बात कही थी,लेकिन उन्हें सिर्फ लूंगलेई और आइजल में रैली करने की अनुमति मिली।मिजोरम में पार्टी के चुनाव प्रचार का कार्य देख रहे कांग्रेस नेता वेद प्रकाश का कहना था कि मिजोरम के चुनाव प्रचार का तरीका देश के अन्य राज्यों में भी अपनाया जाना चाहिए।चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक देवाषीश सेन ने कहा कि देश के अन्य राज्यों में इसका अनुकरण किया जाना चाहिए ताकि अत्याधिक खर्च और गलत तरीकों को रोका जा सके। (लेखक गुवाहाटी स्थित पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)

Friday, November 7, 2008

पहाड़ों की रानी है दार्जीलिंग की टॉय ट्रेन

राजीव कुमार
दार्जीलिंग और जलपाईगुड़ी के बीच चलनेवाली टॉय ट्रेन पहाड़ों की रानी है।कारण जब यह सीटी बजाती हुई आगे बढती है तो सडक़ पर चल रहा वाहनों का काफिला थम जाता है।लोग अपने कानों में हाथ की अंगुलियां डालकर उसे जाते हुए निहराते रहते हैं।दार्जीलिंग से न्यूजलपाईगुड़ी तक का ८७।४८ किमी का सफर यह आठ घंटे में तय करती है।इस दौरान यह १७७ बार बीच सडक़ से गुजरती है।यह सारी मानवरहित क्रासिंगें हैं।पर कहीं कोई दिक्कत नहीं आती।जैसे ही टॉय ट्रेन की सीट सुनाई पड़ती है ,वाहन खुद ब खुद थम जाते हैं।यह इस रास्ते में एक नियम-सा बन गया है।सभी जैसे उसे सलाम कर रहे हों।बच्चे-बड़े हाथ हिलाकर बॉय-बॉय करते हैं।मैंने अक्तूबर की पूजा छुट्टियों में दार्जीलिंग से न्यूजलपाईगुड़ी तक इस ट्रेन में सफर का लुत्फ उठाया।दार्जीलिंग और घूम स्टेशनों के बीच बतासिया लूप आता है।पहाड़ की ऊंचाई पर चढऩे के लिए टॉय ट्रेन एक घुमावदार चक्कर बतासिया लूप पर लगाकर घूम की ओर रवाना हो जाती है।बतासिया लूप के बीचोंबीच वार मेमोरियल बना हुआ है।इसे एक पार्क की शक्ल प्रदान की गई है।जैसे ही टॉय ट्रेन लूप का सफर शुरु करती है,पहले से मौजूद पर्यटक उसकी एक तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहते हैं।सुबह यह जगह स्थानीय लोगों को रोजी-रोटी का जुगाड़ कराती है।टाइगर हिल्स से पर्यटकों को लाकर वाहन यहां उतारते हैं।पांच रुपये की टिकट काटकर जब आप वहां पहुंचते हैं तो वहां खचाखच भीड़ रहती है।गोर्खा वेशभूषा में फोटो खिंचवाने और टेलीस्कोप से कंचनजंघा को निहाराने के अलावा वहां पूरा एक बाजार लगा रहता है।पर टॉय ट्रेन के आने के पहले सबकुछ साफ हो जाता है।इसके बाद घूम स्टेशन है,जो ïवश्व में सबसे शिखर पर रहनेवाला रेलवे स्टेशन है।इसकी ऊंचाई समुद्र तल से ७४०७ फिट है।यहां दार्जीलिंग हिमालयन रेलवे के अब तक के सफर को दर्शाता रेलवे संग्रहालय है।इस आठ घंटे के सफर में पहाड़ों की हरियाली का लुत्फ उठाते हुए और बादलों से खेलते हुए कब सफर खत्म होता है, पता ही नहीं चलता।पूरी यात्रा एक रोमांचक अनुभव है।अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक मार्क टवेन ने इस सफर को तय कर टिप्पणी की थी-यह इतनी मजेदार और रोमांचक यात्रा है कि इसे तो पूरे होने में एक सप्ताह लगना चाहिए। टॉय ट्रेन जब सडक़ के किनारे-किनारे आगे बढ़ती है तो जरुरतमंद स्थानीय लोग दौडक़र इसमें सवार हो जाते हैं और जैसे ही अपना गंतव्य आता है,उतर जाते हैं।धुआं उड़ाती,हुक-हुक करती ट्रेन एक दिन उधर से न गुजरे तो पहाड़ी लोगों का जीवन अधूरा-अधूरा लगता है।यह पहाड़ी लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुकी है।पहले इसे भाप इंजन खींचता था।अब इसका स्थान डीजल इंजन ने ले लिया है।लेकिन पर्यटकों को पुराने दिनों की याद दिलाने घूम और दार्जीलिंग के बीच भाप इंजन की गाड़ी अब भी चलाई जाती है।पर दार्जीलिंग- न्यूजलापाईगुड़ी के बीच चलाई जानेवाली मुख्य ट्रेन को अब डीजल इंजन से चलाया जाता है।लेकिन इसमें भी इस बात का ध्यान रखा गया है कि सीटी की आवाज भाप इंजन की तरह ही रहे।इसके अनोखेपन के कारण यूनेस्को ने दिसबंर १९९९ में इसे विश्व धरोहर का खिताब दिया।यह विश्व की दूसरी रेललाइन थी जिसे यूनेस्को ने यह खिताब दिया।आस्ट्रिया की सिमरिंग माउन्टेन रेलवे पहली विश्व धरोहर रेल लाइन है।

एक समय था जब दार्जीलिंग का सफर सिलीगुड़ी के हिलकार्ट रोड से बैलगाड़ी में बैठ कर तय करना पड़ता था।ईस्टर्न बंगाल रेलवे के एक एजेंट फ्रेंकलीन प्रेस्टेज ने १८७८ में सिलीगुड़ी और दार्जीलिंग के बीच रेल संपर्क की बात सोची।उन्होनें पाया कि यह काफी संभावनापूर्ण है।बैलगाड़ी से जो खर्च बैठता है,वह रेल से आधा रह जाएगा।फ्रेंकलीन ने इस पर पूरी रिपोर्ट बंगाल सरकार को सौंपी।जैसे ही इसे स्वीकृति मिली,उन्होंने दार्जीलिंग स्टीम ट्रामवे का गठन किया।उन्होंने दो फीट आमान का फैसला कर १८७९ में निर्माण का कार्य शुरु किया।सिलीगुड़ी से तीनधरिया की ३० किमी लाइन मार्च १८८० में खोली गई।शुरुआत तत्कालीन वायसराय लार्ड लिट्टन के लिए एक विशेष गाड़ी चलाकर की गई।इस लाइन का विस्तार अगस्त १८८० में कर्सियांग ,अप्रेल १८८१ में घूम तक कर जुलाई १८८१ में यह दार्जीलिंग तक पहुंची।मुख्य मार्ग की शुरुआती लागत १७.५ लाख थी जो बाद में बढक़र १९२० में ४३ लाख तक पहुंची।(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Friday, October 3, 2008

विकास से ही खत्म होगा पूर्वोत्तर का आंतकवाद

राजीव कुमार
पूर्वोत्तर में आंतकवाद एक कुटीर उद्योग बन चुका है।पूर्वोत्तर के राज्यों में अनेक आंतकवादी संगठन सक्रिय हैं।इन्होंने आंतकवाद को एक रोजगार बना लिया है।इसके कारण पूर्वोत्तर राज्य बाहर बदनाम है।कोई भी इन इलाकों में निवेश को आना नहीं चाहता।इलाके में निजी निवेश नहीं होगा तो स्थितियां नहीं बदलेगी।कारण सरकार सभी बेरोजगारों को सरकारी नौकरियां नहीं दे सकती।बाहरी निवेश होगा तो बेरोजगार युवकों को रोजगार के अवसर पैदा होंगे।इससे ही स्थिति में बदलाव हो सकता है।
पूर्वोत्तर में बेरोजगारी एक भयंकर समस्या है।यह खत्म होने पर ही इलाके में आंतकवाद का नामोनिशान मिटेगा।कारण खाली दिमाग शैतान का घर होता है।बेरोजगारों के दिमाग में जब तक यह शैतान घर करता रहा तब तक स्थिति में सुधार की आशा करना बेकार है।बेरोजगारों को रोजगार मिल गया तो इनका दिमाग खाली नहीं रहेगा और न शैतान घर करेगा।केंद्र सरकार ने अब इस बात को शिद्दत के साथ महसूस किया है।इसलिए पूर्वोत्तर में निवेश को बढ़ावा देने के लिए कोशिशें जारी हैं।
जब देश आजाद नहीं हुआ था तो पूर्वोत्तर की स्थिति देश के अन्य हिस्सों से बहुत अच्छी थी।सकल घरेलू उत्पाद दर सबसे ज्यादा थी।लेकिन अब देश के अन्य राज्यों से यह बहुत पिछड़ा हुआ है।आजादी के बाद देश के अन्य राज्यों का जिस तरह विकास हुआ उस तरह पूर्वोत्तर का नहीं हुआ है।दिल्ली से दूर होने के कारण यह वहां बैठे लोगों के दिलों से भी दूर हो गया।इसलिए यहां लोगों के मन में संकीर्णता पैदा हुई।
मणिपुर की भरोत्तोलक मोनिका देवी को साजिश के तहत बीजिंग ओलंपिक में जाने से रोकने का मामला हो, या असम की बाढ़ की समस्या की अनदेखी कर केंद्र द्वारा बाढ़ प्रभावित बिहार को एक हजार करोड़ रुपए का पैकेज देने की बात हो,इन सबसे पूर्वोत्तर के राज्यों के लोगों में असंतोष बढ़ा ही है।यह लोग अपने को अलग-थलग महसूस करने लगे हैं।यदि बेरोजगारी की समस्या को खत्म कर इस तरह के कार्यों से बचा जाए तो पूर्वोत्तर देश के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक होगा।
पूर्वोत्तर में प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं है।यहां साक्षरता दर देश के अन्य राज्यों से अधिक है।इन दोनों के बाद भी इलाका पिछड़ा हुआ है।देश के कुल भौगोलिक इलाके का आठ प्रतिशत ही पूर्वोत्तर है और जनसंख्या में इसका योगदान सिर्फ चार प्रतिशत का है।देश के सकल घरेलू उत्पाद में पूर्वोत्तर का योगदान तीन प्रतिशत का है।प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के दो-तिहाई ही है, जो कि देश में सबसे कम है।इलाके के 35 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं जबकि राष्ट्रीय औसत 26 प्रतिशत है।पूर्वोत्तर के सत्तर प्रतिशत लोग अपना गुजर-बसर कृषि से करते हैं।इससे साफ हो जाता है कि मैनुफैक्चिरिंग और सर्विस सेक्टर में रोजगार के अवसर न के बराबर है।जहां राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी की औसत दर 7.7 प्रतिशत है वहीं पूर्वोत्तर में यह 12 प्रतिशत है।इलाके का शहरीकरण बेहद धीमी गति से हो रहा है।जहां राष्ट्रीय स्तर पर औसत शहरीकरण की दर 28 प्रतिशत है वहीं इलाके की शहरीकरण की दर 15 प्रतिशत है।
परंतु अब केंद्र स्थिति बदलने को आतुर दिखता है।पूर्वोत्तर विकास विभाग के मंत्री मणिशंकर अय्यर और केंद्रीय बिजली राज्य मंत्री जयराम रमेश पूर्वोत्तर की पूरी स्थिति बदलने के लिए जी-जीन से जुटे हैं।सितबंर के मध्य में गुवाहाटी में हुए चौथे पूर्वोत्तर व्यापार सम्मेलन के बाद लगा कि स्थिति बदलनेवाली है।कारण बाहरी लोगों के मन में पूर्वोत्तर के प्रति धारणा बदल रही है।सम्मेलन में देश-विदेश के 1179 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।इनमें विदेश के 97 प्रतिनिधि शामिल थे।कंबोडिया के वाणिज्य मंत्री के अलावा 12देशों के राजदूत सम्मेल में शिरकत करने पहुंचे।इलाके में विभन्न क्षेत्रों में निवेश के लिए 247 प्रस्ताव आए।इनमें से 88प्रस्ताव असम में निवेश के लिए थे।असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का कहना था कि अब पूर्वोत्तर की छवि बाहर बदल रही है।पिछले दो सालों में राज्य में तैंतीस हजार करोड़ के निवेश प्रस्ताव आए हैं।
इन सब से लगता है कि पूर्वोत्तर के दिन अच्छे आनेवाले हैं।नब्बे के दशक में माहौल ऐसा था कि असम से लोग अपनी जमीन-जायदाद बेचकर चले जाने में बेहतरी समझते थे।लेकिन आज यहां जमीन के इतने भाव हो गए हैं कि खरीदना मुश्किल हो गया है।गुवाहाटी और अन्य शहरों में पैसों के बाद भी जमीन खरीदना मुश्किल हुआ है।पहले शाम के बाद सन्नाटा पसरता था तो अब रात में चहल-पहल बढ़ जाती है।लुक-ईस्ट पालिसी के तहत दक्षिण-एशियाई देशों के साथ पूर्वोत्तर का द्वार खुला तो इलाके में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा।
देश के अन्य हिस्से की बात तो कहना मुश्किल है पर पूर्वोत्तर में विकास के जरिए आंतकवाद का पूरी तरह खात्मा किया जा सकता है।कारण यहां के युवा मेहनती होने के साथ-साथ अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ रखते हैं।इंफोसिस के एन नारायणमूर्ति ने असम का दौरा करते हुए यहां के युवक-युवतियों की इस तरह प्रशंसा करते हुए कहा था कि इलाके के युवक-युवतियां अपने कार्य को ईमानदारी और लगनशीलता के साथ करते हैं और कार्यरत संस्थान के प्रति अपनी निष्ठा को लंबे समय तक बरकरीर रखते हैं।इसलिए इनका सही उपयोग हुआ तो इलाका तरक्की करेगा इसमें कोई संदेह नहीं है।
(लेखक गुवाहाटी स्थिति पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)

Friday, August 8, 2008

जीव-जंतुओं पर तो रहम करो शर्मसार करनेवाले राजनेताओं

राजीव कुमार
देश की राजनीति में इस तरह के लोगों की भरमार है, जो राजनेता शब्द को गंदी गाली का दर्जा दिलाने पर आमादा हैं।यदि राजनीति में इस तरह के लोगों की भरमार रही तो आनेवाले दिनों में अच्छे इक्का-दुक्का लोग भी राजनीति में आना बंद कर देंगे।यह देश के लिए सबसे बड़ा नुकसान होगा।
केंद्र की संयुक्त प्रगितशील गठबंधन(संप्रग)सरकार ने जोड़-तोड़ के जरिए संसद में विश्वास-मत हासिल कर लिया।कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने जश्न मनाया।इस पर एतराज करने का कुछ नहीं था।कारण देश की राजनीति में अब इस तरह की घटनाएं आम बात हो गई है।लेकिन मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के लांझी विधानसभा सीट के विधायक किशोर समरिते ने जो जश्न इस खुशी में मनाया उस पर आपत्ति स्वाभाविक है।उन्होंने इस खुशी में एक-
दो नहीं कुल 317 जानवरों की बलि चढाई।इसमें 302 बकरियां और 15 भैंस शामिल हैं।समरिते समाजवादी पार्टी के हैं।समरिते के पुजारी रंजीत शर्मा का कहना है कि विधायक ने दशमहाविद्या पूजा की है।यह पूजा 26 से 30 जुलाई तक की गई।
समरिते को इसका जरा भी खेद नहीं है।वे कहते हैं कि समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर गुवाहाटी के नीलाचल पहाड़ पर स्थित मां कामाख्या में यह बलि चढ़ाने आए।संप्रग सरकार को बहुमत मिलने की कामना पूरी होने के कारण यह बलि चढ़ाई गई है।साथ ही यह भी कामना है कि अगले लोकसभा चुनाव के बाद मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री बने।
समरिते की इस बलि को लेकर असम में भारी विरोध हुआ।पीपुल्स फोर एनिमल्स की पूर्वोत्तर शाखा की अध्यक्ष संगीता गोस्वामी ने कहा कि एक जनप्रतिनिधि आधुनिक समाज में पुराने क्रूर रीति रिवाजों को मानकर असहाय पशुओं का खून बहाए यह शोभा नहीं देता।संगठन ने प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह और संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र भेजकर इस तरह के पागलपन पर रोक लगाने की मांग की है।पर सत्ता के भूखे राजनेता अपनी सरकार बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं तो इस कार्य को रोकने के लिए कुछ कदम उठाएंगे यह सोचना भी बेकार है।
कामाख्या में समरिते पहले भी बलि चढ़ाते आए हैं।लेकिन इतनी विशाल संख्या में कभी नहीं चढाई गई।समरिते का रिकार्ड भी अच्छा नहीं है।मध्यप्रदेश में समरिते पर हत्या, लूट, अपहरण, धमकाने और सरकारी अधिकारियों के साथ बदसलूकी के लगभग
40 मामले दर्ज हैं।समरिते 19 मार्च 2008 को सुर्खियों में थे जब उन्होंने मध्यप्रदेश में कांग्रेस समर्थित राज्यसभा उम्मीदवार विवेक तांखा को वोट देने के एवज में कांग्रेस द्वारा दस लाख रुपए देने का आरोप लगाया था।अपनी बात के समर्थन में उन्होंने एक गेस्ट हाउस में हजार-हजार रुपयों के बंडलों को प्रदर्शित किया था।विधायक बनने के बाद समरिते ने अपने गृह जिले में एक विशाल भोज आयोजित किया।इसमें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश भी मौजूद थे।इसमें भी समरिते ने 108 बकरियों की बलि चढ़ाई।
कामाख्या मंदिर में बलि की प्रथा है।पर इतनी बड़ी संख्या में बलि देते आज तक नहीं देखा गया।इस लेखक ने खुद देखा है कि जब समरिते विधायक नहीं थे तब भैसों की बलि चढ़ाने कामाख्या आते थे और यह बलि मुलायम को प्रधानमंत्री बनाने के लिए होती थी।मीडियावालों को वे प्रचार के लिए बुलाते।संगठन बलि का विरोध भी करते।लेकिन इन सब के बीच समरिते का मुख्य ध्यान प्रचार पाने के लिए रहता ताकि मुलायम तक यह बात पहुंचा सके कि उनके लिए वे क्या कर रहे हैं।शायद इस कार्य में वे सफल भी हुए हैं।खुद सपा के विधायक बनने के साथ ही संप्रग के बहुमत पाने पर वे लाखों का खर्च कर इतने पशुओं की बलि जो दे पाएं हैं।समाजवादी पार्टी का इस पर मौन समर्थन है।समर्थन नहीं होता तो विरोध करती।
राजनेता बलि की इस कुप्रथा के खिलाफ होने के बजाए असहाय जीव-जंतुओं की सत्ता में रहने के लिए इस तरह बलि चढ़ाएंगे तो आम जनता को कौन समझाएगा।देश में करोड़ों लोगों को एक समय के लिए दो जून की रोटी नसीब नहीं होती है।पर समरिते जैसे नेता ने बहुमत मिलने का जश्न मनाने के लिए 317 जंतुओं की हत्या कर उनके खून की होली खेली और लाखों स्वाहा किए।इससे मां कामाख्या कितनी खुश हुई यह तो कोई नहीं जानता।इस रकम से समरिते गरीबों को एक वक्त का खाना खिलाते तो निश्चय ही गरीब उन्हें बहुत दुआ देते।इसे देखा और अनुभव किया जा सकता था।

बहुत हो गया। अब समय आ गया है कि राजनीति से इस तरह के लोग दूर हों।अन्यथा देश का भला नहीं होगा।राजनीति में अब अच्छे लोगों के आने का वक्त आ गया है।यह सामने आएंगे तो जनता इन्हें वोट देकर सत्ता में पहुंचाएगी।सत्ता में इनकी अधिकता होगी तो समरिते जैसे लोग अपने आप किनारा होने या अपने को बदलने को बाध्य हो जाएंगे।देश की बेहतरी के लिए यह होना अब अति आवश्यक हो गया है।नहीं तो हमें डूबने से कोई नहीं बचा सकता।
(लेखक गुवाहाटी स्थित पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)

Wednesday, July 30, 2008

मणिपुर में बच्चों को आंतकी बनाने की घिनौनी कोशिश

राजीव कुमार
देश में मणिपुर ही ऐसा राज्य है जहां सबसे ज्यादा आंतकी संगठन है।यह चिंता का विषय है।लेकिन अब इससे भी ज्यादा चिंता की बात है कि आंतकी स्कूली बच्चों का अपहरण कर अपने संगठन में भर्ती कर रहे हैं।आंतक के चलते बच्चों का बचपन मणिपुर में पहले से ही छिनता जा रहा था।बच्चों ने अपने हथियार खिलौनों को जलाकर अच्छी शुरुआत की थी।पर अब आंतकियों ने अपने संगठन में भर्ती के लिए इनका अपहरण कर खतरे की घंटी बजा दी है।देश में यह शायद पहला प्रयोग ही माना जाए।
एक मई से अब तक २० बच्चे लापता हुए हैं।आठ स्कूलों के शिक्षक व छात्रों ने अपहरण के खिलाफ राष्ट्रीय राजमार्ग ३९ जाम किया।पर सरकार ने इसे अब तक गंभीरता से नहीं लिया है।सिर्फ पुलिस ने स्पेशल टास्क फोर्स के गठन का ऐलान किया है।मणिपुर के पुलिस महानिदेशक वाई जयकुमार सिंह ने कहा कि पीपुल्स रिवल्यूशनरी पार्टी आफ कांगलेईपाक(प्रीपाक-वीसी) और प्रीपाक(जीएस)अपने संगठनों में बच्चों की भर्ती कर रहे हैं।कारण इन्हें भर्ती के लिए युवा नहीं मिल रहे हैं।लेकिन प्रीपाक-वीसी के प्रवक्ता ने इन आरोपों का खंडन किया है।
लेकिन आंतकियों के चंगुल से भागकर आए छात्र हुसैन अहमद का कहना है कि मैं जब अपने स्कूल के प्रिंसिपल के घर जा रहा था तब चार लोगों ने मुझे कार में धकेला और अज्ञात स्थान पर ले गए।वहां मुझे बताया गया कि मुझे संगठन में भर्ती किया जाएगा।पर इन्होंने मुझे अपने संगठन का नाम नहीं बताया।सिर्फ लडक़े ही नहीं लड़कियों का भी अपहरण किया जा रहा है।इंफाल पश्चिम की महिला मोहिला देवी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि उसकी १६ साल की बेटी निंगोबाम शारदा १३ जुलाई से लापता है।वह कक्षा नौ की छात्रा है।

बच्चों के अपहरण की घटनाओं से अभिभावकों ने इन्हें स्कूल भेजना बंद कर दिया है।सभी अभिभावक चिंतित है कि अगला अपहृत बच्चा उनका भी हो सकता है।इस मसले पर विचार के लिए एक बैठक हुई जिसमें बच्चों ने खुद कहा कि हमें आंतकी मत बनाओ।अनेक बच्चे इनके चंगुल से भागकर भी आए हैं।कक्षा तीन के छात्र ओइनाम अमरजीत का कहना है कि मैं स्कूल नहीं जाना चाहता हूं।मैंने सुना है कि काफी बच्चों का अपहरण कर लिया गया है।मैं किसी आंतकी संगठन में भर्ती नहीं होना चाहता हूं।अमरजीत का सहपाठी पुइम बिरजीत सिंह भी कुछ इस तरह का विचार व्यक्त करता है।
राज्य में कांग्रेस नेतृत्ववाली सेक्यूलर प्रोगेसिव फ्रंट की सरकार है।मुख्यमंत्री पद पर कांग्रेस के ओ इबोबी सिंह काबिज हैं।केंद्र में भी कांग्रेस नेतृत्ववाली सरकार है।फिर भी स्थिति बेहतर करने की कोशिश नहीं हो रही है।राज्य में लगभग चालीस आंतकी संगठन सक्रिय हैं।लेकिन गृह मंत्रालय के अनुसार मुख्य आंतकी संगठनों में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी,यूनाईटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट,पीपुल्स रिवल्यूशनरी पार्टी आफ कांगलेईपाक,कांगलेईपाक कम्युनिष्ट पार्टी,कांगलेई याओल कानबा लूप,मणिपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट और रिवल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट शामिल हैं।प्रीपाक के अनेक आंतकी राज्य के बाहर पिछले दिनों गिरफतार हुए हैं।इन सब की भरपाई के लिए संगठन अब बच्चों की भर्ती में लग गया है।
पूर्वोत्तर में बच्चों की आंतकी संगठनों में भर्ती पहली बार दिख रही है। पर असम में प्रतिबंधित आंतकवादी संगठन उल्फा दवारा तोडफ़ोड़ की गतिविधियों में बच्चों का इस्तेमाल किए जाने की बात पुलिस कहती रही है।इसके एवज में इन्हें चंद पैसे दे दिए जाते हैं।आंतकवादियों के लिए अब यह आसान तरीका हो गया है।कारण सुरक्षा बल भी बच्चों पर ज्यादा संदेह नहीं करते हैं।पर बच्चों के भविष्य के लिए यह बहुत बड़ा खतरा है।चंद पैसों के लालच में वे यह काम अंजाम दे दें लेकिन आनेवाले समय में इसका बहुत बुरा असर पड़ेगा।मणिपुर के शिक्षक पी शरत का कहना है कि आंतकी बच्चों को डरा-धमकाकर अपने संगठन में भर्ती कर रहे हैं।यह बच्चे जब बड़े होंगे तो कदापि सामान्य जीवन जी नहीं पाएंगे।

देश का भविष्य बच्चे हैं।इस तरह इनके बचपन को कुचला गया तो आनेवाला समय हमें माफ नहीं करेगा।सरकार को चाहिए कि जो आंतकी इस तरह के कार्य कर रहे हैं उन्हें सखती के साथ कुचला जाए।ज्यादा देर की गई तो समय हाथ से निकल जाएगा।समय रहते कड़ाई की आवश्यकता है।
(लेखक गुवाहाटी स्थित पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)

Tuesday, June 24, 2008

असम:सात साल बाद आंतकियों के खिलाफ जागी सरकार

राजीव कुमार
असम की कांग्रेस-बीपीएफ गठबंधन सरकार अचानक प्रतिबंधित संगठन उल्फा के खिलाफ आक्रामक हो गई है।सिर्फ उल्फा ही नहीं,अन्य वार्ता में आने को इच्छुक आंतकी संगठनों के खिलाफ भी कठोर हुई है।लेकिन राज्य में पिछले सात सालों से सत्ता पर काबिज रहनेवाली मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के नेतृत्ववाली सरकार को पहले इतना कठोर होते हुए कभी नहीं देखा गया था।
अब तक उसे उल्फा के इशारों पर ही चलते देखा गया था।पर अब वह उल्फा के लिए सतही स्तर पर कार्य करनेवाले लोगों के खिलाफ शिकंजा कस रही है।केंद्र के साथ वार्ता के लिए उल्फा द्वारा गठित नागिरक समिति पीपुल्स कंसलटेटिव ग्रुप(पीसीजी)के सदस्य लाचित बरदलै को चार महीने पहले गिरफ्तार किया जा चुका है।उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया गया है।अब पीसीजी के दूसरे सदस्य हिरण्य सैकिया को गिरफ्तार किया गया है।अब तक राज्य सरकार और उल्फा के बीच सैकिया एक महत्वपूर्ण कड़ी के रुप में कार्य करते आए थे।
जब उल्फा ने 33वें राष्ट्रीय खेलों के बहिष्कार का एलान किया तो सैकिया ने ही मध्यस्थ कर मामला सुलझाया और खेल शांतिपूर्ण तरीके से आयोजित हुए।बाद में भारत-पाक एक दिवसीय मैच में भी दिक्कत न होने के लिए उल्फा से अखबारों में विज्ञापन देकर अपील की गई।यह भी सैकिया के सुझाव पर किया गया।खुद सैकिया ने बाद में इन सब का खुलासा किया है।सैकिया ने सरकार और उल्फा के बीच की वार्ता में भी अहम किरदार होने की बात कही है।संगठन के सेना प्रमुख परेश बरुवा के साथ होनेवाली बातों को मुख्यमंत्री तरुण गोगोई,स्वास्थ्य मंत्री डा.हिमंत विश्वशर्मा और पुलिस के आला अधिकारी तक पहुंचाने की बात का खुलासा सैकिया पहले कर चुका है।सैकिया के इस तरह के बयानों के बाद विपक्ष ने सरकार को घेरा।पर तब सरकार चुप रही।अब इसके काफी समय बाद सरकार ने सैकिया को गिरफ्तार किया है।
सवाल उठता है कि सरकार अब तक सौहार्दपूर्ण संबंध सैकिया से रखकर क्यों सोई हुई थी?विपक्ष के हमले से गिरती साख और केंद्र के दबाव के चलते गोगोई को यह कदम उठाना पड़ा है,यह कहें तो भी गलत नहीं होगा।एक संवाददाता सम्मेलन में गोगोई ने घोषणा की कि अब किसी आंतकी संगठन से तभी संघर्षविराम कर बातचीत की जाएगी जब वह हथियार डाल देगा,उसके सदस्य वार्ता पूरी होने तक निर्धारित शिविरों में रहेंगे और संविधान के दायरे में ही बातचीत की इच्छा जताएंगे।साथ ही बातचीत संगठन के शीर्ष नेताओं से सीधे होगी।जो संगठन इन बातों को नहीं स्वीकारेंगे उनसे न तो संघर्षविराम होगा और न भी अभियान में कोई ढील दी जाएगी।राज्य में आंतकवादी विरोधी अभियान संयुक्त कमान की कार्रवाई के तहत चल रहा है।इसके चेयरमैन खुद मुख्यमंत्री तरुण गोगोई हैं।गोगोई ने स्वंय कहा है कि पिछली संयुक्त कमान की बैठक में यह निर्णय लिया गया है।उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि यह निर्णय केंद्र के कहने पर लिया गया है।
अब तक केंद्र की कांग्रेस नेतृत्ववाली संयुक्त प्रगतिशील सरकार राज्य की कांग्रेस-बीपीएफ सरकार के कामकाज पर धृतराष्ट्र की भूमिका में थी।पर अब राज्य के कांग्रेस मंत्रियों पर लग रहे आरोपों के बाद उसने इधर अपनी नजर दी है।इसके बाद गोगोई नेतृत्ववाली सरकार कठोर हुई है।आंतकवादी संगठन डिमा हालम दाउगा के जूवेल गुट ने उत्तर कछार जिले में कहर बरपाकर दो राष्ट्रीय परियोजनाओं का कार्य बुरी तरह प्रभावित किया।अचानक संगठन ने संघर्षविराम की इच्छा जताई तो सरकार ने इसका सकारत्मक जवाब देने के बजाए अभियान तेज करने का फैसला किया।डिमापुर के एक होटल में इसके प्रचार सचिव को गिरफ्तार किया गया।इन सबसे एक बात साफ हो गयी कि राजनीतिक इच्छशक्ति हो तो आंतकवादियों से मुकाबला करना मुश्किल नहीं है।
पर गोगोई सरकार आंतकवादियों से मधुर संबंध बनाए रखने के लिए अब तक कोई कार्रवाई करने से बचती रही है।इसका फायदा इन्हें विभिन्न चुनाव में मिलता रहा है।लेकिन इन संबंधों के चलते विपक्ष ने कांग्रेस पर हमला तेज किया तो उसकी स्थिति खराब होने लगी।राज्य के पूर्व शिक्षामंत्री रिपुन बोरा एक हत्या के मामले में लग रहे आरोपों से बचने के लिए सीबीआई को घूस देते रंगे हाथों दिल्ली में गिरफ्तार हुए।इसके बाद राज्य के अन्य मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार,हत्या और आंतकवादियों से संबंध होने के आरोप लगने लगे हैं।विपक्षी पार्टियां राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डा.हिमंत विश्वशर्मा का संबंध उल्फा से होने का आरोप लगा रही है।इस आरोप पर डा.शर्मा को मंत्री पद से हटाए जाने की मांग उठ रही है।प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के समक्ष इसकी शिकायत की गई है।इन सबके चलते केंद्र ने राज्य सरकार को कठोर होने का निर्देश दिया है।केंद्र के निर्देश के बाद गोगोई के पास सख्त होने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं बचा था।इसलिए आंतकी संगठनों के खिलाफ सरकार कठोर हुई है।
सरकार के कठोर होने के कारण आंतकवादियों के आत्मसमर्पण की संख्या में इजाफा हुआ है।उल्फा की शक्तिशाली 28वीं बटालियन की ए व सी कंपनी ने एकतरफा संघर्षविराम का एलान कर बातचीत की इच्छा जताई है।तेजपुर स्थित चतुर्थ कोर के जीओसी ले.ज.बी एस जसवाल ने इस लेखक से बातचीत में कहा कि हमने वार्ता के लिए उपयुक्त माहौल बनाया है।कारण भारी संख्या में आंतकियों ने आत्मसमर्पण किया है।अब सरकार की बारी है कि वह कैसे वार्ता करती है।जसवाल का कहना था कि आंतकियों को सतह पर रहकर जो मदद कर रहे हैं उन्हें कमजोर कर दिया गया तो हमें अभियान में और ज्यादा सफलता मिलेगी।
सात साल बाद सरकार के कड़े रुख से जहां आंतकियों के हौसले पस्त होंगे वहीं लोगों में आशा की किरण जगी है।पर कांग्रेस नेतृत्ववाली सरकार कब तक इस तरह का कड़ा रुख रखती है यह भी देखनेवाली बात होगी।कारण सामने लोकसभा चुनाव है।उल्फा ने कांग्रेसियों को निशाना बनाना शुरु कर दिया तो अपनी हार की आशंका में वह अपने इस अभियान में ढीली भी पड़ सकती है।पर यह ढिलाई राज्य व देश के हित में नहीं होगी।
(लेखक गुवाहाटी स्थित पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)

Saturday, June 14, 2008

राजनीति में वंशवाद को बढ़ा रहे हैं संगमा

राजीव कुमार
दूसरों को उपदेश देना बहुत आसान है।लेकिन बात जब अपनी आती है तो व्यक्ति खुद इन सब को भूल देता है।इस तरह के ही शख्स हैं पूर्ण ए संगमा।संगमा ने लोकसभा का अध्यक्ष रहते हुए देशभर में अपनी एक छाप छोड़ी थी।कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के विदेशी मूल के कारण उन्हें प्रधानमंत्री बनाए जाने का विरोध करते हुए संगमा ने कांग्रेस तक छोड़ दी।तब लोगों के मन में उनके प्रति और आदर का भाव आया।लगा कि संगमा आदर्श और नीति की राजनीति करते हैं।लेकिन इस साल उनका असली चेहरा सबके सामने आ गया।अपने साथ ही परिवार के तीन अन्य लोगों को उन्होंने राजनीति में उतार दिया।इस तरह वंशवाद की राजनीति को ही संगमा ने आगे बढ़ाया।
मेघालय में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान संगमा ने सांसद रहते हुए विधायक पद के लिए चुनाव लड़ा।अपने दो बेटों कनराड और जेम्स को भी विधायक पद के लिए उतारा।दोनों बेटों के साथ ही संगमा चुनाव जीत गए।विधायक पद पर विजयी होने के बाद उन्होंने तुरा संसदीय सीट से इस्तीफा दे दिया।नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी(एनसीपी) के किसी को उतारने के बजाए उन्होंने इस रिक्त सीट पर अपनी बेटी अगाथा को उतारा।अगाथा भारी मतों से जीती।संगमा नौ बार इस सीट से सांसद चुने गए हैं।इसमें कोई शक नहीं कि इस सीट पर उनकी पकड़ है।पर उच्च शिक्षित अगाथा दिल्ली के एक फार्म में कानूनी सलाहकार की नौकरी कर रही थी।लेकिन पिता ने तुरा सीट को अपनी जागिर बनाए रखने के लिए उसे भी राजनीति में खींच लिया।
संगमा की पत्नी सरोजेनी इसके खिलाफ है।वह इसके विरोध में थी।संगमा के परिवार में अब दो सदस्य ही राजनीति में आने बाकी हैं।इनमें एक उनकी पत्नी और दूसरी बड़ी बेटी क्रिस्टी।राजनीति में वंशवाद बढाए जाने की बात पर संगमा को गुस्सा आता है।वे गुस्से में सफाई देते हैं कि मैंने वंशवाद के शासन को प्रोत्साहन नहीं दिया है।मेरे बेटे और बेटियां विदेश में पढे लिखे हैं।अब हमारी जिम्मेवारी बनती है कि हम राज्य की बेहतरी के लिए अपना योगदान दें।हमें राजनीति में पढ़े लिखे लोगों की जरुरत है।
राजनीति में पढ़े लिखे अच्छे लोगों को आना चाहिए इससे हम भी दो राय नहीं रखते।लेकिन मेघालय में और पढ़े-लिखे लोग नहीं थे, इस बात को भी तो नहीं स्वीकारा जा सकता।संगमा अन्य को मौका देते तो उनका कद और बड़ा होता।फिलहाल मेघालय में डोनकूपर राय के नेतृत्व में जो सरकार चल रही है उसमें संगमा ही छ्दम मुख्यमंत्री के तौर पर कार्य कर रहे हैं।वैसे वे मेघालय योजना बोर्ड के चैयरमैन हैं।अपने दोनों बेटों को भी उन्होंने सरकार में महत्वपूर्ण पद दिलवाए हैं।बड़े बेटे कनराड के पास वित्त,पर्यटन,बिजली और कई अन्य महत्वपूर्ण विभाग हैं जबकि जेम्स गृह विभाग का संसदीय सचिव है।कुल मिलाकर मेघालय की राजनीति पर अपनी पूरी पकड़ संगमा रखना चाहते हैं।विधानसभा चुनाव के पहले उन्होंने कहा भी था कि दूसरे हमें छोड़कर जा सकते हैं लेकिन परिवार के सदस्य तो कम से कम धोखा नहीं देंगे।

मेघालय में सरकारें अस्थिर रही है।इसी डर के चलते संगमा अपने परिवार के सदस्यों को राजनीति में खींच लाए।वे किसी भी तरह राज्य की राजनीति अपने हाथ से खिसकने नहीं देना चाहते हैं।तुरा लोकसभा सीट के उपचुनाव के दौरान विपक्षी पार्टियों ने इसे मु्द्दा बनाया।लेकिन उन्हें कोई सफलता हाथ नहीं लगी।वंशवाद के आरोप के बाद भारी मतों से जीतनेवाली अगाथा ने कहा कि जीत मैरिट के आधार पर हुई है।संगमा का इस पर कहना था कि मेरा प्रयास बच्चों को समान अवसर देने का है।जनता ने जो जनादेश दिया है उससे लगता है कि वे इन बात को तवज्जो नहीं देती है।यदि वंशवाद को मैं बढ़ाता तो मैं इन्हें आसानी से राज्यसभा में भेज सकता था।लेकिन मैंने इसके बजाए उन्हें सीधे चुनाव के जरिए जीतकर आने को कहा।चुनाव तो हर कोई व्यक्ति लड़ सकता है।
माना कि जनता ने संगमा और उनके परिवार के तीन सदस्यों को जनादेश दिया है,पर क्या नीति और आदर्शों की बात करनेवाले नेता से इस तरह की उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपने क्षुद्र हितों से ऊपर उठेंगे।संगमा को तो चाहिए था कि वे पार्टी के नए-नए युवक-युवतियों को प्रशिक्षित कर आगे लाते।तभी राजनीति के स्तर को ऊपर उठाया जा सकेगा।लेकिन संकीर्ण राजनीति में रहकर वंशवाद को बढ़ावा देनेवाले नेता से और क्या उम्मीद की जा सकती है।अब उन्होंने सोनिया के विदेशी मूल का होने का मुद्दा उठाने का नैतिक अधिकार खो दिया है।कारण उन्होंने राजनीति में वंशवाद को सबसे ज्यादा बढ़ाया है।जैन धर्मगुरु आचार्य तुलसी ने नारा दिया था-निज पर शासन,फिर अनुशासन।यही बात संगमा से कही जा सकती है।किसी पर कुछ लागू करने के पहले खुद उस पर चलने की आदत डाल लेनी चाहिए।तब कहीं जाकर दूसरों को नीति शिक्षा देनी चाहिए।
(लेखक गुवाहाटी स्थित वरिष्ठ पत्रकार व पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)