Sunday, December 25, 2016

शासनतंत्र को पटरी पर लाने के लिए करना पड़ रहा है संघर्ष

असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल से वरिष्ठ पत्रकार राजीव कुमार की विशेष बातचीत



छह महीने सरकार चलाने के बाद आप संतुष्ट हैं? आप ने जैसा सोचा था, वैसे सरकार चल रही है या कोई समस्या है?
- शासन तंत्र में अराजकता आ गयी थी। नीति-नियमों का उल्लंघन कर कई काम किये गये। दिसपुर, जिला स्तर, प्रखंड स्तर, पंचायत स्तर में घोर अनियमितताएं हुईं। अब इन्हें फिर से पटरी पर लाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आम जनता सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार बढ़ने से कष्ट झेल रही थी। गरीब लोगों की सरकारी कार्यालयों में कोई पूछ नहीं थी। कुछेक बिचौलिए पूरी शासन व्यवस्था को ही निगल चुके थे। इसके चलते शासन व्यवस्था के प्रति लोगों का मोहभंग हो गया था। यह विश्वास वापस लौटा लाने के लिए हम पिछले कुछ दिनों से काफी संघर्ष कर रहे हैं। कष्ट करना पड़ रहा है। आने वाले दिनों में और अधिक कष्ट करना पड़ेगा, क्योंकि केंद्र और राज्य सरकार की जितनी योजनाएं हैं, वे शहर, गांव, चाय बागान, चर इलाकों के लिए हैं। इन योजनाओं से पहाड़ी, मैदानी और सभी जगहों पर रहने वाले लोग लाभान्वित हों, इसके लिए शासन-व्यवस्था से भ्रष्टाचार को दूर करना होगा। सभी स्तर पर, मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर जमीनी स्तर तक भ्रष्टाचार खत्म करना होगा और सभी को कार्यक्षम बनाना होगा। कार्यदक्षता बढ़ानी होगी। अधिकारी, कर्मचारी, मंत्री, विधायक, सांसद, पंचायत के चुने हुए प्रतिनिधि, नगर समिति, नगरनिगम के चुने हुए प्रतिनिधियों समेत सभी की कार्यदक्षता बढ़ानी होगी, तभी जनता लाभान्वित होगी। इसी उद्देश्य को आगे रख हम पिछले छह महीनों से संघर्ष कर रहे हैं। इसके लिए हमें बार-बार समीक्षा बैठकें करनी पड़ रही हैं। सभी स्तर के अधिकारियों-कर्मचारियों व विभागीय मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श करना पड़ रहा है। हमने राज्य के बौद्धिक तबके से भी सुझाव लिये हैं। अब तक सरकार की ओर से उठाये गये कदमों में जनता शामिल हुई है और जनता के सहयोग से हम कुछ कार्यों में सफलता पाने में कामयाब हुए हैं। अतिक्रमण हटाया जाना इनमें शामिल है। काजीरंगा से लेकर मोरीगांव, दरंग, सिपाझार, श्रीश्री शंकरदेव के जन्मस्थान बटद्रवा में अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया गया। इन अतिक्रमण विरोधी अभियानों में जनता का सहयोग मिलने से इनमें सफलता हाथ लगी। इसके अलावा चुनाव के दौरान हमने जो वायदे किये थे, उनको भी लागू कर रहे हैं। इनमें भारत-बांग्लादेश सीमा को सील करना, एनआरसी का अद्यतन शामिल है। जनता का सहयोग इनमें मिल रहा है। हम इन कामों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था-सर्व आनंद यानि सर्वानंद। आप जब पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे तब असम की जनता मोदीजी के कहे अनुसार आनंदित होगी? क्या आप उस दिशा में बढ़ रहे हैं?
- समाज के सभी स्तरों के लोगोंको विश्वास में लेकर बराक-ब्रह्मपुत्र और पहाड़-समतल के वृहत असमिया समाज के बीच समन्वय की धारा मजबूत करने और एक जनगोष्ठी को दूसरी जनगोष्ठी द्वारा विश्वास में लेकर आगे बढ़ने के माहौल को बनाना है। इसलिए जाति, गोष्ठी, भाषा, धर्म से ऊपर उठ कर सभी को साथ लेकर ऐसे ही असम के निर्माण के लिए हम आगे बढ़ रहे हैं। जिस असम में हम परिवर्तन लाने की बात सोच रहे हैं, यह तभी संभव होगा, जब हमारे बीच समन्वय होगा। समन्वय के साथ ही हम कठोर परिश्रम करेंगे। परिवर्तन का माहौल बनाना होगा। परिवर्तन का अर्थ है मन का परिवर्तन, संकीर्णता के परिवर्तन से। इसलिए लोगों के मन में जितनी मलिनता है, जितने भी संदेह, शंका, भय हैं, इन्हें दूर कर लोग खुले मन से असम में रह सके। असम की मिट्टी में, पूरे प्राकृतिक परिवेश में, भौगोलिक वातावरण में, वन संसाधन और संभावना का विकास कर असम के विकास के लिए अपने को लगा सकने वाला परिवर्तन। इसलिए मैं सोचता हूं कि इस बारे में निश्चित रूप से जनता ने सकारात्मक फैसला लिया है और हम सब सच्चाई और निष्ठा से काम करते रहे तो हमें जनता का समर्थन मिलता रहेगा।
आईएमडीटी एक्ट खारिज होने के बाद आप असम के जातीय नायक बने। भाजपा से मुख्यमंत्री बनने के बाद आपको विपक्ष खलनायक बता रहा है। लेकिन आप इन पर समय जाया करने के बजाय अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। इतना धैर्य कैसे संभव है?
- मैंने कभी अपने को जातीय नायक नहीं समझा है। सोचना भी नहीं चाहिए। मैं जातीय नायक तब बनूंगा, जब मैं सर्वोच्च त्याग करुंगा। जीवन का सर्वोच्च त्याग देश के लिए, समाज के लिए, जाति के लिए करुंगा। सर्वोच्च त्याग तो मैंने नहीं किया है। इसलिए मैं समाज के लिए, सभी श्रेणी के लोगों के लिए, जाति के लिए अंतर्मन से साथ काम करने का प्रयास कर रहा हूं। जातीय नायक वे हैं, जो अपने जीवन में देश के हित, समाज हित, लोगों के हितों के लिए घोर विपत्तियां सहते हुए महान बलिदान देते हैं। वास्तव में वीर शहीद ही जातीय नायक होते हैं। इन जातीय नायकोें का आदर्श हम अपनाएंगे। जीवन के रास्ते में हम भविष्य के समाज को गढ़ने के लिए प्रयास करते रहेंगे। इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई। मैंने कभी यह भावना मन में नहीं पाली। मैं यह नहीं हूं, यह मैं जानता हूं, क्योंकि एक जातीय नायक होने के लिए समस्त जनता के हृदय में जगह बनानी होगी। सभी लोगों का भरोसा जीतना होगा। मेरे गुरु ने मुझे यह सीख दी है। मुझे असम की जनता का प्यार मिला है और यही मेरी शक्ति का आधार है। इसलिए मैं जनता के प्रति अपनी श्रद्धाभक्ति रखकर सदैव काम करने के लिए इच्छुक हूं। किसी भी श्रेणी की जनता हमारे नेतृत्व से शंकित न हो या वे असुरक्षा के माहौल में न रहें, इसके लिए ही मैं प्रयास करता रहूंगा। सभी को काम करने के लिए सुरक्षित वातावरण, खुले मन से काम करने का वातावरण बनाना ही हमारा प्रधान लक्ष्य है।
आपके कई मंत्री, विधायक सांप्रदायिक टिप्पणी कर स्थितियां जटिल बनाते हैं, लेकिन आपको नुकसान हो सकता है, यह जानते हुए भी आप हार्डलाइन नहीं अपनाते। आगे भी आप ऐसे रह सकेंगे?
- हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने हमें जो नीति सौंपी है, जिस नीति के आधार पर समाज और देश को गढ़ने को कहा है, उसी को लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं। यह है सबका साथ, सबका विकास। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था कि समाज के सबसे दरिद्र को तुम गले लगाना, शक्तिशाली करना, आर्थिक रूप से मजबूत करना, इज्जत देना और इन्हें सम्मान के साथ जीने का माहौल बना देना। इसलिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय के आदर्श, महात्मा गांधी के आदर्श और आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमें जो नीति शिक्षा दी है, उसके आधार पर हमें असम की 3 करोड़ 20 लाख लोगों की आस्था लेकर आगे बढ़ना होगा। भारत में रहने वाले लोगों के प्रति श्रद्धाभाव रखकर हमें कार्य करना पड़ेगा। भारतवर्ष को शक्तिशाली करने के लिए असम को शक्तिशाली बनाना पड़ेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आपके बीच बहुत समानता है। वे भी अकेले रहते हैं और आप भी। देर रात तक कार्य करना उनका भी शगल है। मोदीजी देश के लिए और आप असम के लिए कार्य कर रहे हैं। आपके परिवार के किसी व्यक्ति को भी राजनीति या आपके साथ सक्रिय रूप में देखा नहीं जाता। इसके चलते ही राज्य में आप कार्य कर पा रहे हैं?
- मेरे माता-पिता ने मुझे जो नीति शिक्षा दी है, वे आज इस दुनिया में नहीं हैं, इहलोक से विदा ले चुके हैं, लेकिन जिंदा रहने के दौरान उन्होंने मुझे जो नीति शिक्षा दी, उसके आधार पर मुझे कार्य करने की ऊर्जा मिली है। उन्होेंने मूल्यबोध की बात समझायी थी। लोगों के प्रति श्रद्धाभक्ति रख कार्य करना चाहिए। यही जीवन में मूल्यवान शिक्षा थी। इस शिक्षा से शिक्षित एक नागरिक के रूप में मैं अपना दायित्व निर्वहन करने में लगा हुआ हूं। इसके अलावा मेरे गुरुओं ने जो महान सीख दी है, जो मानवीय शिक्षा प्रदान की है, उसके आधार पर ही आने वाले दिनों में हम असम को मानवीय चिंतन व आदर्शों के आधार पर आगे ले जाएंगे।
आप अकेले रहते हैं। युवा हैं। असम के मुख्यमंत्री हैं। अब इसका दुख होता है? आने वाले समय में क्या हम बदलाव देखेंगे?
- मैं तो अकेला नहीं। इतनी जनता मेरे साथ है। असम की जनता ने मुझे जिम्मेवारी सौंपी है। जनता ने जो जिम्मेवारी सौंपी है, वहीं मेरा मनोबल है। जनता सभी समय मेरे पर नजर रखती है। इसलिए मैं कभी अपने को अकेला महसूस नहीं करता। लोगों की दृष्टि है मुझ पर। मैंने मुख्यमंत्री के रूप में क्या काम किया, कहां किस तरह का आचरण किया, इस पर भी जनता नजर रख रही है। जनता मुझे देख रही हैं, यह बात में सदैव महसूस करता हूं। इसलिए मैं कभी अकेलापन महसूस ही नहीं करता। सभी को साथ लेकर आगे बढ़ने का मैंने संकल्प लिया है। लोग अपने तरह से सोच सकते हैं। उन्हें मैं रोक तो नहीं सकता।
आप में कभी उच्चाकांक्षा रही थी कि आपको मुख्यमंत्री बनना है या नहीं थी? आप में लॉबी पॉलिटिक्स नजर नहीं आ रही है।
- ये चीजें नियति है। इन चीजों के लिए अति उत्साहित होकर फायदा नहीं। सिर्फ निष्ठा के साथ कार्य करते रहना होगा। सफलता और विफलता समय के हाथ है। समय है भगवान। इसलिए सबकुछ जनता के हाथ में है। जनता जो फैसला करेगी उसी आधार पर हमें आगे बढ़ना है। अति उत्साहित होकर कोई फायदा नहीं होगा।
उत्तर लखीमपुर से प्रदान बरुवा को टिकट मिलना, रंजीत दास का प्रदेशाध्यक्ष बनना साबित करता है कि आप अपने कार्य के प्रति ज्यादा ध्यान देते हैं न कि लॉबी पॉलिटिक्स की ओर।
- नहीं, ये फैसले हमारे सामूहिक फैसले हैं। रंजीत दास के अध्यक्ष नियुक्त होने के बारे में हम सभी की एक राय थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ ही पार्टी के विभिन्न पदों पर रहने वाले नेताओं के साथ हमने कई बार इस पर चर्चा की। हम सभी एक परिवार हैं। बाहर लोगों की धारणा अलग हो सकती है, पर वैसी बात नहीं है। भाजपा में इस तरह की संस्कृति नहीं है। हमारे भाजपा में जो भी फैसले होते हैं, वे सर्वसम्मति से लिये जाते हैं। किसी को अंधेरे में रखा नहीं जाता। मेरे प्रदेशाध्यक्ष बनने का हो या फिर रंजीत दास का। सभी के विचार लिये गये हैं। मैंने भी अपना विचार दिया है। मैंने कहा कि रंजीत दास के अध्यक्ष बनने पर भाजपा की जमीनी स्तर पर स्थिति और अधिक बेहतर होगी।
आप में आध्यात्मिक चेतना का विकास कब से हुआ? आप अपने भाषणों में राजनीतिक हमला अधिक करने के बजाय सकारात्मक और लोगों को प्रोत्साहित करने की बातें करते हैं।
- पूरा मामला ही माता-पिता से जुड़ा है। साधारणतया माता-पिता बचपन में जो शिक्षा देते हैं, उसी के आधार पर व्यक्ति का जीवन निर्मित होता है। आधार माता-पिता से आता है। बाद में गुरु ने आध्यात्मिकता से अवगत कराया। कृष्णगुरु का सान्निध्य मिलने के बाद उन्होंने मुझे बहुत ज्ञान और सुझाव दिया। इसके चलते मुझे आगे बढ़ने में मदद मिल रही है। इनसे मुझे संकीर्णता से हटकर समाज और देश के लिए चिंतन करने का मनोबल मिला।
सरकारी खर्च बढ़ने की आशंका के चलते ही मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं कर रहे हैं क्या?
- मंत्रिमंडल का विस्तार नये साल में हो जाएगा।
भ्रष्टाचार के खिलाफ आपने जेहाद छेड़ा था। पर अब विपक्ष आरोप लगा रहा है कि आपकी पार्टी के लोगों का नाम आने से ही जांच ठंडे बस्ते में चली गयी है?
- ऐसी बात नहीं है। खुले मन से हमारे जांच करने वाले अधिकारियों को जांच का अधिकार दिया गया। इनमें भी कोई भी राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं है।
भाजपा के पास सरकार चलाने के लिए बहुमत है। इसमें गठबंधन के सहयोगियों से और अधिक दबाव आपको झेलना पड़ता है?
- नहीं, नहीं। कोई दबाव नहीं है। सभी का सहयोग मिल रहा है। हर कोई समर्थन दे रहा है। सब समझते भी हैं।
आरोप है कि सरकार आरएसएस चला रहा है?
- आरएसएस कभी भी हमारे काम-काज में हस्तक्षेप नहीं करता। वह तो हमें आदर्श, मूल्यबोध के आधार पर समाज को शक्तिशाली करने के सुझाव ही देता है।
आपने अगप इसलिए छोड़ी क्योंकि पार्टी आईएमडीटी एक्ट के रद्द होने का विरोध करने वालों के साथ हाथ मिलाना चाहती थी। यदि भाजपा में भी ऐसी स्थिति (हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के मसले पर) आयी तो आप वैसा ही रुख करेंगे?
- हम जो वायदे करके आये थे, उन्हें छिपा कर रखने की बात नहीं है। भाजपा ने चुनाव पूर्व जो चुनावी घोषणा पत्र लिखित रूप में असम की जनता के बीच वितरित किया था, उसमें साफ शब्दों में लिखा था कि हम आने वाले दिनों में क्या-क्या काम करेंगे। ये नयी बात नहीं है। जो सवाल आपने पूछा है, वह नये सिरे से नहीं आया है। चुनाव के पूर्व जनता ने इसे देखा था और उसके आधार पर ही भाजपा को सत्ता तक पहुंचाया था। पार्टी, संगठन सभी जानते हैं। यहां तक कि विपक्षी भी जानते हैं। हमने जो चुनावी घोषणापत्र प्रकाशित किया था, उसका अध्ययन विपक्ष ने भी किया है। सिर्फ अध्ययन ही नहीं, टीवी चैनलों पर चर्चा हुई है। इसके बाद ही असम की जनता ने हमें जनमत दिया है। इसलिए यह नया सवाल नहीं है। सत्ता में आकर लाया गया विषय नहीं है। सारे मामलों में जनता को भरोसे में लेकर ही पूरे असम की जनता के लिए प्रकाशित किया गया था। अब पूरा मामला संसद में चला गया है। संसद में ही इस पर फैसला होगा।
हार्डलाईन या सॉफ्टलाईन की बात नहीं है। हमने जो वादे किये थे, उन्हें मुझे पूरा करना ही होगा। इसमें बार-बार बदलाव की बात नहीं आ सकती। यह पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान असम की जनता के समक्ष किया गया घोषित वादा है।
आपको सबसे अधिक क्या चीज बुरी और अच्छी लगती है?
- मैं दूसरों पर चर्चा करने को बेहद बुरा मानता हूं। परनिंदा मेरे लिए बहुत बुरी चीज है। किसी दूसरे के बारे में कोई प्रशंसा करता है तो मुझे खुशी होती है। मैं तब अपने को ऊर्जावान मानता हूं। किसी के पीठ पीछे चर्चा करना या बुराई करना मुझे बेहद बुरा लगता है।
आप को भोजन में क्या पसंद है?
- मैं शाकाहारी खाना पसंद करता हूं। उबला हुआ हो और उसमें मिर्च न हो।
सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
- सबसे बड़ी चुनौती मेरे सामने परीक्षा में उत्तीर्ण होने की है। आने वाले पांच सालों में मैं ईमानदारी और निष्ठा के साथ कार्य पूरा कर सकूं। यही मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। मेरी परीक्षा शुरू ही हुई है। असम की जनता मेरे काम-काज पर कड़ी नजर रखे हुए है। जनता की परीक्षा में मैं उत्तीर्ण हो सकूं, तभी मैं अपने को सफल मानूंगा। अपने मन में आनंद की अनुभूति कर सकूंगा।
आपने अपने कार्यालय में महिलाओं को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया है। महिला समाज के प्रति आपके मन में बहुत इज्जत है।
- विश्व में एक आंदोलन हो रहा है। लैंगिक समानता का। आज की तारीख में पुरुष-महिलाएं समानांतर रूप से कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। तभी समाज आगे बढ़ पाएगा। आप यदि एक श्रेणी की अवहेलना करेंगे तो समाज आगे नहीं बढ़ सकता और तब मानवता प्रतिष्ठित नहीं हो सकती।
राष्ट्रीय नागरिक पंजी के अद्यतन को बंद करने का आरोप लग रहा है।
- बंद नहीं हुआ है। काम चल रहा है। यह गलत प्रचार चलाया जा रहा है। इतना बड़ा काम है। स्वाधीनता के बाद भारत में असम में ही यह कार्य पहले हो रहा है। संवैधानिक रूप से वैध भारतीय नागरिकोें के नामों का एक संवैधानिक दस्तावेज तैयार होगा। यह कार्य केरल, कश्मीर कहीं नहीं हुआ है। इसलिए इस तरह का एक राष्ट्रीय कार्य निष्ठा के साथ करने के लिए प्रत्येक दस्तावेज को बार-बार देखना होगा, ताकि गलती न रह जाए, क्योंकि यह ऐतिहासिक दस्तावेज होगा। इसलिए इस तरह के एक बड़े काम को काफी जतन के साथ करना होगा। सनकी होकर या आवेग के साथ करने की यह चीज नहीं है। किसी भी वैध भारतीय नागरिक का नाम छूट न जाए, यह हमें अच्छी तरह से जांच-पड़ताल करनी होगी।
हिंदीभाषी असम के अंदरुनी क्षेत्र में रहते हैं। उनकी सुरक्षा को लेकर सरकार क्या कर रही है?
- सिर्फ हिंदीभाषी नहीं, हमारा उद्देश्य किसी के साथ भेद-भाव न करने का है। सबका साथ सबका विकास नीति के आधार पर हमें सभी समुदायों को आगे ले जाना है। सबकी सुरक्षा करना हमारी जिम्मेवारी है।
आप मुख्यमंत्री होकर भी बाजार में स्वयं खरीददारी करने और खाना बनाने में भी रुचि रखते हैं?
- बाजार करना और खाना बनाना मुझे अच्छा लगता है। मैं जब केंद्रीय मंत्री था तो गुवाहाटी के श्रीनगर बाजार में प्रायः जाता था। मुझे सब्जियों की पहचान हैं। पहले लाही और गोभी की खेती कर साप्ताहिक बाजार में बिक्री करने जाता था। पहले तीन किलोमीटर पत्थर की सड़क पर पैदल चलकर दिनजान के साप्ताहिक बाजार में सब्जी दस पैसे-पंद्रह पैसे में बेचता था। तब से मेरे में बाजार के प्रति स्पष्ट धारणा है। बाजार खुद जाने पर मैं सब्जियों का चयन खुद कर सकता हूं कि कौन-सी फ्रेश है और कौन-सी पुरानी है। कुछ लोग बाजार जाने से इन चीजों पर ध्यान नहीं देते। ग्राहकों में जागरूकता होनी जरुरी है। मैं जैविक खेती को यहां स्थापित करना चाहता हूं। तब लोगों का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा और माहौल प्रदूषण मुक्त होगा।

Wednesday, November 2, 2016

सुविधावादी राजनेता हैं हिमंत


आरएसएस की गुड बुक के लिए बन रहे हैं कट्टर हिंदू

राजीव कुमार

असम की भाजपानीत सरकार में मंत्री डा.हिमंत विश्व शर्मा आरएसएस की गुड बुक में शामिल होकर मुख्यमंत्री तक की कुर्सी हासिल करने की दौड़ में हैं।इसलिए वे अंट-शंट बोले जा रहे हैं।अपनी दूसरी किताब के विमोचन पर उन्होंने कह दिया कि भाजपा धर्म के आधार पर राजनीति करती है।यह बुरी बात नहीं है।देश का बंटवारा भी धर्म के आधार पर हुआ था।
डा.शर्मा यह नहीं थमते।वे कहते हैं कि राज्य के 33 जिलों में से 11 जिले मुस्लिम बहुल हो गए हैं।2021 की जनगणना में और कुछ जिलों में हम अल्पसंख्यक हो जाएंगे।हमें यह देखना है कि एक लाख लोग हमारे शत्रु हैं या 55 लाख लोग शत्रु हैं।एक लाख वे उन लोगों को बता रहे हैं जो बांग्लादेश से आए हिंदू शरणार्थी हैं जबकि 55 लाख मुस्लमान बता रहे हैं।एक व्यक्ति संविधान की शपथ लेकर मंत्री बन इस तरह की बात कहें तो उसे मंत्री पद पर रहने का अधिकार नहीं है।
हिमंत सुविधावादी राजनेता रहे हैं।नीति व आदर्श नाम की कोई चीज उनमें दिखाई नहीं देती।वे शुरु में अखिल असम छात्र संघ(आसू)में थे।आसू ने छह साल तक असम आंदोलन किया था।आसू ने राज्य से विदेशी लोगों को खदेड़ने के लिए आंदोलन किया था।1985 में केंद्र के साथ असम समझौता हुआ।इस समझौते में स्पष्ट उल्लेख है कि 25 मार्च 1971 के बाद आए विदेशियों को राज्य से जाना होगा।अचानक हिमंत कांग्रेस में आए।2001 में तरुण गोगोई के नेतृत्ववाली कांग्रेस सरकार सत्ता में आई तो वे मंत्री बने।गोगोई के तीनों कार्यकाल में वे मंत्री रहे।चौदह साल गोगोई के साथ मंत्री रहने के बाद अचानक उनमें मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जागी।वे विक्षुब्ध गतिविधियां करने लगे।कांग्रेस हाईकमान ने झुकने से इनकार कर दिया तो हिमंत ने भाजपा का दामन थाम लिया।भाजपा तब केंद्र में आ चुकी थी।राज्य में उसके पास कद्दावर नेताओं को अभाव था।सो,भाजपा ने हिमंत को सिर आंखों पर बैठाया।
कांग्रेस में रहते हुए वे भाजपा पर जमकर प्रहार करते थे।लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान तो उन्होंने नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए कहा कि गुजरात में पानी की पाइपों से मुसलमानों का खून बहता है।लेकिन अब वे अपने को भाजपा का सबसे हितैषी जाहिर करने में लगे हैं।चतुर हिमंत यह भलीभांति जानते हैं कि आरएसएस को खुश कर दिया तो भाजपा में उन्हें बड़ा पद पाने से कोई रोक नहीं सकता।इसलिए वे अब कट्टर हिंदू बनने का ढोंग कर इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं।इस कार्य में उनके गाड फादर बने हैं राम माधव।राम माधव की पृष्ठभूमि आरएसएस की रही है और वहीं से उनकी एंट्री भाजपा में हुई है।
राम माधव ने हिमंत को जिस अंदाज में आगे बढ़ाया है,उसी अंदाज में भाजपा के पुराने कर्मी आहत हुए है।राज्य में लखीमपुर संसदीय सीट और बैठालांग्सू विधानसभा सीट का चुनाव होना है।यहां भी उम्मीदवारों के चयन में हिमंत की चली है।उत्तर लखीमपुर संसदीय सीट से सर्वानंद सोनोवाल सांसद थे।लेकिन माजुली विधानसभा सीट से जीत हासिल कर मुख्यमंत्री बनने से उन्होंने लखीमपुर सीट छोड़ दी।सोनोवाल को अपने पसंद का उम्मीदवार लखीमपुर संसदीय सीट पर देना था,लेकिन हिमंत ने अपने लाबी के विधायक प्रदान बरुवा को टिकट दिलाने में कामायाबी हासिल की। वही बैठालांग्सू से भाजपा उम्मीदवार बने डा.मानसिंह रंग्पी भी हिमंत गुट के हैं।कांग्रेस में रहते हुए भी उन्होंने अपने लोगों को टिकट देकर जिताया और वे विधायक हरदम उनके साथ रहे।
पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस नेता तरुण गोगोई को भी यह अंत में समझ में आया।मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल भी यही भूल करने जा रहे हैं।भाजपा में भी वे ये खेल,खेल रहे हैं।इसके लिए वे अपने करीबी माने जानेवाले विधानसभा अध्यक्ष तथा सरभोग के भाजपा विधायक रंजीत दास को भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने में भी जल्द ही सफल हो जाएंगे।इससे वे अपनी पकड़ मजबूत करेंगे।पर जिस दिन उन्हें लगेगा कि वे मुख्यमंत्री बनने में इस पार्टी में कामयाब नहीं होंगे उसी दिन अपने इन समर्थित विधायकों व सांसदों के साथ वे दूसरी पार्टी का रुख कर लेंगे।यही उनका अब तक का स्वभाव दिखा है।
हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने के पक्ष में भाजपा इसलिए है क्योंकि वे इनके वोट बैंक हैं।असम में बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता देकर बसा दिया गया तो भाजपा की राज्य में पकड़ मजबूत होगी।इसलिए वे इसके सबसे बड़े पैरोकार बने हैं।लेकिन एक समय था जब भाजपा व आरएसएस असम आंदोलन के प्रबल समर्थक थे।अब विदेशियों को ये हिंदू-मुस्लिम में विभाजित कर क्यों देख रहे हैं।कारण अपनी रोटी सेंकनी है।असम में वैसे भी जमीन का अभाव है।रोजगार के सीमित साधन हैं।ऐसे में बांग्लादेशी हिंदुओं को नागरिकता देकर बसाने से समस्या जटिल होगी।हिमंत इससे समझकर भी नासमझी कर रहे हैं।क्योंकि उन्हें तो अपनी दुकान चलानी है।वह कैसे भी चले।

Friday, March 4, 2016

असमः बिहार के नतीजे दोहराएगी भाजपा


राजीव कुमार
असम में दो चरणों में 4 और 11 अप्रेल को विधानसभा चुनाव होंगे।चुनाव तिथियों की घोषणा के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं।अब तक गठबंधन न करने का दम भरनेवाली क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद(अगप)ने भाजपा के साथ ना-ना करते गठबंधन कर ही लिया।भाजपा जिस तरह विभिन्न पार्टियों से गठबंधन कर रही है उससे लगता है कि उसकी खुद की हालत पतली है।पहले वह खुद 84 प्लस सीट जीतने का दम भरती थी।
असम आंदोलन से जन्मी तथा दो बार सरकार बना चुकी अगप की हालत भी राज्य में अच्छी नहीं।राज्य की 126 सीटों में से भाजपा ने 24 सीटें अगप को दी है।राज्य में भाजपा के पांच विधायक हैं वहीं अगप के 2011 के विधानसभा चुनाव में 10 विधायक चुनकर आए थे।अलगापुर के अगप विधायक सहीदुल आलम चौधरी की मौत के बाद वहां हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने कब्जा जमाया तो अगप के विधायकों की संख्या घटकर 9 हो गई।बाद में अगप के चतिया विधानसभा के विधायक पद्म हजारिका और ढकुवाखाना के विधायक नव कुमार दलै भाजपा में शामिल हो गए।इस तरह अगप के विधायकों की संख्या घटकर सात हो गई।फिर भी अगप के विधायक भाजपा से ज्यादा हैं।लेकिन गठबंधन में भाजपा ने सीटें सिर्फ 24 दी है।इससे अगप की खराब स्थिति स्पष्ट होती है।
कभी भाजपा लोकसभा चुनाव में बिग ब्रदर की और विधानसभा में अगप के बिग ब्रदर होने की बात कहती थी,लेकिन इस बार केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गठबंधन का ऐलान करते हुए कहा कि अगप कनिष्ठ सहयोगी होगी।केंद्र में भाजपा नीत राजग की सरकार आने के बाद उसकी नीतियों की अगप खिलाफत करती रही है।लेकिन अब उसी के साथ गठबंधन कर चुनाव में उतरेगी।दोनों के गठबंधन को लेकर दोनों पार्टियों के तृणमूल कर्मी गुस्से में हैं।वैसे भी भाजपा ने जब से कांग्रेस के हिमंत विश्व शर्मा को लिया है,उसके दिन उलटे शुरू हो गए हैं।शर्मा की छवि बेदाग नहीं।जब वे कांग्रेस में थे तो यही भाजपा उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाती थी।इसलिए कांग्रेस को भाजपा पर हमला करने का मौका मिल गया है।
लोकसभा चुनाव के दौरान हिमंत ने नरेंद्र मोदी पर हमला करते हुए कहा था कि गुजरात के पानी की पाइपों में खून बहता है।इस पर एक भाजपा नेता ने मामला भी किया।लेकिन हिमंत के भाजपा में शामिल होते ही यह मामला उठा लिया।हिमंत की राजनीति पार्टी के बजाए अपने को शक्तिशाली करने की होती है ताकि वे मुख्यमंत्री बन सकें।कांग्रेस में भी उन्होंने यह कोशिश की,लेकिन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की बेदाग और लोकप्रिय छवि के कारण कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उन्हें हटाना मंजूर नहीं किया।
उधर सारदा घोटाले में फंसते ही हिमंत ने भाजपा का दामन थाम लिया।हिमंत ने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव से संबंध मधुर बनाए और इस तरह अपनी पहुंच अमित शाह तक बना ली। अब भाजपा ने हिमंत को अपने आंखों का तारा बना लिया।अब वे चुनाव परिचालना कमेटी के संयोजक हैं।उन्हीं की कही बातों के अनुसार भाजपा के दिल्ली के शीर्ष नेता चलते हैं,जिन्हें जमीनी सच्चाई पता नहीं।यदि भाजपा कांग्रेस के लोगों को न ले अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल को लेकर अकेले दम पर चुनाव लड़ती तो बेहतर स्थिति में आती।हो सकता था कि वह सरकार नहीं बना पाती लेकिन राज्य में उसकी स्थिति बेहतर होती।क्योंकि सर्वानंद सोनोवाल एक बेदाग चेहरा है।लेकिन हिमंत के इशारों पर चलते हुए भाजपा की जड़ें ही कमजोर होगी।बोड़ो पीपुल्स फ्रंट के साथ समझौता बीटीएडी में भाजपा को खत्म कर देगा।भाजपा ने अगप के साथ गठबंधन कर कांग्रेस के हाथ में चुनाव प्रचार के लिए एक बड़ा हथियार सौंप दिया है।यह है गुप्त हत्या का।
जब राज्य में अगप की सरकार थी और केंद्र में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो राज्य में गुप्त हत्याएं हुई थी।पिछले तीन बार से लगातार कांग्रेस इसे एक बड़ा मुद्दा बनाती आई है।इस बार भी बनाएगी।जनता उस समय को याद कर कांप उठती है।वहीं कांग्रेस की स्थिति इस बार भी बेहतर हो गई है।हिमंत के पार्टी में रहने के दौरान विक्षुब्ध गतिविधियों का दौर था।उनके जाते ही यह थमा।कांग्रेस ने अपनी योजनाओं से लाभार्थियों की संख्या बहुत बनाई है।विकास के भी अनेक कार्य हुए हैं।अशांत असम आज नई ऊंचाइयों को छू रहा है।इसलिए जनता में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के प्रति आस्था और विश्वास का भाव दिख रहा है।लोग में उनकी छवि एक बेदाग व ऊर्जावान मुख्यमंत्री की है।इन सबके चलते वे चौथी बार बहुमत ले आएं तो भी हैरत की कोई बात नहीं होगी।
बिहार में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के हावी रहने और स्थानीय नेतृत्व को तवज्जो न देने के चलते हार हुई।इसके बाद उसने सीख के तौर पर असम में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम का एलान किया,लेकिन सर्वानंद की चलती न के बराबर है।पार्टी के शीर्ष नेता कांग्रेस से आए हिमंत के इशारे पर ज्यादा कदम उठा रहे हैं,जो कि बिहार के नतीजों को ही भाजपा के लिए दोहराएंगे।
(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
मोबाइल-9435049660

Wednesday, June 24, 2015

आंखन देखी: म्यांमार की खुली सीमा,घुसना आसान


राजीव कुमार,म्यांमार के अंदर से






म्यांमार फिलहाल सुर्खियों में है।मणिपुर के चंदेल में आतंकियों ने भारतीय सेना के 18 जवानों को मारा था। भारतीय सेना ने बदले की कार्रवाई में म्यांमार में घुसकर आतंकियों पर हमला किया।भाजपा नीत केंद्र सरकार प्रचार में आगे है।सेना भी सरकार को देखकर वैसे कदम अपना रही है।इस पर कुछ कहने के बजाए हम अरुणाचल प्रदेश से सटे म्यांमार के अंदर तक बेरोकटोक बिना कोई पासपोर्ट-वीजा लिए जाने के अनुभव को पाठकों के साथ साझा करेंगे।इससे हमारी सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुलती है।साथ ही म्यांमार में आसानी से आ-जा सकने की बात भी उजागर होती है।
मैंने स्टीलवेल रोड देखने के लिए म्यांमार के पांगसू पास का दौरा किया।गुवाहाटी से 579 किमी का सफर कर हम असम के मार्घेरिटा,लिडू होते हुए अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग जिले के जयरामपुर पहुंचे।यहां तक सड़क चौड़ी और बेहद खूबसूरत है।जयरामपुर में इनर लाइन परमिट चेक करा लेने के बाद हम नामपोंग होते हुए पांगसू पास के लिए रवाना हुए।सड़क संकरी।हरे भरे पहाड़ों के बीच से गाड़ी नीचे ऊपर उतरते हुए आगे बढ़ती है।बरसात के दिन होने के कारण पहाड़ से उतरी लाल मिट्टी से सड़क पूरी तरह कीचड़ में तब्दील हो गई है।छोटी गाड़ियों से इन इलाकों में जाना आसान नहीं।कहीं जगहों पर गाड़ी कीचड़ में फंसने के कारण धक्के मारने के लिए उतर कर कपड़े खराब करवाने पड़े।जयरामपुर से पांगसू पोस्ट तक असम रायफल्स के दो गेट हैं।इन पर कोई जवान हमें नहीं दिखा।
पांगसू पोस्ट में असम रायफल्स के कैंप के बाहर हमें अपने नामों को वहां रखे एक रजिस्टार में लिखा।वहां बताया गया कि रास्ता बेहद खराब है,छोटी गाडियों में म्यांमार सीमा तक जाना संभव नहीं होगा।हमारी गाड़ी वहीं छोड़कर हम पैदल आठ किमी पहाड़ी रास्ते पर चले।पांगसू पोस्ट से हम वहां सड़क के कार्यों में लगे एक डंपर पर सवार होकर म्यांमार की सीमा में जाकर उतर गए।पर हमारी कोई तलाशी नहीं हुई।म्यांमार सीमा के पास भी कोई सुरक्षा नजर नहीं आई।हमने सीमा को दर्शाते चिह्नों पर खड़े होकर फोटो खिंचवाए।शिलालेख है जहां एक तरफ भारत और दूसरी तरफ म्यांमार लिखा हुआ है।यह समुद्र तट से 3,727 फीट की ऊंचाई पर है।पाटकाई पहाड़ी के शिखर पर स्थित है पांगसू पास।हमें एक भी जवान गश्त लगाता हुआ यहां दिखाई नहीं पड़ा।
हम पैदल चलते हुए म्यांमार के पांगसू पास के बाहर दाखिल हुए।यह ऐतिहासिक स्टीलवेल रोड़ है।वहां बांस लगी एक गेट है।पर कोई तैनात नहीं।दूर-दूर तक कोई हलचल नहीं देखी।सब आराम फरमा रहे हैं।पता चला कि म्यांमार की सीमा के अंदर सेना है।बुलाने पर आए।लेकिन उनके पास न कोई हथियार दिखा और न ही हमें रोकने के कोई विरोध।वे आम जनता की तरह लग रहे थे।कोई ड्रेस नहीं पहन रखी थी।हम लोग विख्यात लेक आफ नो रिटर्न और वहां मौजूद बाजार और बुद्ध मंदिर में घूमते रहे।खूबसूरत लेक आफ नो रिटर्न के बारे में कहा जाता है कि यहां जो भी गया वह वापस लौटकर नहीं आया।दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एलाएड सेना के विमान यहां उतरकर नीचे समा गए थे।इस लेक की लंबाई 1.4 किमी है जबकि चौड़ाई 0.8 किमी है।
अपने को सेना का कमाडेंट बताने वाले मायतून ने हमसे एक-दो बार फोटो न लेने का अनुरोध किया।लेकिन हम कुछ फोटो ले चुके थे।उसने हमसे दुर्व्यवहार नहीं किया।ज्यादा अंदर जाने की बात पर उसने कहा कि मैंने अपने कैप्टेन को बुला भेजा है।वह आएगा तो आप और आगे जाने की बात कर सकते हैं।लेकिन अंग्रेजी व अन्य कोई भी भारतीय भाषा समझ न पाने के कारण उनका कैप्टन बाजार से एक नागामीज बोलनेवाली महिला को लेकर आया।उसने बताया कि हमारे पास अधिकृत कागज नहीं है,इसलिए ज्यादा अंदर नहीं जा सकते।हमें वापस लौट आने का अनुरोध कैप्टेन ने किया।बतातें चले कि अरुणाचल के पांगसू पास में हर साल 20 जनवरी से 22 जनवरी तक विंटर फेस्टिवल आयोजित होता है।इस दौरान म्यांमार वाले पांगसू पास से लोगों का आना-जाना खोल दिया जाता है।
हम म्यांमार के जिस इलाके में थे वह सीमाई गांव का इलाका है।भारतीय गांवों की तरह ही वहां के दृश्य नजर आए।चापाकल पर महिलाएं नहाती दिखी।पर इससे साफ होता है कि म्यांमार में घुसना और वहां के जंगलों में डेरा जमाकर रहना आतंकियों के लिए आसान है।इसलिए पूर्वोत्तर के ज्यादातर आतंकी यहां डेरा जमाए रहते हैं।प्रशिक्षण चलता है।अब शायद स्थितियां बदले।
स्टीलवेल रोड भारत में 61 किमी,म्यांमार में 1033 और चीन में 632 किमी पड़ती है।भारत के 61किमी में 30 किमी असम में और अरुणाचल प्रदेश में 31 किमी है।असम में पड़नेवाली स्टीलवेल सड़क की स्थिति बेहद अच्छी है।पर भारत की सीमा से म्यांमार के पांगसू पास तक सड़क का निर्माण दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ ही नहीं है।इसलिए गांव की टूटी-फूटी कच्ची सड़क जैसे हालात हैं।
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एलायड फोर्स के जाने के लिए असम के लिडू से चीन के कुनमिंग तक स्टीलवेल रोड का निर्माण हुआ था।अब इसे लुक ईस्ट पालिसी के तहत फिर खोले जाने की मांग उठ रही है।इससे दक्षिण एशिया के साथ पूर्वोत्तर का व्यापार वाणिज्य का मार्ग खुल जाएगा।पूर्वोत्तर के राज्यों का विकास होगा।पर इसके पहले यहां आतंकियों का सफाया जरुरी है।दुर्गम इलाके के कारण लोगों की आवाजाही कम होने के चलते इन इलाकों में आतंकियों का जमावड़ा है।सर्वविदित है कि अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग में नगा आतंकी संगठन एनएससीएन का दबदबा है।
मुझे डर सता रहा था कि पासपोर्ट -वीजा न होने के कारण कहीं विदेश की धरती पर जाने के कारण गिरफ्तार कर न लिया जाऊं।साथ ही पहाड़ से आतंकी हमला न हो जाए।पर कई घंटे म्यांमार में गुजारकर हम बिना कोई परेशानी के लौट आए।

Wednesday, June 10, 2015

शाबास इंडिया,शाबास मोदीजी

राजीव कुमार

भारतीय सेना ने म्यांमार के घने जंगलों में प्रवेश कर आतंकियों को मार गिराया है।यह मणिपुर में सेना पर हुए हमले के बदले में की गयी कार्रवाई है।आतंकवाद देश को नुकसान कर रहा है।इसमें कोई संदेह नहीं।वर्ष 2003 में केंद्र में जब भाजपा नीत राजग की सरकार थी तब भी ऐसा ही कड़ा रुख देखा गया था।भूटान में आपरेशन आल क्लीयर चला और भूटान से असम के आतंकियों का सफाया किया गया।अब फिर केंद्र में भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार है और कड़ा रुख सामने देखने को आ रहा है।सोशल मीडिया में भी सेना की इस कार्रवाई की जमकर तारीफ हो रही है।
आपरेशन आल क्लीयर के दौरान भारतीय सेना ने भूटानी सेना के साथ मिलकर दक्षिण भूटान में 30 आतंकी शिविरों को ध्वस्त किया था।इनमें उल्फा के 13,एनडीएफबी के 12 और केएलओ के पांच शिविर थे।तब तत्कालीन सेना प्रमुख एनसी विज ने कहा था कि हमने लगभग 650 आतंकियों को निष्प्रभावी कर दिया है यानी कुछ मारे गए और कुछ पकड़े गए।पकड़े गए कई आज मुख्य़धारा में शामिल होकर सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं।इसके बाद बांग्लादेश के साथ संबंध बेहतर हुए तो वहां रहनेवाले अनेक आतंकी नेताओं को भारत के हवाले किया गया।आज दोनों पड़ोसी देशों में पूर्वोत्तर के आतंकी संगठनों का पहले जैसा जमावड़ा नहीं।पहले तो ये आतंकी असम में बड़ी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देकर सीधे पड़ोसी भूटान या बांग्लादेश की सीमा में जा घुसते थे।पर आज वहां शिविरों के न रहने से इस तरह की घटनाएं न के बराबर हो रही है।
मणिपुर में आतंकी संगठन एनएससीएन(के) ने हमला कर 18 सेना जवानों की नृशंस हत्या कर दी।कारगिल के बाद सेना को सबसे बड़ा झटका था।सभी ने इस आतंकी हमले की निंदा की।कठोर कार्रवाई की बात कही गयी।कठोर कार्रवाई भी हुई।सेना ने आतंकियों को म्यांमार में घुसकर मारा।यह देश की विदेश नीति की सफलता मानी जाएगी।पूर्वोत्तर के अधिकांश आतंकी संगठन भूटान और बांग्लादेश में सफाए के बाद म्यांमार को अपनी शरणस्थली बनाए हुए थे।पर भारत ने अब पड़ोसी देशों के साथ जो संबंध बनाने शुरु किए हैं उससे भूटान में पहले ही,बाद में बांग्लादेश और अब म्यांमार में आतंकियों का सफाया शुरु हो गया।निसंदेह यह राजग सरकार की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।पूर्वोत्तर में जो आतंकी गतिविधियां चल रही है उससे विकास के कार्यों को करने में दिक्कत आ रही है।विकास का पैसा आतंकियों के पास चला जाता है।थोड़फोड़ की गतिविधियों को अंजाम देकर ये जानमाल को नुकसान पहुंचाते हैं।यदि आतंकी गतिविधियों को पूरी तरह विराम लग गया तो पूर्वोत्तर देश का एक अहम पर्यटन क्षेत्र होगा।
भारतीय सेना की बदले की कार्रवाई से आतंकियों और आतंक को बढ़ावा देनेवाले देशों को कड़ा संदेश गया है।यदि भारत सरकार इस तरह कड़ा रुख अख्तियार करती रही तो आतंकियों और इन्हें बढ़ावा दे रहे देशों को सोचने को मजबूर होना होगा।म्यांमार में आतंकियों का सफाया होने के बाद पूर्वोत्तर में आतंक खत्म होने के कगार पर होगा।क्योंकि अब भारत के पूर्वोत्तर राज्यों से सटे देशों के साथ संबंध अच्छे हुए हैं।वे इन आतंकियों को शरण देने से कतराएंगे।यदि किसी ने चोरी-छिपे प्रवेश पा भी लिया है तो वहां भारत की सेना के हमले का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।
भारत सरकार सीमाओं को पूरी तरह सुरक्षित करने की कोशिश में लगी है।आज से कुछ साल पहले मैंने अरुणाचल प्रदेश के फांग्सूपास से म्यांमार में प्रवेश किया तो कोई रोकटोक नहीं देखी।घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हुए हम स्टीलवेल सड़क से म्यांमार में प्रविष्ट हुए।काफी अंदर चले गए।इससे वहां की सुरक्षा व्यवस्था का खोखला स्वरुप सामने आता है।लेकिन अब केंद्र की मोदी सरकार ने भारत से लगनेवाली म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा को चाक-चौबंद करने का फैसला किया है।इस पर सुझाव देने के लिए एक टास्क फोर्स का गठन किया है।खुली सीमा के कारण आतंकी वहां से आसानी के साथ आते-जाते हैं।साथ ही ड्रग्स व हथियारों की तस्करी होती है।म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा एक्ट ईस्ट पालिसी के लिए भी सुरक्षित होनी जरुरी है।टास्क फोर्स अगले एक महीने में अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप देगी।
केंद्र की मोदी सरकार के इस तरह के कदमों से निश्चय ही पूर्वोत्तर का भला होगा।उन्होंने लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान कहा था कि पूर्वोत्तर के आठ राज्य अष्ठलक्ष्मी हैं।सही अर्थों में वे अपने नेतृत्ववाली सरकार के जरिए कार्य कर यह साबित कर दें तो इतिहास के पन्नों में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।पूर्वोत्तर के पास अपार संसाधन हैं,लेकिन आतंकवाद के चलते वह देश के अन्य हिस्सों की तुलना में आगे नहीं बढ़ पाया।पर देर नहीं हुई है।अब भी इसे किया जा सकता है।

Thursday, June 4, 2015

हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता: देश नहीं,वोट बैंक प्राथमिकता


राजीव कुमार

भाजपा पहले से ही बांग्लादेश से आए हिंदुओं के शरण के पक्ष में रही है।लेकिन अब इस समुदाय के वोट से भाजपा को कई सीटें हथियाते देख कांग्रेस भी इन्हें शरण दिए जाने का पक्ष लेने लगी है।इससे साफ होता है कि इन सबके लिए देश प्राथमिकता नहीं,अपनी राजनीति की दुकान चलाना प्राथमिकता है।
देश में ऐसे ही जनसंख्या विस्फोट हो चुका है।लोगों को काम पाने और दो जून की रोटी का जुगाड़ करने मारा-मारी करनी पड़ रही है।जमीन का संकट उत्पन्न हो गया है।इन सब की फ्रिक हमारे राजनेताओं को नहीं है।देश में और लोगों को लाकर ये समस्या बढ़ाना चाहते हैं ताकि अपनी रोटी मजे से सेक सकें।
भाजपा का तर्क है कि बांग्लादेश में अत्याचार का सामना कर भारत आए हिंदू लोगों को शरण के साथ नागरिकता प्रदान की जानी चाहिए।इस पूरे मसले को मानवीय दृष्टिकोण से देखने की बात भाजपा कहती है।तब फिर संदिग्ध बांग्लादेशियों के खिलाफ विदेशी न्यायाधिकरण में मामला चलाने और उनकी शिनाख्त के लिए इतना तामझाम कर खर्च करने की जरुरत ही नहीं है।न्यायाधिकरण में मामला लड़ने के लिए पैसे खर्च कर बांग्लादेशी करार दिए गए अनेक व्यक्ति आज भी डिटेंशन कैंपों में रहने को मजबूर हैं।फिर उन्हें यह पीड़ा क्यों दी गई।
असम में बांग्लादेश से आए अनेक हिंदू और मुस्लिम परिवार रहते हैं।विदेशी न्यायाधिकरण द्वारा विदेशी करार दिए गए फरार लोगों की जो सूची असम पुलिस की सीमा शाखा ने हाल ही में प्रकाशित की है उसमें बंगाली हिंदू और मुसलमानों लोगों की भरमार है।असम की बराक घाटी और कई विधानसभा सीटों के नतीजों में इनकी अहम भूमिका होती है।पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने बांग्लादेश में सताए गए और असम आए लोगों को भारत में शरण देने का मुद्दा उठाया था।इसके चलते कांग्रेस को बराक घाटी की 14 में से 13 सीटें मिली थी।गोगोई सताए गए सिर्फ हिंदू लोगों की बात नहीं कर रहे थे।लेकिन अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अंजन दत्त ने बांग्लादेश में सताए जाने के चलते आए हिंदू लोगों को शरण दिए जाने की बात कह दी है।यानी कांग्रेस व भाजपा एक ही नाव पर सवार हो गए हैं।
असम में विदेशी खदेड़ने के लिए छह साल तक आंदोलन हुआ था।सरकार के साथ असम समझौता हुआ।इसमें स्पष्ट लिखा है कि 25 मार्च 1971 के बाद जो भी आया है,उसे जाना होगा।सभी को यह मान्य है।अब इसके आधार पर ही राष्ट्रीय नागरिक पंजी(एनआरसी) के अद्यतन का कार्य किया जाएगा।यदि अभी तक के सताए बांग्लादेशियों को लेना है तो फिर असम समझौते को कुचला जाएगा।एनआरसी का तामझाम करने की जरुरत ही नहीं है।देश के राजनेताओं का दोगलापन साफ झलकता है।
सवाल उठता है कि यदि बांग्लादेश से आए हिंदू को लेने के लिए मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहते हैं तो म्यांमार से आए रोहंगिया और बांग्लादेश के चकमा लोगों के प्रति आपका भेदभाव क्यों?क्या हिंदू बंगाली आपके वोट बैंक हैं इसलिए ? भाजपा के नेतृत्ववाली केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूरे विश्व में डंका बजने की बात प्रचारित हो रही है।बांग्लादेश पड़ोसी देश है।भारत के साथ फिलहाल अच्छे संबंध हैं।प्रधानमंत्री वहां जा रहे हैं।तब बांग्लादेश में हिंदुओँ को सताने का मसला क्यों नहीं उठाया जाता।अंतरराष्ट्रीय किसी मंच पर बांग्लादेश में हिंदुओं के सताने का मसला फिलहाल उठते नहीं दिखा है।ऐसे में बांग्लादेश के लोगों को देश में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।यह सरासर गलत है ।यदि ऐसा किया जाता है तो सीमा सील करने के लिए अरबों रुपए खर्च करने की जरुरत ही नहीं है।न ही विदेशी न्यायाधिकरणों की जरुरत है और न ही किसी को डिटेशन कैंप में रखने की और न ही अखबारों में विज्ञापन देकर फरार हुए बांग्लादेशियों के नामों को प्रकाशित करने की।न ही मतदाता सूची में किसी के नाम के आगे डी यानी डाउटफुल लगाने की।