Saturday, April 26, 2008

मणिपुर में राष्ट्रपतिशासन क्यों नहीं ?

राजीव कुमार
देश में मणिपुर एक एसा राज्य है जहां चुनी गई सरकार का नहीं,आंतकियों का शासन है।आंतकी जो चाहे कर सकते हैं।मुख्यमंत्री ओकरम इबोबी सिंह की कांग्रेस सरकार इससे निपटने में अपने को लाचार पा रही है।स्थिति इतनी बेकाबू है कि यहां कभी का राष्ट्रपति शासन लग जाना चाहिए था।पर केंद्र की कांग्रेस नेतृत्ववाली सरकार अपनी ही पार्टी की राज्य सरकार को कैसे बर्खास्त कर दे।सो, इबोबी मणिपुर में बने हुए हैं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की खुफिया रिपोर्ट के अनुसार मणिपुर में देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा आंतकी संगठन हैं।इसके बाद असम और जम्मू कश्मीर का नबंर आता है।मणिपुर में 39,असम में 36 और जम्मू कश्मीर में 32 आंतकी संगठन सक्रिय हैं।राज्य में एक लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार है।फिर भी आंतकी संगठन सरकार के नाक तले अपहरण,रकम वसूली और हत्याओं को अंजाम दे रहे हैं।
मार्च में 15 हिंदीभाषी मजदूरों की हत्या कर दी गई।सरकारी अधिकारियों का अपहरण कर आंतकी मोटी रकम वसूल कर रहे हैं।सरकारी अधिकारी अपनी जान बचाने आंतकियों को रकम अदा कर रहे हैं।आंतकियों को वे यह रकम गुवाहाटी और कोलकाता में आकर अदा कर रहे हैं।स्थिति बेकाबू होते देख मुख्यसचिव जरनैल सिंह ने फरमान जारी किया कि बिना अनुमति के सरकारी अधिकारी राज्य के बाहर नहीं जा सकते।इस आदेश के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं हुआ।कारण अधिकारी सरकार पर भरोसा करने के बजाए आंतकियों पर भरोसा कर अपने को ज्यादा महफूज समझ रहे हैं।
राज्य के हालात नवबंर 2007 के बाद ज्यादा बदतर हुए।मुख्यमंत्री इबोबी के खिलाफ कांग्रेस विधायकों ने विद्रोह किया।मामला कांग्रेस हाईकमान के पास दिल्ली पहुंचा।कुछ समय तक अराजकता की स्थिति बनी रही।आखिरकार हाईकमान ने इबोबी के ही बने रहने पर मुहर लगा दी।इसके बाद से ही स्थिति ज्यादा खराब हुई।राजधानी इंफाल में छह बजे बाद कर्फ्यू जैसा माहौल बन जाता है।
सरकार को जो कार्य करने चाहिए वह आंतकी अंजाम दे रहे हैं।आंतकियों की अपनी अदालतें चलती है।आंतकी भ्रष्ट अधिकारियों को पकड़ कर ले जाते हैं।सजा के तौर हत्या या फिर पैर में गोलियां दाग देते हैं।मणिपुर में हिंदी फिल्मों को दिखाने पर पहले ही पाबंदी लगी हुई है।इसी साल जर्दे पर पाबंदी लगाई गई।लेकिन इसे लागू होता न देख मीठापती पान की बिक्री पर भी प्रतिबंध लगा दिया।आंतकियों का मानना है कि इनके सेवन से राज्य के लोग बीमार हो रहे हैं।आदेश का पालन न करनेवालों को सजा सुनाई गई।

आंतकी सिर्फ यहां तक ही सीमित नहीं है।रीजनल इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल सांइसेज के निदेशक को नर्सों की नियुक्ति को लेकर धमकाते हैं।निदेशक का तो यहां तक कहना है कि स्वास्थयकर्मियों से रकम वसूली जाती है।दवा विक्रेताओं से भी रकम मांगी गई तो इन्होंने दुकानें बंद कर दी।लोगों को भारी संकट का सामना करना पड़ा।बाद में सरकार ने सुरक्षा का भरोसा दिलाया तो दवा दुकानें खुली।ट्रांसपोर्टरों से भी आंतकियों ने रकम की मांग की।इसके चलते वे हड़ताल पर चले गए।ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि बीस आंतकी संगठन रकम की मांग करते हैं।रकम न देने पर वाहनों को जला देने की धमकी देते हैं।आटोरिक्शावालों से भी तीन सौ से एक हजार रुपए तक की मांग की जाती है।
तंग आकर ट्रांसपोर्टरों ने हड़ताल कर दी तो मणिपुर के मोरे और म्यांमार के नामफालंग में होनेवाला सीमा व्यापार प्रभावित हुआ।स्थिति की गंभीरता को देखते हुए म्यांमार स्थित भारत के राजदूत भास्कर कुमार मित्रा मणिपुर में समीक्षा के लिए आए।आंतकियों का हौसला इतना बढ़ा हुआ है कि वे विधानसभा पर हमला करने के अलावा विधायक पर भी हमला करते हैं।इन सब के बाद भी केंद्र की कांग्रेस नेतृत्ववाली संप्रग सरकार मूक दर्शक बनी हुई है।
मणिपुर में पहले महिलाओं की नृशंस हत्याएं नहीं होती थी।लेकिन मार्च में पांच महिलाओं को नृशंसता के साथ मार दिया गया।स्थिति भयावह देखते हुए थौबाल जिले के ग्रामीणों ने सरकार से हथियार देने की मांग की है ताकि आंतकियों से खुद की रक्षा कर सके।लोगों का सरकार पर भरोसा नहीं रह गया है।समस्या से निपटने में इबोबी सरकार जिस तरह आगे बढ़ रही है उससे भी सुरक्षा बल संतुष्ट नहीं है।राजनेता और आंतकियों में सांठगांठ है।विधायकों के घर से आंतकी पकड़े जाते हैं।अधिकारी सरकार से खुश नहीं।राज्य के 21 आईपीएस अधिकारी राज्य के बाहर डेपुटेशन पर हैं।मणिपुर आने के साथ ही वे वापस राज्य के बाहर लौट जाना चाहते हैं।इबोबी के करीबी सिंचाई मंत्री बिरेन सिंह का कहना है कि हमें स्थित से मुकाबला करने के लिए अनुभवी लोगों की जरुरत है।पर ये राज्य में सेवा देने को ही इच्छुक नहीं।
राज्य में स्थिति विकराल है।कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है।जंगलराज कायम है।शासन सरकार का नहीं आंतकियों का चल रहा है।कांग्रेस की न होकर कोई दूसरी सरकार होती तो अब तक राष्ट्रपति शासन लग जाता।पर केंद्र की कांग्रेस नेतृत्ववाली सरकार पूर्वोत्तर में कांग्रेस के सिमट रहे जनाधार से वैसे ही चिंतित है।मेघालय भी हाथ से खिसक गया।इबोबी मणिपुर में दूसरी बार लगातार कांग्रेस को सत्ता में लाएं हैं।इसलिए भी वह धृतराष्ट्र की भूमिका में है।लेकिन देश की सुरक्षा के लिए यह अच्छी बात नहीं है।स्थिति से निपटने के लिए तुरंत राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाकर कड़ाई से पेश आने की जरुरत है।(लेखक गुवाहाटी स्थित पूर्वोत्तर मामलों के विशेषज्ञ हैं)

लेखक का पता-राजीव कुमार,पोस्ट बाक्स-12,दिसपुर-781005
मोबाइल-9435049660

त्रिपुरा के मंत्री ने किया शर्मसार

राजीव कुमार
पूर्वोत्तर में आंतकियों और राजनेताओं का संपर्क नई बात नहीं है।लेकिन एक विदेशी आंतकी संगठन के साथ संपर्क होने के आरोप त्रिपुरा के मंत्री पर लगे हैं।उन्हें इस्तीफा देना पड़ा है।देश में यह इस तरह की संभवत पहली घटना है।देश की सुरक्षा के सामने बड़े सवाल खड़े हुए हैं।संविधान के नाम पर शपथ लेनेवाला मंत्री विदेशी आंतकियों के साथ संबंध रखे तो देश की संप्रभुता की रक्षा कौन करेगा ?
त्रिपुरा के खाद्य व आपूर्ति विभाग के मंत्री शाहिद चौधरी पर बांग्लादेश के हरकत-उल-जेहादी-अल-इस्लामी(हूजी) के कार्यकर्त्ता मामून मियां से संपर्क होने का आरोप लगा है।मामून बांग्लादेशी नागरिक है।उसने पासपोर्ट और स्थाई बाशिंदा प्रमाण पत्र मंत्री चौधरी के साथ संपर्क के तहत हासिल किया।इसके लिए उसने अपना नाम बदलकर सुमन मजुमदार कर लिया।पुलिस की माने तो उसने इस तरह भारत विरोधी कार्यों को आगे बढ़ाया।
पश्चिम बंगाल पुलिस अपने यहां दो बांग्लादेशियों को नहीं पकड़ती तो शायद कभी यह राज नहीं खुलता।राज न खुलने पर वह आराम से मंत्री तक की अपनी पहुंच का फायदा उठा भारत विरोधी कार्यों को अंजाम देता रहता।बंगाल पुलिस ने हावड़ा से शमीम अख्तर और आलमगिर को पकड़कर पूछताछ की तो मियां के बारे में जानकारी सामने आई।यह दोनों विस्फोटक और उत्तर बंगाल में स्थित सैनिक शिविरों की जानकारी के साथ पकड़े गए।बंगाल पुलिस 27 मार्च को अगरतला आकर मियां को गिरफ्तार कर ले गई।इसके बाद ही मंत्री और उसके परिवारवालों के साथ मियां का संबंध उजागर हुआ और विपक्ष ने वामपंथी सरकार को घेरा।
विपक्ष के हमले से बचने के लिए मुख्यमंत्री मानिक सरकार ने मंत्री चौधरी से इस्तीफा लेने में देर नहीं की।इस्तीफे के पहले त्रिपुरा पुलिस ने मियां के खिलाफ मामला दायर किया।लेकिन विदेशी आंतकी संगठन के कार्यकर्त्ता के साथ संबंध रखने और मदद करनेवाले व्यक्ति को उम्मीदवार बना और विधायक बनने के बाद मंत्री पद दे खुद राज्य की वामपंथी सरकार सवालों के घेरे में आ गई है।मुख्यमंत्री माणिक सरकार पर बड़ा सवाल है। उनकी पुलिस को क्या इसकी भनक तक नहीं लगी ?या मामला मंत्री का होने के कारण राजनीतिक दबाव के चलते कुछ नहीं किया गया।बंगाल की पुलिस की कार्रवाई के बाद राज्य सरकार ने पूरे मामले पर सीआईडी जांच की घोषणा की।केंद्र ने भी इसे गंभीरता से लिया है।उसने आईबी से इसकी अंदरुनी जांच कराने का फैसला किया है।

त्रिपुरा की माकपा सरकार यह तो आरोप नहीं लगा सकती कि यह उसके खिलाफ साजिश है।कारण पश्चिम बंगाल पुलिस मियां को गिरफ्तार कर ले गई है,जहां भी वामपंथी सरकार सत्ता में है।मंत्री चौधरी पर आरोप है कि मियां को सुमन मजुमदार के नाम पर फर्जी पासपोर्ट निकालने में मदद की थी।प्रदेश माकपा मंत्री के इस्तीफे के बाद भी उनका बचाव करने में लगी है।उसका कहना है कि चौधरी का हूजी के साथ संबंध नहीं है,जांच निष्पक्ष हो इसलिए मुख्यमंत्री ने चौधरी का इस्तीफा लिया है।
लगातार तीसरी बार विधायक बने चौधरी राज्य की वामपंथी सरकार में अकेले मुस्लिम मंत्री थे।उन्होंने मुख्यमंत्री माणिक सरकार को धनपुर विधानसभा क्षेत्र में जीताने के लिए मुस्लिम मतदाताओं के बीच प्रचार किया था।क्या इन्हीं वजहों से मुख्यमंत्री चौधरी के खिलाफ कार्रवाई करने से हिचकते रहे?यह देश के साथ बड़ा खिलवाड़ है।कारण सभी जानते हैं कि पूर्वोत्तर के आंतकियों की शरणस्थली बांग्लादेश है।सीमा सुरक्षा बल ने बांग्लादेश रायफल्स को यहां के आंतकियों के 117 शिविर बांग्लादेश में रहने की एक सूची सौंपी है।तब एक मंत्री का हूजी के सदस्य को मदद पहुंचान अक्षम्य अपराध है।
मंत्री के इस्तीफे के साथ ही समस्या खत्म नहीं हो गई है।कारण पुलिस ने अभी तक चौधरी को गिरफ्तार नहीं किया है।गिरफ्तार कर उनसे पूछताछ की जाए तो पूरे मामले में और सनसनीखेज खुलासे हो सकते हैं।त्रिपुरा में विपक्ष के नेता रतनलाल नाथ ने केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल से मुलाकात कर इस मामले की सीबीआई से जांच कराने की मांग की है।त्रिपुरा में छह बार वामपंथी सरकार आई है और अब तक तीन माकपा मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा है।लेकिन किसी विदेशी आंतकी के साथ संबंध के चलते नहीं,बल्कि अपने निजी जिंदगी के विवादों के चलते इन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
अब तक पूर्वोत्तर के राजनेताओं के स्थानीय आंतकियों के साथ संबंध होने की बात सामने आती रही है।कई आंतकी तो मुख्यधारा में लौटकर सरकार का हिस्सा बन चुके हैं।असम में तो एक आंतकी आत्मसमर्पण न कर ही मंत्री बन गया।मंत्री बनने के बाद आंतकी रहते हुए जो मामले थे उन्हें अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अदालत से ही बरी हो गया।अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए राजनेता ही आंतकी पैदा कर विकास के नाम पर आनेवाले पैसों को निगल रहे हैं।जब तक यह बंद नहीं होगा तब तक पूर्वोत्तर और देश का भला नहीं होगा।देश की सुरक्षा खतरे में रहेगी।गोपनीय दस्तावेज लीक होकर विदेशियों के हाथों में पहुंच जाएंगे।पुलिस में राजनीतिक हस्तक्षेप होगा।वह निष्पक्ष होकर कुछ नहीं कर पाएगी।इस पूरे माहौल को जनता ही बदल सकती है।खुद जागरुक हो अपने मताधिकार का प्रयोग सही ढंग से कर इनके इस खेल को उलट सकती है।

(लेखक गुवाहाटी स्थित पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)
लेखक का पता-राजीव कुमार,पोस्ट बाक्स-12,दिसपुर-781005
मोबाइल-9435049660

Friday, March 21, 2008

मेघालय -संगमा की जीत,सोनिया की हार

राजीव कुमार
मेघालय में दस दिनी डी डी लपांग की कांग्रेस सरकार का गिरना कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिए एक बड़ा झटका है।कारण एनसीपी के नेता पी ए संगमा ने एकसमय सोनिया के विदेशी मूल को मुद्दा बनाया था और कांग्रेस छोड़ दी थी।आज भी वे सोनिया के खिलाफ हैं यह बात उन्होंने मेघालय में कांग्रेस की सरकार न बनने देकर स्पष्ट कर दिया है।
साठ सदस्यीय मेघालय विधानसभा के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस को 25 सीटें मिली।वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।एनसीपी को सिर्फ 14 सीटें मिली।फिर भी संगमा किंगमेकर बने।राज्यपाल एस एस सिद्दू ने बड़ी पार्टी के रुप में कांग्रेस को सरकार बनाने का न्यौता दिया।लपांग ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।राज्यपाल ने लपांग को बहुमत साबित करने के लिए दस दिन का समय दिया।कांग्रेस के पास तीन निर्दलीय थे।इस तरह कांगरेस बहुमत से तीन सीट दूर 28 के आंकड़े पर पहुंच चुकी थी।कांग्रेस को उम्मीद थी कि तीन विधायक जुटाना उसके लिए कोई मुशि्कल नहीं होगी।पर संगमा ने अपनी समझबूझ से कांग्रेस को पटकनी दे दी।
कांग्रेस 19 मार्च की सुबह बहुमत साबित करने के चंद घंटे पहले तक सोचती रही कि तीन विधायक जुट जाएंगे।इसके लिए कांग्रेस के जोड़-तोड़ में माहिर रथी-महारथी कोशिश में लगे रहे।असम के स्वास्थ्य मंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा इस काम के महारथी माने जाते हैं।वे लपांग के शपथ लेने और बहुमत साबित करने के पहले शिलांग में डेरा डाले बैठे रहे।लेकिन तीन निर्दलीय विधायकों को कांग्रेस के पाले में कर पाने में विफल रहे।संगमा ने चुनाव नतीजों के आने के साथ ही मेघालय प्रगतिशील गठबंधन(एमपीए) बनाकर बाजी मार ली।इसमें पूर्व की कांग्रेस गठबंधन सरकार में शामिल यूनाईटेड डेमोकेर्टिक पार्टी(यूडीपी) और छोटी पार्टियों को गठबंधन में शामिल कर लिया।खुद मुख्यमंत्री बनने के बजाए संगमा ने यूडीपी के डोनकुपर राय को पहले मुख्यमंत्री बनाया।
संगमा ने सोनिया गांधी को नीचा दिखाने के लिए ही फिलहाल मुख्यमंत्री न बन कांग्रेस को पटकनी दी।यह एक तरह से श्रीमती गांधी के त्याग की तरह है, जब उन्होंने कांग्रेस की केंद में सरकार बनने देने के लिए खुद प्रधानमंत्री पद त्याग दिया।संगमा इसे छिपाते भी नहीं है।वे कहते हैं,प्रदेश कांग्रेस में मेरा कोई दुश्मन नहीं है।पर श्रीमती गांधी के साथ मेरी राजनीतिक प्रतिद्वंदिता जगजाहिर है।कांग्रेस ने संगमा के गठबंधन पर पहले टिप्पणी की थी कि गठबंधन नवजात शिशु की मौत मर गया।पर जब बहुमत न होने की बजह से लपांग ने इस्तीफा दिया तो संगमा कांग्रेस पर पलटवार करने से नहीं चुके।उन्होंने कहा कि कांग्रेस नीत गठबंधन का आशानुरुप गर्भपात हो गया है।
संगमा ने भले ही दस दिन की लपांग नेतृत्ववाली कांग्रेस सरकार को बहुमत के अभाव में आगे नहीं चलने दिया हो पर एमपीए गठबंधन को ठीक तरह ले जाने में उन्हें भी अनेक पापड़ बेलने होंगे।कारण गठबंधन में शामिल निर्दलीय और छोटी पार्टियों के विधायक कभी भी नाराज होकर पाला बदल सकते हैं।इसलिए मेघालय में आनेवाले पांच सालों में यह सरकार स्थिर सरकार होगी यह आशा नहीं की जा सकती।दल-बदल कानून के अस्तित्व में आने के पहले 1998 और2003 के बीच राज्य में छह सरकार आई।जबकि इसके बाद के पांच साल में कांग्रेस नीत गठबंधन की सरकार रही लेकिन तीन बार मुख्यमंत्री बदले।मेघालय गठन के बाद पहली सरकार को छोड़ दें तो हर बार राज्य में गठबंधन सरकार बनी है।
दो दशक बाद राज्य की राजनीति में लौटे संगमा ने इस बार खुद को चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री के रुप में पेश किया था।साथ ही अपने दो बेटों को दो सीटों पर चुनाव लड़वाया।वे जीते भी।इसमें से एक को मंत्री भी बना दिया।सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठानेवाले संगमा अब राजनीति में खुद परिवारवाद को बढ़ावा दे रहे हैं।अब आनेवाले समय में वे गठबंधन सरकार चलाकर सफल होते हैं और मेघालय का मतदाता उनके परिवारवाद को मानता है या नहीं,यह देखनेवाली बात होगी।इसी पर उनका राजनीतिक भविष्य निर्भर करेगा।
(लेखक गुवाहाटी स्थित पूर्वोत्तर मामलों के विशेषज्ञ हैं)
लेखक का पता-राजीव कुमार,
पोस्ट बाक्स-12,दिसपुर-781005
मोबाइल-9435049660

Wednesday, June 20, 2007

आजादी नहीं,बर्बादी में लगा है उल्फा



राजीव कुमार
उल्फा नेता बांग्लादेश में है।संगठन के बयानों से यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है।कारण बांग्लादेश में बैठे उल्फा के शीर्ष नेता वहां के कट्टरवादी संगठनों की बोली बोल रहे हैं।यह उनकी मजबूरी है।नहीं तो शरण कौन देगा।इसलिए बांग्लादेश के कट्टरवादी संगठनों को खुश करने के लिए उल्फा ने बम विस्फोटों की जिम्मेवारी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ पर डालनी शुरु कर दी है।
उल्फा अब कोई विस्फोट करता है और उसमें यदि कोई मुस्लिम व्यकि्त मारा जाता है तो वह तुरंत इससे मुकर जाता है।गुवाहाटी के आठगांव और हाजो में हुए बम विस्फोट में मुसि्लम लोग मारे गए तो उसने देर किए बिना मीडिया में इसका खंडन भेजा।इन बम विस्फोटों के पीछे असम पबि्लक वर्क्स और आरएसएस के छात्र संगठन का हाथ होने का आरोप मढ़ दिया।अन्य विस्फोटों के मामले में वह इतनी हड़बड़ी नहीं दिखाता है।मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,उल्फा बांग्लादेश में बैठे अपने मास्टरों को खुश करने के लिए यह करता है।
बांग्लादेश में शरण के बदले उल्फा को वह सारी बातें माननी पड़ रही है जो असम के हितों के खिलाफ है।असम को आजाद कराने का सपना देखनेवाला संगठन इस तरह असम को ही क्षति पहुंचा रहा है।बांग्लादेश से अबाध घुसपैठ होती है।इस पर वह चुप्पी साधे हुए है।वह बोल नहीं सकता।आसरा मिलने के कारण वह बेबस है।इसके चलते बांग्लादेश की वह योजना सफल होने की ओर बढ़ रही है जिसमें उसने निचले असम के कई जिलों को लेकर वृहतर बांग्लादेश बनाने का सपना देखा है।उल्फा के कंधे पर बंदूक रखकर वह इस दिशा में आगे बढ़ रहा है।
उल्फा का जन्म 7 अप्रेल 1979 को शिवसागर जिले के ऍतिहासिक रंगघर में हुआ था।पर उसने बांग्लादेश में शरण दस साल बाद 1989 में ली।जब उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आशंका हुई।जब उल्फा नेताओं ने बांग्लादेश में शरण ले ली तो राज्य में धीरे-धीरे मुसि्लम आबादी बढ़ने लगी।जानकार बताते हैं कि 1989 में उल्फा का एक नेता बांग्लादेश गया।उसने बांग्लादेश नेशनल पार्टी की तत्कालीन सरकार के एक मंत्री से मुलाकात की।इस बैठक के बाद ही पाकिस्तान के पेशावर में वहां की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विस इंटलीजेंस(आईएसआई)ने उल्फा के सदस्यों को 1990-91में प्रशिक्षण दिया।यह शुरुआत थी।लेकिन इसके पहले 1983 में उल्फा के चालीस सदस्यों ने म्यांमार के काचिन में एनएससीएन से हथियारों का प्रशिक्षण पाया था।इसमें उल्फा के सेना प्रमुख परेश बरुवा भी शामिल थे।इसके बाद 1986 में काचिन में 90 उल्फा सदस्यों ने प्रशिक्षण पाया।प्रशिक्षण पानेवालों में उल्फा के चेयरमैन अरविंद राजखोवा भी शामिल थे।इसके बाद ही संगठन ने बांग्लादेश का रुख किया और असम के विनाश का दौर शुरु हो गया।
1971 की जनगणना के अनुसार ग्वालपाड़ा जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 50.11प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 41.50थी।लेकिन 20साल बाद पूरी छवि ही बदल गई।1991की जनगणना में इस जिले में हिंदुओं की आबादी घटकर 39.89प्रतिशत पर आई जबकि मुसलमानों की बढ़कर 60.46 प्रतिशत पर पहुंच गई।यही हाल धुबड़ी जिले में हुआ।1971की जनगणना के अनुसार धुबड़ी जिले में हिंदुओं की जनसंख्या 38.80 प्रतिशत थी जबकि मुसलमानों की 60.40 थी।लेकिन 1991की जनगणना के अनुसार इस जिले में हिंदुओं की जनसंख्या घटकर 28.73प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 70.45प्रतिशत हुई।ठीक इसी तरह बरपेटा जिले में 1971 की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या51.52प्रतिशत और मुसलमानों की 48.65प्रतिशत थी।पर बीस साल बाद मुसलमानों की बढ़कर 56.07प्रतिशत और हिंदुओं की घटकर 40.26पर आ गई।हाइलाकांदी जिले में 1971की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या 47.48 प्रतिशत और मुसलमानों की 51.40प्रतिशत थी।लेकिन बीस साल बाद हिंदुओं की आबादी इस जिले में घटकर 43.71प्रतिशत और मुसलमानों की बढ़कर 54.79प्रतिशत हो गई।राज्य के अधिकांश जिलों में हिंदुओं की जनसंख्या घटी है जबकि मुसलमानों की बढ़ी है।वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार राज्य में हिंदुओं की जनसंख्या 64.9प्रतिशत और मुसलमानों की 30.9प्रतिशत थी जबकि 1991की जनगणना में हिंदुओं की जनसंख्या 67.1और मुसलमानों की 28.4प्रतिशत थी।केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार राज्य की 126 विधानसभा सीटों में से 36 में मुस्लिम बहुसंख्यक है।भारत-बांग्लादेश की खुली सीमा से बांग्लादेशी घुसपैठियों का निरतंर आना जारी है।इन सबके बीच उल्फा ने हिंदीभाषी मजदूरों की हत्या कर बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोजगार का अवसर दे दिया है।स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक रसूल हक ने निचले असम के कई जिलों को लेकर मुस्लिमों के लिए अलग से स्वायत्त परिषद बनाने की मांग की है।उधर उल्फा के सहयोग से राज्य में जेहादी तत्व सक्रिय है।इन सब ने मिलकर राज्य को गर्त में ले जाने का कार्य शुरु कर दिया है।मुख्यमंत्री तरुण गोगोई कहते हैं,असम स्वाधीन होकर नहीं रह सकता।माना कि हो भी गया तो वह पराधीन ही होगा।उल्फा नेताओं को उसे बांग्लादेश के इशारे पर ही चलाना होगा।
इन सब से यह स्पष्ट हो जाता है कि बांग्लादेश में आसरा लेने की कितनी बड़ी कीमत उल्फा नेता चुका रहे हैं।जो आनेवाले दिनों में असम के लिए सबसे बड़ा खतरा बनेगी।कारण बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण राज्य में भारी जनसांख्यिकीय परिवर्तन हुआ है।
(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
संपर्क पता-राजीव कुमार,
पोस्ट बाक्स-12,दिसपुर-781005
मोबाइल-9435049660