Sunday, August 26, 2012

असम हिंसाःवजह लोभ व भ्रष्टाचार

राजीव कुमार

लोभ व भ्रष्टाचार जब तक रहेंगे देश में विशेषकर असम में शांति नहीं होगी।लोभ है तो भ्रष्टाचार होगा।भ्रष्टाचार होगा तो संपूर्ण विकास का फायदा लोगों तक नहीं पहुंचेगा।इसलिए देश में लोगों के मन से लोभ पूरी तरह खत्म करना होगा।यह खत्म होने के बाद भ्रष्टाचार नहीं होगा।भ्रष्टाचार नहीं होगा तो गलत कार्य नहीं होंगे।सबको बराबर अपना हक मिलेगा।
असम में चल रही हिंसा की गहराई से पड़ताल करने के बाद मुझे यही लगता है।राजनेता इस मुद्दे पर राजनीति कर रहे हैं।कोई इनके पीछे बांग्लादेशी घुसपैठ को वजह मानता है तो कोई इलाके में मौजूद अवैध हथियारों को इनकी वजह बता रहा है।लेकिन इन सबके पीछे लोभ व भ्रष्टाचार ही प्रमुख है।
आइये सीधे मुद्दों की तरफ आते हैं।पहला,भारत-बांग्लादेश सीमा से घुसपैठ होती है।चंद पैसों के एवज में देश में विदेशी घुस आते हैं।घुसने के बाद यहां फैले भ्रष्टाचार की वजह से ये लोग राशन कार्ड हासिल करते हैं,मतदाता सूची में नाम दर्ज कराते हैं और भारतीय दिखने के लिए जरुरी सारे कागजात हासिल कर लेते हैं।एक भारतीय ही चंद रुपयों के लिए इन्हें यह मुहैया कराता है।उसे देश की चिंता नहीं है।उसे तो सिर्फ अपनी चिंता है।उसे लोभ है।इसलिए वह भ्रष्टाचार के जरिए गलत को भी सही करता है।
दूसरा,केंद्र असम को विकास के लिए राशि मुहैया कराता है।लेकिन इसमें भ्रष्टाचार होता है।राजनेता वोट खरीदने के लिए अपना खर्च निकालने और अधिकारी धनवान बनने विकास की रकम का अधिकांश गटक जाते हैं।विकास सही नहीं होता।कुछ के पाकेटों तक सीमित रहता है।इससे समाज में भेद नजर आते हैं।कोई गरीब है तो गरीब ही रह जाता है और कोई आंखों के सामने लखपति से अरबपति बनता है।जब वंचित लोग इसे देखते हैं तो उन्हें गुस्सा आता है।उन्हें रोजगार नहीं मिलता।तब वे बंदूक उठाते हैं और उग्रवाद के रास्ते पर जाते हैं।हिंसा करते हैं।सरकार से बातचीत होती है और समझौता।हिंसा और लूट के बावजूद समझौते में इनके सारे खून माफ हो जाते हैं।फिर ये राजनेता बन जाते हैं।इनका राजनेतावाला धंधा शुरु हो जाता है।इस तरह क्रमवर सिलसिला चलता रहता है।यानी सब अपनी-अपनी दुकान चलाते हैं।तब फिर इस देश का भला कैसे होगा ?
असम के बोड़ोलैंड की हिसा पर अब आते हैं।छह साल के असम आंदोलन के बाद 1985 में असम समझौते हुआ।असम आंदोलन में शिरकत करनेवाले बोड़ो नेताओं को लगा कि असम आंदोलन के बाद असम समझौता कर असमिया युवक सत्ता पा सकते हैं तो हम क्यों नहीं ?क्योंकि बोड़ो नेता अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे।इन्होंने तब अलग बोड़ो राज्य की मांग में आंदोलन शुरु कर दिया।हिंसा हुई और बोड़ो स्वशासी परिषद के लिए समझौता हुआ।आंदोलन करनेवाले नेता ही परिषद की सत्ता पर काबिज हुए।लेकिन धांधली के आरोप में परिषद को भंग किया गया तो इन लोगों ने फिर अलग संगठन बनाकर हिंसक आंदोलन किया।फिर केंद्र से समझौता हुआ और केंद्र ने परिषद की झोली में कुछ और डाल दिया।सत्ता आई।भ्रष्टाचार हुआ।एक धड़ा अपने को ठगा महसूस कर हिंसक कार्य जारी रखे हुए है।वह अलग संप्रभु राष्ट्र की मांग करता है ताकि समझौता होने पर इस बार राज्य मिल ही जाए।सभी बोड़ो नेता अलग राज्य की मांग का समर्थन करते हैं।
पर इस अलग बोड़ो राज्य में बाधा यह है कि उस इलाके में बोड़ो आबादी 50 प्रतिशत से कम है।इसलिए इनका मकसद उस इलाके में रह रहे गैर बोड़ो समुदाय को हटाना।इसके लिए अलग-अलग दंगे किए गए।कभी आदिवासियों को निशाना बनाया गया तो कभी मुसलमानों को।इसलिए अलग राज्य न दिए जाने तक यह निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया हो गई है।हिंसा पूरी तरह नहीं थमेगी।कारण विभिन्न गुटों में बंटे राजनेता अपनी-अपनी दुकान चलाने इन्हें उकसाकर अपना उल्लू सीधा करते रहेंगे।
यदि सरकार गंभीर होती और उसे पूरी तरह यह खात्मा करना होता तो पहला काम इलाके में जितने भी अवैध हथियार हैं उन्हें जब्त करना था।विभिन्न पक्ष इसकी मांग कर रहे हैं।लेकिन ऐसा अब तक नहीं किया गया है।क्यों ? यदि ऐसा किया गया तो समस्या खत्म होगी।समस्या खत्म होने पर इनकी दुकान नहीं चलेगी।सो,खून इनके लिए साधारण निर्दोष लोगों का बहता रहेगा।इससे इनको कोई फर्क नहीं पड़ता।

Monday, June 20, 2011

असम में अब उग्रवाद से नहीं,अंधविश्वास से हो रही है हत्याएं

राजीव कुमार
असम में अब उग्रवाद से कहीं ज्यादा हत्याएं अंधविश्वास से हो रही है।राज्य की कांग्रेस सरकार स्वास्थ्य सेवा में आमूल-चूल परिवर्तन का दावा करती है,पर हकीकत इससे कोसों दूर है।अंदरुनी गांवों में आज भी बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया नहीं है।इसके कारण लोग कविराज की झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं।कविराज जब रोगी को स्वस्थ नहीं कर सकता तो किसी को डायन बताकर उसके चलते ऐसा हो रहा है,यह कह देता है।रोगी के परिजन को यह कह दिया जाता है कि इस डायन के रहते रोगी ठीक नहीं हो सकता यानी उसको इस दुनिया से ही रवाना कर देना है।इन सबके चलते ही बोड़ो बहुल इलाकों में डायन बताकर महिलाओं की निरंतर हत्याएं हो रही है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस बात को गंभीरता से लिया है।आयोग ने कोकराझाड़ जिले में अप्रेल महीने में छह महिलाओं की हत्या से संबधित रिपोर्ट जिले के पुलिस अधीक्षक को चार हफ्ते में देने को कहा है।पर इससे समस्या का खात्मा नहीं होगा।2001 में कोकराझाड़ जिले के थाइगारगुड़ी में डायन बताकर एक दंपत्ति की हत्या हुई तो असम पुलिस ने इस कुप्रथा के खात्मे के लिए प्रोजेक्ट प्रहरी नामक एक योजना शुरु की।योजना का मकसद था गांवों में स्वास्थ्य सेवा मुहैया करा अंधविश्वास को दूर करने के लिए जागरुकता फैलाना।पर दस साल बाद भी कोई सफलता हाथ नहीं लगी।आज भी डायन हत्याएं जारी है।

उदालगुड़ी जिले के माजबाट से बीस किमी दूर अरुणाचल सीमा से सटा है टिक्रीटिला बादानगुड़ी गांव।गांव के लोग शिक्षा व स्वस्थ सेवा से वंचित हैं।गांव के धरनीधर बसुमतारी की पत्नी मंजु बसुमतारी ने छठी बार संतान को जन्म दिया और इसके तीन हफ्ते बाद अस्वस्थ हो गई।धरनी ने इलाज के लिए कविराज का सहारा लिया।पर इससे फायदा नहीं हुआ और बसुमतारी की सात बीघा जमीन साढ़े पंद्रह हजार रुपए में बंधक चली गई।जब कविराज धरनी की पत्नी को ठीक नहीं कर पाया तो उसने पल्ला झाड़ने के लिए कह दिया कि पड़ोस की तीन महिलाएं डायन है।इन लोगों के झाड़-फूंक के कारण मंजु ठीक नहीं हो रही है।इसके चलते धरनी ने गांव के कुछ लोगों के साथ मिलकर जोगेन बोड़ो और उसकी पत्नी को मौत के घाट उतार दिया।पर गैर सरकारी संगठन वूमेन जस्टिस फोरम के सहयोग से बाद में धरनी की पत्नी को अस्पताल में भर्ती कराया गया तो पता चला कि महिला के शरीर में खून नहीं है।साथ ही वह ह्रदय रोग से पीड़ित है।मंजु की शादी 14 साल में हो गई और पिछले दस सालों में उसने छह संतानों को जन्मा है।अब मेडिकल इलाज से मंजु स्वस्थ है।

अब धरनी को पूरी तरह विश्वास हो गया कि डायन नाम की कोई चीज नहीं है।तंत्र-मंत्र और झाड़-फूंक बेकार की बातें हैं।अब वह इस कुप्रथा के खिलाफ सजगता फैलाएगा।धरनी के गांव में कोई अस्पताल नहीं है।इलाज के लिए 15-20 किमी का सफर तय करना पड़ता है।इसके चलते गांव के लोग सहज ही झाड़-फूंकवाले के चक्कर में पड़ जाते हैं।शिक्षा के नाम पर एक प्राथमिक विद्यालय है।पर इसमें भी नियमित कक्षाएं नहीं होती।

वूमेन जस्टिस फोरम की अध्यक्ष अंजलि दैमारी का कहना है कि जो अंधविश्वास के चलते लोगों की हत्याएं करते हैं उनके खिलाफ पुलिस प्रशासन को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।साथ ही असम पुलिस के प्रोजेक्ट प्रहरी को अधिक कारगर ढंग से लागू करनी चहिए।असम पुलिस के महानिदेशक शंकर बरुवा का कहना है कि हम इस कुप्रथा से निपटने के लिए राज्य महिला आयोग और गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर कार्य करने को इच्छुक हैं।पुलिस का राज्यभर में विस्तृत नेटवर्क है और यह इस कुप्रथा की रोकथाम में कारगर हो सकता है।बरुवा ने जिला पुलिस को निर्देश दिया है कि वे इस ओर कार्य करनेवाले संगठनों को मदद करे।अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक तथा प्रोजेक्ट प्रहरी के जनक कुल सैकिया ने कहा कि इस पर विचार विमर्श के बाद कठोर कानून लाने की जरुरत है।ला रिसर्च इंस्टीट्यूट की निदेशक जेउति बरुवा का कहना है कि कानून लाकर सती और बाल विवाह पर अंकुश लगाया जा सकता है तो राज्य में जारी डायन हत्याओं पर कानून लाकर अंकुश लगाया जा सकता है।

एक समय था जब राज्य में उग्रवाद के चलते हर रोज किसी की हत्या होती थी,पर अब स्थितियां बदल गई है।अंधविश्वास की जकड़न राज्य में अब भी इतनी गहरी है कि लोग मेडिकल इलाज कराने के बदले झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं और किसी को डायन बताकर हत्या कर देते हैं।राष्ट्रीय स्वास्थ्य ग्रामीण मिशन के तहत करोड़ो खर्च कर राज्य की स्वास्थ्य सेवा बेहतर करने की कोशिश हो रही है।पर गांवों में जिस तरह लोग अब भी झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं और जिस तरह अंधविश्वास की जकड़न में है उससे नहीं लगता कि मिशन का फायदा हुआ है।विज्ञान के युग में और आजादी के 63 साल बाद भी स्थिति में बदलाव न होना शर्मनाक है।(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

लेखक का पता-
राजीव कुमार
एम-23 प्रागज्योति हाउसिंग कांपलेक्स सोसाइटी,
एस बी रोड,खानका मस्जिद के पास,
घोरामोरा,गुवाहाटी-28
मोबाइल-9435049660

Friday, June 4, 2010

पत्र में उलझी अल्फा वार्ता

राजीव कुमार
असम आतंकवाद प्रभावित राज्य है।लेकिन अब स्थिति में तेजी से बदलाव आ रहा है।लेकिन राजनीतिक दाव-पेंच के चलते समस्याएं पूरी तरह सुलझ नहीं पा रही है।
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार आई तो उसने असम के आतंकी संगठन यूनाईटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम(अल्फा) और नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोडोलैंड(एनडीएफबी) के शीर्ष नेताओं को पकड़ा और उन्हें भारत के हवाले किया।इनमें अल्फा के चेयरमैन अरविंद राजखोवा और एनडीएफबी के चेयरमैन रंजन दैमारी शामिल है।
असम के लिए यह एक अच्छी बात हुई।कारण बांग्लादेश में रहकर ये नेता असम के लिए परेशानी पैदा कर रहे थे।गिरफ्तार होने के बाद इनके तेवर नरम पड़ गए हैं।ये अब सरकार से बातचीत करना चाहते हैं।केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदबंरम की सलाह पर असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने राज्य कैबिनेट की बैठक कर इन संगठनों से बातचीत करने का औपचारिक फैसला किया।
यहां तक सब कुछ ठीक था।पर जेल में बंद अल्फा नेताओं से बातचीत के बाद जमानत पर रिहा होकर बातचीत की कोशिश में लगे संगठन के उपाध्यक्ष प्रदीप गोगोई ने कहा कि सरकार हमसे बातचीत को इच्छुक है,यह बात बताने के लिए हमें एक पत्र देना चाहिए।इस पर मुख्यमंत्री ने भी कहा कि वे बातचीत को इच्छुक है ,इसका पत्र सरकार को दे।यानी एक पत्र की बात को लेकर वार्ता में अब गतिरोध आ गया है।कोई असम की एक बड़ी समस्या को सुलझाने के लिए छोटा होने को तैयार नहीं है।
वार्ता के लिए फिलहाल कोशिश में लगे असम के बुद्धिजीवी डा.हिरेन गोहाईं का कहना है - ‘मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद हम उनसे मिले थे तो उन्होंने इस तरह के किसी पत्र की बात नहीं की थी।अचानक यह कैसे आ गई।‘मुख्यमंत्री वार्ता को लेकर बार-बार बयान बदल रहे हैं।इसलिए ही वार्ता में गतिरोध आ रहा है।लगता है कि वे समस्या से राजनीतिक खेल, खेल रहे हैं।जब संगठन के ज्यादातर नेता सरकार के कब्जे में हैं तब इस तरह की पेचिदगियां पैदा करना सही नहीं।
लगता है गोगोई अगले साल मार्च-अप्रेल में होनेवाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर अपने फायदे के लिए उचित समय के इंतजार में इस तरह की समस्याएं पैदा कर रहे हैं।राजनेताओं के इस तरह अपने फायदे की रोटी सेंकने के कारण ही देश में अनेक समस्याएं उत्पन्न होती हैं और समस्याएं ही बनकर रह जाती है।यह बात इससे भी साबित होती है कि जब केंद्रीय गृहमंत्री चिदबंरम आए तभी बांग्लादेश ने असम के वहां रह रहे शीर्ष नेताओं को प्रत्यपर्ण संधि न रहने के बाद भी अलग रास्ता अपनाकर इन्हें भारत के हवाले कर दिया।
चिदबंरम के कामकाज में एक सख्ती है।वे राजनीतिक हस्तक्षेप को बहुत कम कबूलते हैं।इसका नतीजा ही असम के लिए आई सफलता है।मुख्यमंत्री को चिदबंरम का यह रवैया पसंद नहीं।इसलिए गोगोई कभी-कभी कहने से हिचकते नहीं कि गृहमंत्रालय जो कहेगा वही होगा।एकसमय गोगोई अल्फा से चिट्ठी की मांग कर रहे थे तो केंद्रीय गृहसचिव जी के पिल्लै ने कह दिया कि चिट्ठी की कोई आवश्यकता नहीं है।इसके बाद गोगोई ने कहा कि मंत्रालय को चिट्ठी नहीं चाहिए तो वैसे ही होगा।
इससे साफ होता है कि राजनेता ठान लें कि समस्याएं खत्म करनी है तो उनके लिए इन्हें खत्म करना कोई मुश्किल बात नहीं।पर वे अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस तरह की समस्याएं खुद पैदा कर इन्हें तब तक जिंदा रखते हैं जब तक इनका मकसद पूरा न हो जाए।जब सरकार वार्ता के लिए आगे बढ़ने का एलान करती है तो आलोचना के इरादे से विपक्षी पार्टियां कहती है कि अल्फा के कमांडर-इन-चीफ परेश बरुवा के बिना बातचीत सफल नहीं हो सकती है।उसे भी लाना चाहिए।अच्छी बात है।पर कोई न आए और पकड़ने में भी सफलता न मिले तो कब तक इंतजार किया जाए।
देर करना अब असम के हित में नहीं है।कारण माहौल बदला है।लोगों में पहले जैसा भय नहीं।निवेश हो रहा है।शिक्षा में बेहतर नतीजे आने लगे हैं।समस्या का पूरा अंत हो जाने से असम देश का सबसे विकसित राज्य बन जाएगा।यहां लोगों को रोजगार के ढेरों अवसर मिलेंगे।पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।इसलिए मुख्यमंत्री गोगोई को पत्र के चक्कर में समय बर्बाद न कर जल्द से जल्द बातचीत कर समस्या को खत्म करना चाहिए। (लेखक गुवाहाटी स्थिति वरिष्ठ पत्रकार और पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)
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Tuesday, May 11, 2010

खत्म हो रही है राष्ट्रीयता की भावना

राजीव कुमार

देश के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना में कमी आई है।वे काफी संकुचित सोचने लगे हैं।यही वजह है कि अलगाववाद पनपता है और हिंसक गतिविधियां होती है।उन्हें सिर्फ अपने आस-पास की चिंता है,न कि पूरे देश को एक सूत्र में पिरोकर के रखने की।
नगा आतंकी संगठन एनएससीएन(आईएम) के महासचिव टी मुइवा ने अपने मणिपुर के जन्मस्थान का दौरा करने की बात केंद्र से कही।केंद्र ने इस पर हरी झंडी दिखा दी।लेकिन मणिपुर की सरकार को इस पर आपत्ति है।उनका मानना है कि मुइवा के दौरे से राज्य में हिंसा होगी।स्थानीय लोगों और सरकार को लगता है कि मुइवा के दौरे से मणिपुर के विखंडित होने का खतरा है।इसलिए मणिपुर सरकार ने मुइवा के घुसने पर रोक लगा दी।माओ में मुइवा का काफिला रुक गया।यह मुइवा के मणिपुर में घुसने का प्रवेश द्वार था।स्थिति को विकट देखते हुए केंद्र सरकार ने मुइवा को यात्रा स्थगित करने का अनुरोध किया।किंतु इस बीच माओ में सुरक्षा बलों के हाथों दो एनएससीएन समर्थक मारे गए।मुइवा को मणिपुर में न घुसने देने और दो समर्थकों के मारे जाने के विरोध में एनएससीएन समर्थकों ने राष्ट्रीय राजमार्ग 39 अवरुद्ध कर दिया।इसके चलते मणिपुर में अत्यवश्कीय सामग्री का संकट पैदा हो गया।मणिपुर के नौ नगा विधायकों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।इससे साफ हो गया कि हम संकीर्ण विचारधारा के हो गए हैं।

केंद्र जहां नगा समस्या के समाधान के लिए प्रयासरत है,वहीं वह इससे उत्पन्न होनेवाली स्थितियों को लेकर चिंतित नहीं।जब एनएससीएन के साथ संघर्षविराम का दायरा मणिपुर तक किया गया था तब मणिपुर जल उठा था।इसलिए इस बार मुइवा को उनके जन्मस्थल जाने की अनुमति देने के पहले केंद्र को सोचना चाहिए था।
एनएससीएन वृहत्तर नगालैंड की मांग कर रहा है।इसमें असम,अरुणाचल और मणिपुर के इलाके भी शामिल हैं।ऐसे में मुइवा अपने समर्थकों के हुजूम के साथ अपने जन्मस्थल जाएंगे तो मणिपुर के लोगों का शंकित होना स्वाभाविक है।मणिपुर के लोग शंका में हिंसा करेंगे तो प्रदेश सरकार का भी शंकित होना लाजिमी है।पहले के आधार पर मणिपुर के मुख्यमंत्री ओ इबोबी ने एलान किया कि वे मुइवा को राज्य में नहीं घुसने नहीं देंगे।दिल्ली की नींद तब टूटी और उसने इबोबी को दिल्ली बुलाया।पर वहां भी इबोबी अपनी पार्टी की सरकार की बात भी मानने को तैयार नहीं हुए।अब भी गतिरोध बना हुआ है।
इस गतिरोध के कारण मणिपुर के लोगों को भुगतना पड़ रहा है।राज्य में पेट्रोल,डीजल,आक्सीजन और जीवन रक्षक दवाइयों का संकट पैदा हो गया है।नगालैंड के पुलिस महानिदेशक ने मणिपुर के पुलिस महानिदेशक से कहा है कि जब तक स्थिति में सुधार नहीं हो जाता तब तक मणिपुर के वाहनों को नगालैंड से न गुजरने दिया जाए।मणिपुर सरकार ने इस स्थिति से निपटने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से हस्तक्षेप की मांग की ताकि सुरक्षा के बीच वाहन मणिपुर आ सकें।बात यही नहीं खत्म हो जाती।नगालैंड की कैबिनेट ने इबोबी सरकार की मुइवा को मणिपुर में घुसने से रोकने के कारण निंदा की तो मणिपुर कहां पीछे रहता।मणिपुर सरकार ने भी कहा कि नगालैंड सरकार उसके आंतरिक कामकाज में हस्तक्षेप कर रही है।
यह कड़वाहट इस स्तर तक पहुंच गई है जैसे यह एक देश का मसला न होकर दूसरे देश के साथ विवाद का मसला हो।राजनेताओं के अपनी रोटी सेंकने के चक्कर में देश को इस तरह टुकड़ों में बांट दिया कि अब लोग इनसे ऊपर नहीं उठ पाते हैं।एक लड़का एक जिले से दूसरे में सरकारी नौकरी पाता है तो बवाल मचता है।मुंबई में उत्तर भारत के लोग काम के लिए पहुंचते हैं तो नवनिर्माण सेना को आपत्ति होती है।वह इनसे मारपीट करती है और चले जाने को कहती है।पूर्वोत्तर में हालत इससे भिन्न नहीं।
देश के लोगों को इस संकीर्णता से निकलने की जरुरत है।यदि नहीं निकले तो एक दिन ऐसा आएगा जब हम अपने देश में बेगाने होंगे।सिर्फ हमें अपने इलाके में सिमट कर रह जाना पड़ेगा।जब हम आधुनिकता की सभी सुविधाएं इस्तेमाल कर रहे हैं तब इस संकीर्ण दायरे में रहना यही साबित करेगा कि हम अब भी सभ्य नहीं हुए हैं।समय तेजी के साथ बदल रहा है।हमें भी इसके साथ-साथ कदम बढ़ाते हुए आगे चलना चाहिए ताकि हम भी प्रगति की राह पर चल सकें।छोटी-छोटी बातों को लेकर लड़ना-झगड़ना अच्छी बात नहीं।
मणिपुर में देश के सबसे ज्यादा आतंकी संगठन है।वहां हिंदी सिनेमा दिखाने पर पाबंदी है।आतंकी समानातंर सरकार चलाते हैं।पड़ोसी नगालैंड में भी हालत कुछ ऐसे ही हैं।वहां एनएससीएन की समानातंर सरकार चलती है।इनसे आम आदमी का भला नहीं होता।चंद नेताओं और आतंकी संगठन के नेता अपना पाकेट भरते हैं।आम आदमी तो अभिशप्त जीवन जीने को बाध्य है।इसलिए उसे ही इनके खिलाफ कमर कसनी होगी।नहीं तो राजनेता और आतंकी गुटों के नेता इनके खून की होली खेलते रहेंगे।(लेखक पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)

Friday, December 12, 2008

चुनाव:मिजोरम से है सीखने की जरुरत

मिजोरम देश का एक छोटा राज्य है।लेकिन विधानसभा चुनाव यहां जिस शांति और कम खर्च में होते हैं, उससे देश के अन्य राज्य को शिक्षा लेने की जरुरत है।न बाहुबली नेता और न पैसा का खेल।लोग सही अर्थों में अपने मताधिकार का निडर होकर प्रयोग करते हैं और इससे जो निकलकर आता है वह राज्य की बेहतरी के लिए होता है।यही वजह है कि मतदान का प्रतिशत अस्सी से अधिक रहा और यहां त्रिशंकु सरकार नहीं बनी।पिछले दस सालों से मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट(एमएनएफ) की सरकार थी।लोगों ने इसे कार्य करने का पर्याप्त मौका दिया।लेकिन यह लोगों की नजर में खरी नहीं उतरी तो इस बार इसका लगभग सफाया कर दिया गया।चालीस में से सिर्फ तीन सीटें ही इसे नसीब हुई।खुद पूर्व मुख्यमंत्री जोरामाथांगा दो सीटों से चुनाव लडक़र हार गए।इससे लोगों के गुस्से का आंकलन किया जा सकता है।मिजोरम में कांग्रेस ने दो तिहाई बहुमत पाया है।यह उसकी भी जीत नहीं है।कारण सामाजिक संगठन मिजोरम पीपुल्स फोरम(एमपीएफ)ने राजनीतिक पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए जो दिशा-निर्देश जारी कि ए उससे लोगों को उम्मीदवारों का चयन करने में सहूलियत हुई।यह उसकी जीत है।कांग्रेस ने लोगों के आशा के अनुरुप कार्य नहीं किया तो लोग आगे उसका हाल भी एमएनएफ की तरह करेंगे।मिजोरम में गिरजाघरों को सबसे अधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।इसके कारण ही एमपीएफ यह मैजिक करने में कामयाब हुआ।एमपीएफ गिरजाघरों और प्रभावशाली एनजीओं का सामूहिक संगठन है।एमपीएफ की महासचिव लालबियाकमाविया नेंगटे ने कहा कि हमारे काम का अंत नहीं हुआ है।पहली बार हम पूरी तरह से वाचडाग की भूमिका में थे,इसमें कुछ त्रुुटियां हुई हंै।हम मिल-बैठकर इन्हें दूर करेंगे ताकि आनेवाले चुनाव में और अच्छा काम कर सकें।एमपीएफ के दिशा-निर्देशों का ही नतीजा है कि मिजोरम के चुनाव में रुपयों और बाहुबल का खेल नहीं हुआ। फिजूलखर्ची वाले भोज,म्यूजिकल बैंड और जनसभाओं के जरिए पिछले विधानसभा चुनाव तक उम्मीदवार वोट मांगा करते थे।लेकिन इस बार यह सब देखने को नहीं मिला।एमपीएफ के दिशा -निर्देशों ने सुनिश्चत किया कि इस चुनाव में मतदाता कोई झांसे में आकर अपने मतदान का गलत इस्तेमाल न कर दे। एमपीएफ के अध्यक्ष रेवेरेंड वनलालोवा ने कहा कि फोरम का उद्देश्य था कि चुनाव राज्य के शांतिपूर्ण माहौल को खराब न करे और मतदान साफ-सुथरे ढंग से संपन्न हो।आगे गिरजाघर और यंग मिजो एसोसिएशन(वाईएमए)उम्मीदवारों के लिए अलग-अलग से दिशा-निर्देश जारी करते थे।इसके चलते कुछ चूक रह जाती थी।पर इस बार पूरा दृश्य भिन्न था।इस बार इन्हें सम्मिलित किया गया है।राजनीतिक पार्टियों के साथ बातचीत कर गिरजाघर और गैर सरकारी संगठनों ने इस बार दिशा-निर्देशों को अंतिम रुप दिया।उम्मीदवारों को मतदाता तक पहुंचने देने के लिए एमपीएफ ने हर विधानसभा क्षेत्र के हर वार्ड में एक मंच उपलब्ध कराया ।प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में पांच से छह वार्ड है और हरेक में दो से तीन हजार तक मतदाता होते हैं।इस मंच पर निर्धारित समय पर उम्मीदवार को अपनी बात कहने का मौका दिया गया ।साथ ही वह अपने और अपनी पार्टी पर लगे आरोपों का जवाब भी दे सकता था।मतदाता को भी उम्मीदवार से सवाल पूछने का समय दिया गया।पिछले चुनावों में इस तरह के मंच कुछ ही विधानसभा क्षेत्र में बनाए गए थे।लेकिन इस बार चीजों को और अधिक संगठित रुप में किया गया।एमपीएफ ही ने ही यह फैसला किया कि कौन-सी पार्टी कितनी रैलियां आयोजित करेगी और रैलियां होगी कहां।कांग्रेस ने प्रधानमंत्री की तीन रैलियां आयोजित करने की बात कही थी,लेकिन उन्हें सिर्फ लूंगलेई और आइजल में रैली करने की अनुमति मिली।मिजोरम में पार्टी के चुनाव प्रचार का कार्य देख रहे कांग्रेस नेता वेद प्रकाश का कहना था कि मिजोरम के चुनाव प्रचार का तरीका देश के अन्य राज्यों में भी अपनाया जाना चाहिए।चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक देवाषीश सेन ने कहा कि देश के अन्य राज्यों में इसका अनुकरण किया जाना चाहिए ताकि अत्याधिक खर्च और गलत तरीकों को रोका जा सके। (लेखक गुवाहाटी स्थित पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)

Friday, November 7, 2008

पहाड़ों की रानी है दार्जीलिंग की टॉय ट्रेन

राजीव कुमार
दार्जीलिंग और जलपाईगुड़ी के बीच चलनेवाली टॉय ट्रेन पहाड़ों की रानी है।कारण जब यह सीटी बजाती हुई आगे बढती है तो सडक़ पर चल रहा वाहनों का काफिला थम जाता है।लोग अपने कानों में हाथ की अंगुलियां डालकर उसे जाते हुए निहराते रहते हैं।दार्जीलिंग से न्यूजलपाईगुड़ी तक का ८७।४८ किमी का सफर यह आठ घंटे में तय करती है।इस दौरान यह १७७ बार बीच सडक़ से गुजरती है।यह सारी मानवरहित क्रासिंगें हैं।पर कहीं कोई दिक्कत नहीं आती।जैसे ही टॉय ट्रेन की सीट सुनाई पड़ती है ,वाहन खुद ब खुद थम जाते हैं।यह इस रास्ते में एक नियम-सा बन गया है।सभी जैसे उसे सलाम कर रहे हों।बच्चे-बड़े हाथ हिलाकर बॉय-बॉय करते हैं।मैंने अक्तूबर की पूजा छुट्टियों में दार्जीलिंग से न्यूजलपाईगुड़ी तक इस ट्रेन में सफर का लुत्फ उठाया।दार्जीलिंग और घूम स्टेशनों के बीच बतासिया लूप आता है।पहाड़ की ऊंचाई पर चढऩे के लिए टॉय ट्रेन एक घुमावदार चक्कर बतासिया लूप पर लगाकर घूम की ओर रवाना हो जाती है।बतासिया लूप के बीचोंबीच वार मेमोरियल बना हुआ है।इसे एक पार्क की शक्ल प्रदान की गई है।जैसे ही टॉय ट्रेन लूप का सफर शुरु करती है,पहले से मौजूद पर्यटक उसकी एक तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहते हैं।सुबह यह जगह स्थानीय लोगों को रोजी-रोटी का जुगाड़ कराती है।टाइगर हिल्स से पर्यटकों को लाकर वाहन यहां उतारते हैं।पांच रुपये की टिकट काटकर जब आप वहां पहुंचते हैं तो वहां खचाखच भीड़ रहती है।गोर्खा वेशभूषा में फोटो खिंचवाने और टेलीस्कोप से कंचनजंघा को निहाराने के अलावा वहां पूरा एक बाजार लगा रहता है।पर टॉय ट्रेन के आने के पहले सबकुछ साफ हो जाता है।इसके बाद घूम स्टेशन है,जो ïवश्व में सबसे शिखर पर रहनेवाला रेलवे स्टेशन है।इसकी ऊंचाई समुद्र तल से ७४०७ फिट है।यहां दार्जीलिंग हिमालयन रेलवे के अब तक के सफर को दर्शाता रेलवे संग्रहालय है।इस आठ घंटे के सफर में पहाड़ों की हरियाली का लुत्फ उठाते हुए और बादलों से खेलते हुए कब सफर खत्म होता है, पता ही नहीं चलता।पूरी यात्रा एक रोमांचक अनुभव है।अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक मार्क टवेन ने इस सफर को तय कर टिप्पणी की थी-यह इतनी मजेदार और रोमांचक यात्रा है कि इसे तो पूरे होने में एक सप्ताह लगना चाहिए। टॉय ट्रेन जब सडक़ के किनारे-किनारे आगे बढ़ती है तो जरुरतमंद स्थानीय लोग दौडक़र इसमें सवार हो जाते हैं और जैसे ही अपना गंतव्य आता है,उतर जाते हैं।धुआं उड़ाती,हुक-हुक करती ट्रेन एक दिन उधर से न गुजरे तो पहाड़ी लोगों का जीवन अधूरा-अधूरा लगता है।यह पहाड़ी लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुकी है।पहले इसे भाप इंजन खींचता था।अब इसका स्थान डीजल इंजन ने ले लिया है।लेकिन पर्यटकों को पुराने दिनों की याद दिलाने घूम और दार्जीलिंग के बीच भाप इंजन की गाड़ी अब भी चलाई जाती है।पर दार्जीलिंग- न्यूजलापाईगुड़ी के बीच चलाई जानेवाली मुख्य ट्रेन को अब डीजल इंजन से चलाया जाता है।लेकिन इसमें भी इस बात का ध्यान रखा गया है कि सीटी की आवाज भाप इंजन की तरह ही रहे।इसके अनोखेपन के कारण यूनेस्को ने दिसबंर १९९९ में इसे विश्व धरोहर का खिताब दिया।यह विश्व की दूसरी रेललाइन थी जिसे यूनेस्को ने यह खिताब दिया।आस्ट्रिया की सिमरिंग माउन्टेन रेलवे पहली विश्व धरोहर रेल लाइन है।

एक समय था जब दार्जीलिंग का सफर सिलीगुड़ी के हिलकार्ट रोड से बैलगाड़ी में बैठ कर तय करना पड़ता था।ईस्टर्न बंगाल रेलवे के एक एजेंट फ्रेंकलीन प्रेस्टेज ने १८७८ में सिलीगुड़ी और दार्जीलिंग के बीच रेल संपर्क की बात सोची।उन्होनें पाया कि यह काफी संभावनापूर्ण है।बैलगाड़ी से जो खर्च बैठता है,वह रेल से आधा रह जाएगा।फ्रेंकलीन ने इस पर पूरी रिपोर्ट बंगाल सरकार को सौंपी।जैसे ही इसे स्वीकृति मिली,उन्होंने दार्जीलिंग स्टीम ट्रामवे का गठन किया।उन्होंने दो फीट आमान का फैसला कर १८७९ में निर्माण का कार्य शुरु किया।सिलीगुड़ी से तीनधरिया की ३० किमी लाइन मार्च १८८० में खोली गई।शुरुआत तत्कालीन वायसराय लार्ड लिट्टन के लिए एक विशेष गाड़ी चलाकर की गई।इस लाइन का विस्तार अगस्त १८८० में कर्सियांग ,अप्रेल १८८१ में घूम तक कर जुलाई १८८१ में यह दार्जीलिंग तक पहुंची।मुख्य मार्ग की शुरुआती लागत १७.५ लाख थी जो बाद में बढक़र १९२० में ४३ लाख तक पहुंची।(लेखक पूर्वोत्तर के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Friday, October 3, 2008

विकास से ही खत्म होगा पूर्वोत्तर का आंतकवाद

राजीव कुमार
पूर्वोत्तर में आंतकवाद एक कुटीर उद्योग बन चुका है।पूर्वोत्तर के राज्यों में अनेक आंतकवादी संगठन सक्रिय हैं।इन्होंने आंतकवाद को एक रोजगार बना लिया है।इसके कारण पूर्वोत्तर राज्य बाहर बदनाम है।कोई भी इन इलाकों में निवेश को आना नहीं चाहता।इलाके में निजी निवेश नहीं होगा तो स्थितियां नहीं बदलेगी।कारण सरकार सभी बेरोजगारों को सरकारी नौकरियां नहीं दे सकती।बाहरी निवेश होगा तो बेरोजगार युवकों को रोजगार के अवसर पैदा होंगे।इससे ही स्थिति में बदलाव हो सकता है।
पूर्वोत्तर में बेरोजगारी एक भयंकर समस्या है।यह खत्म होने पर ही इलाके में आंतकवाद का नामोनिशान मिटेगा।कारण खाली दिमाग शैतान का घर होता है।बेरोजगारों के दिमाग में जब तक यह शैतान घर करता रहा तब तक स्थिति में सुधार की आशा करना बेकार है।बेरोजगारों को रोजगार मिल गया तो इनका दिमाग खाली नहीं रहेगा और न शैतान घर करेगा।केंद्र सरकार ने अब इस बात को शिद्दत के साथ महसूस किया है।इसलिए पूर्वोत्तर में निवेश को बढ़ावा देने के लिए कोशिशें जारी हैं।
जब देश आजाद नहीं हुआ था तो पूर्वोत्तर की स्थिति देश के अन्य हिस्सों से बहुत अच्छी थी।सकल घरेलू उत्पाद दर सबसे ज्यादा थी।लेकिन अब देश के अन्य राज्यों से यह बहुत पिछड़ा हुआ है।आजादी के बाद देश के अन्य राज्यों का जिस तरह विकास हुआ उस तरह पूर्वोत्तर का नहीं हुआ है।दिल्ली से दूर होने के कारण यह वहां बैठे लोगों के दिलों से भी दूर हो गया।इसलिए यहां लोगों के मन में संकीर्णता पैदा हुई।
मणिपुर की भरोत्तोलक मोनिका देवी को साजिश के तहत बीजिंग ओलंपिक में जाने से रोकने का मामला हो, या असम की बाढ़ की समस्या की अनदेखी कर केंद्र द्वारा बाढ़ प्रभावित बिहार को एक हजार करोड़ रुपए का पैकेज देने की बात हो,इन सबसे पूर्वोत्तर के राज्यों के लोगों में असंतोष बढ़ा ही है।यह लोग अपने को अलग-थलग महसूस करने लगे हैं।यदि बेरोजगारी की समस्या को खत्म कर इस तरह के कार्यों से बचा जाए तो पूर्वोत्तर देश के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक होगा।
पूर्वोत्तर में प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं है।यहां साक्षरता दर देश के अन्य राज्यों से अधिक है।इन दोनों के बाद भी इलाका पिछड़ा हुआ है।देश के कुल भौगोलिक इलाके का आठ प्रतिशत ही पूर्वोत्तर है और जनसंख्या में इसका योगदान सिर्फ चार प्रतिशत का है।देश के सकल घरेलू उत्पाद में पूर्वोत्तर का योगदान तीन प्रतिशत का है।प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के दो-तिहाई ही है, जो कि देश में सबसे कम है।इलाके के 35 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं जबकि राष्ट्रीय औसत 26 प्रतिशत है।पूर्वोत्तर के सत्तर प्रतिशत लोग अपना गुजर-बसर कृषि से करते हैं।इससे साफ हो जाता है कि मैनुफैक्चिरिंग और सर्विस सेक्टर में रोजगार के अवसर न के बराबर है।जहां राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी की औसत दर 7.7 प्रतिशत है वहीं पूर्वोत्तर में यह 12 प्रतिशत है।इलाके का शहरीकरण बेहद धीमी गति से हो रहा है।जहां राष्ट्रीय स्तर पर औसत शहरीकरण की दर 28 प्रतिशत है वहीं इलाके की शहरीकरण की दर 15 प्रतिशत है।
परंतु अब केंद्र स्थिति बदलने को आतुर दिखता है।पूर्वोत्तर विकास विभाग के मंत्री मणिशंकर अय्यर और केंद्रीय बिजली राज्य मंत्री जयराम रमेश पूर्वोत्तर की पूरी स्थिति बदलने के लिए जी-जीन से जुटे हैं।सितबंर के मध्य में गुवाहाटी में हुए चौथे पूर्वोत्तर व्यापार सम्मेलन के बाद लगा कि स्थिति बदलनेवाली है।कारण बाहरी लोगों के मन में पूर्वोत्तर के प्रति धारणा बदल रही है।सम्मेलन में देश-विदेश के 1179 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।इनमें विदेश के 97 प्रतिनिधि शामिल थे।कंबोडिया के वाणिज्य मंत्री के अलावा 12देशों के राजदूत सम्मेल में शिरकत करने पहुंचे।इलाके में विभन्न क्षेत्रों में निवेश के लिए 247 प्रस्ताव आए।इनमें से 88प्रस्ताव असम में निवेश के लिए थे।असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का कहना था कि अब पूर्वोत्तर की छवि बाहर बदल रही है।पिछले दो सालों में राज्य में तैंतीस हजार करोड़ के निवेश प्रस्ताव आए हैं।
इन सब से लगता है कि पूर्वोत्तर के दिन अच्छे आनेवाले हैं।नब्बे के दशक में माहौल ऐसा था कि असम से लोग अपनी जमीन-जायदाद बेचकर चले जाने में बेहतरी समझते थे।लेकिन आज यहां जमीन के इतने भाव हो गए हैं कि खरीदना मुश्किल हो गया है।गुवाहाटी और अन्य शहरों में पैसों के बाद भी जमीन खरीदना मुश्किल हुआ है।पहले शाम के बाद सन्नाटा पसरता था तो अब रात में चहल-पहल बढ़ जाती है।लुक-ईस्ट पालिसी के तहत दक्षिण-एशियाई देशों के साथ पूर्वोत्तर का द्वार खुला तो इलाके में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिलेगा।
देश के अन्य हिस्से की बात तो कहना मुश्किल है पर पूर्वोत्तर में विकास के जरिए आंतकवाद का पूरी तरह खात्मा किया जा सकता है।कारण यहां के युवा मेहनती होने के साथ-साथ अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ रखते हैं।इंफोसिस के एन नारायणमूर्ति ने असम का दौरा करते हुए यहां के युवक-युवतियों की इस तरह प्रशंसा करते हुए कहा था कि इलाके के युवक-युवतियां अपने कार्य को ईमानदारी और लगनशीलता के साथ करते हैं और कार्यरत संस्थान के प्रति अपनी निष्ठा को लंबे समय तक बरकरीर रखते हैं।इसलिए इनका सही उपयोग हुआ तो इलाका तरक्की करेगा इसमें कोई संदेह नहीं है।
(लेखक गुवाहाटी स्थिति पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं)